चंडीगढ़ पेंडू विकास मंच ने प्रशासन पर लगाए गंभीर आरोप, कहा—एक्वायर की गई जमीन पर करोड़ों की कीमत में प्लॉटों की नीलामी, लेकिन किसानों की जमीन के कलेक्टर रेट अब भी कृषि भूमि के आधार पर क्यों?
रमेश गोयत
चंडीगढ़, 29 अगस्त। चंडीगढ़ पेंडू विकास मंच ने चंडीगढ़ प्रशासन की भूमि नीति और गांवों की जमीन के कलेक्टर रेट को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। मंच के अध्यक्ष सतिंदर सिद्धू ने कहा कि एक तरफ पड़ोसी मोहाली में जमीन की कीमतें करोड़ों रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच चुकी हैं, वहीं दूसरी तरफ चंडीगढ़ के गांवों में जमीन के कलेक्टर रेट निर्धारित करते समय वास्तविक बाजार मूल्य और आसपास विकसित हो चुके सेक्टरों की कीमतों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है।
सिद्धू ने उदाहरण देते हुए कहा कि मोहाली सेक्टर-62 में करीब 27 एकड़ जमीन लगभग 67 करोड़ रुपये प्रति एकड़ की दर से बेचे जाने का मामला सामने आया है। ऐसे में चंडीगढ़ प्रशासन की भूमि मूल्य निर्धारण व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उनका कहना है कि जब विकसित शहरी क्षेत्रों के आसपास जमीन की कीमत करोड़ों रुपये प्रति एकड़ है, तो चंडीगढ़ के गांवों में जमीन का मूल्यांकन केवल कृषि भूमि के पुराने मानकों पर क्यों किया जा रहा है?

सेक्टर-39 मंडी की नीलामी का भी दिया उदाहरण
चंडीगढ़ पेंडू विकास मंच ने सेक्टर-39 की मंडी की प्रस्तावित नीलामी का उदाहरण देते हुए कहा कि यहां प्लॉट की नीलामी 5.50 करोड़ रुपये से शुरू होने की बात कही जा रही है। मंच का सवाल है कि जब प्रशासन अपनी जमीन और व्यावसायिक संपत्तियों की नीलामी बाजार आधारित कीमतों पर करता है, तो गांवों में रह गए जमीन मालिकों की जमीन के कलेक्टर रेट निर्धारित करते समय नीलामी और बाजार मूल्य को आधार क्यों नहीं बनाया जाता?
सिद्धू ने कहा कि चंडीगढ़ के जिन गांवों की जमीन प्रशासन ने पहले अधिग्रहित की, वहां किसानों को उनकी जमीन के बदले उचित पुनर्वास और भविष्य में विकसित होने वाली जमीन में हिस्सेदारी जैसी स्पष्ट व्यवस्था नहीं मिली। उनके अनुसार, न लैंड पूलिंग नीति है और न ही जबरन अधिग्रहित जमीन के मालिकों के लिए प्लॉट आवंटन में पर्याप्त आरक्षण की नीति।
28 गांव पहले उजड़े, अब 22 गांवों पर संकट का आरोप
मंच अध्यक्ष ने कहा कि चंडीगढ़ के विकास के लिए अतीत में बड़ी संख्या में गांवों की जमीन का अधिग्रहण हुआ और कई गांवों का अस्तित्व समाप्त हो गया। उनका आरोप है कि अब बचे हुए गांवों की जमीन पर भी विकास परियोजनाओं के नाम पर दबाव बढ़ रहा है, लेकिन प्रभावित जमीन मालिकों के लिए व्यापक पुनर्वास नीति नहीं बनाई गई है।
उन्होंने कहा कि यदि गांवों की जमीन अधिग्रहित की जाती है तो जमीन मालिकों को केवल मुआवजा देकर उनकी जिम्मेदारी समाप्त नहीं होनी चाहिए। उन्हें विकसित चंडीगढ़ में हिस्सेदारी, प्लॉट, रोजगार तथा पुनर्वास जैसी सुविधाओं के संबंध में स्पष्ट नीति मिलनी चाहिए।
नगर निगम में शामिल गांवों की जमीन को कृषि दर से आंकने पर सवाल
सतिंदर सिद्धू ने कहा कि चंडीगढ़ के कई गांव अब नगर निगम की सीमा में शामिल हो चुके हैं और उनके आसपास बड़े-बड़े सेक्टर, व्यावसायिक संस्थान तथा अन्य शहरी ढांचा विकसित हो चुका है। ऐसे में गांवों में बची जमीन का कलेक्टर रेट तय करते समय आसपास के सेक्टरों के भूमि मूल्य को भी आधार बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब चंडीगढ़ में जमीन का स्वरूप तेजी से शहरी हो चुका है, तो गांवों में बची जमीन को लंबे समय तक केवल कृषि भूमि मानकर उसका कलेक्टर रेट निर्धारित करना कितना उचित है?
प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों से हस्तक्षेप की अपील
चंडीगढ़ पेंडू विकास मंच ने चंडीगढ़ प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों, जिनमें मुख्य सचिव, वित्त सचिव, गृह सचिव और उपायुक्त स्तर के अधिकारी शामिल हैं, से इस पूरे मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है।
सिद्धू ने कहा कि प्रशासन को ऐसी भूमि नीतियां बनानी चाहिए, जिनमें किसानों और पुराने गांवों के जमीन मालिकों के हितों की रक्षा हो। उन्होंने प्रशासन से भूमि अधिग्रहण, कलेक्टर रेट, पुनर्वास, प्लॉट आवंटन और लैंड पूलिंग को लेकर एक समग्र नीति बनाने की मांग की।
उन्होंने कहा कि चंडीगढ़ के विकास की नींव गांवों और किसानों की जमीन पर रखी गई है। इसलिए विकास का लाभ उन परिवारों तक भी पहुंचना चाहिए, जिन्होंने अपनी जमीन देकर शहर के विस्तार में योगदान दिया है।
“जागो गांव वालों, अपनी जमीन के हक के लिए आवाज उठाएं”
चंडीगढ़ पेंडू विकास मंच ने गांवों के लोगों से भी अपने भूमि अधिकारों के प्रति जागरूक होने की अपील की है। सिद्धू ने कहा, “हमारी जमीनों पर चंडीगढ़ बसा है, लेकिन आज यही प्रशासन किसानों और जमीन मालिकों के लिए स्पष्ट भूमि नीति बनाने में पीछे क्यों है?”
उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए जल्द से जल्द कलेक्टर रेट की समीक्षा की जाए तथा लैंड पूलिंग, पुनर्वास और अधिग्रहित जमीन के मालिकों को विकसित क्षेत्रों में उचित हिस्सेदारी देने की नीति बनाई जाए।














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