September 13, 2026 2:06 pm

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चंडीगढ़: दलबदलुओं को टिकट नहीं—वोट भी नहीं!

चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव 2026 में अब असली फैसला पार्टियों का नहीं, जनता का होगा
हर तीन में से एक पार्षद ने बदला दल, तो सवाल सिर्फ टिकट का नहीं, राजनीतिक निष्ठा और जनविश्वास का भी

आर के गर्ग
चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव 2026 की तैयारियों के साथ ही राजनीतिक दलों में टिकट को लेकर जोड़-तोड़, दावेदारी और राजनीतिक समीकरणों का दौर तेज होने लगा है। कौन सा उम्मीदवार किस वार्ड से मैदान में उतरेगा, किसे टिकट मिलेगा और किस चेहरे को जीत की सबसे अधिक संभावना वाला माना जाएगा—इन सवालों पर पार्टियों के भीतर मंथन चल रहा है। लेकिन इस बार असली सवाल केवल राजनीतिक दलों के सामने नहीं, बल्कि चंडीगढ़ की जनता के सामने भी है।
सवाल सीधा है—क्या बार-बार दल बदलने वाले नेताओं को केवल चुनाव जीतने की संभावना के आधार पर टिकट दिया जाना चाहिए? और यदि पार्टी टिकट देती है, तो क्या जनता भी उसे वोट देने के लिए बाध्य है?
जवाब साफ है—पार्टी टिकट दे सकती है, लेकिन वोट देने का अधिकार केवल जनता के पास है।

हर तीन में से एक पार्षद के दल बदलने पर सवाल
चंडीगढ़ की स्थानीय राजनीति में मौजूदा पार्षदों के राजनीतिक सफर पर नजर डालें तो बड़ी संख्या में ऐसे चेहरे दिखाई देते हैं, जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में किसी न किसी समय दल बदला है। यदि लगभग हर तीन में से एक मौजूदा पार्षद के राजनीतिक सफर में दल परिवर्तन हुआ है, तो इसे केवल व्यक्तिगत राजनीतिक निर्णय कहकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा।
यह किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने का मामला नहीं है। लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति को राजनीतिक दल बदलने और अपनी विचारधारा के अनुसार नया राजनीतिक मंच चुनने का अधिकार है।
लेकिन सवाल तब उठता है, जब दल बदलने का प्रमुख कारण विचारधारा नहीं, बल्कि टिकट, पद या चुनावी अवसर दिखाई दे।
ऐसे में मतदाताओं को सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।
क्या राजनीति विचारधारा से चलेगी या अवसर से?
यदि कोई नेता लंबे समय तक एक पार्टी में रहकर उसके सिद्धांतों, नेतृत्व और नीतियों का समर्थन करता है और चुनाव के समय टिकट न मिलने पर अचानक दूसरी पार्टी में चला जाता है, तो जनता को उसके इस फैसले का कारण जानना चाहिए।
क्या वास्तव में विचारधारा बदली?
क्या नीतियों को लेकर गंभीर मतभेद था?
क्या जनता के हित में कोई ऐसा मुद्दा था जिसके कारण दल बदलना जरूरी हो गया?
या फिर टिकट और राजनीतिक भविष्य ही सबसे बड़ा कारण था?
यह सवाल किसी नेता की व्यक्तिगत आलोचना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा है।

जनता पांच सवाल जरूर पूछे
चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव में मतदाताओं को उम्मीदवारों से कम से कम पांच सवाल जरूर पूछने चाहिए—
पहला—दल क्यों बदला?
यदि राजनीतिक दल बदलने का फैसला किया गया तो उसका स्पष्ट कारण क्या था?
दूसरा—क्या कोई वैचारिक या नीतिगत कारण था?
क्या उम्मीदवार ने अपने पुराने दल की किसी नीति का विरोध किया था या केवल टिकट की स्थिति बदलने पर दल बदला?
तीसरा—पुराने दल और कार्यकर्ताओं के प्रति जवाबदेही क्या रही?
वर्षों तक जिन कार्यकर्ताओं के साथ राजनीति की, उनके प्रति क्या राजनीतिक जिम्मेदारी निभाई गई?
चौथा—यदि पुराने दल से टिकट मिल जाता तो क्या दल बदलने की जरूरत पड़ती?
यह सवाल बहुत कुछ स्पष्ट कर सकता है।
पांचवां—यदि कल राजनीतिक समीकरण फिर बदल गए तो क्या फिर दल बदलने की संभावना है?
मतदाता को उम्मीदवार की राजनीतिक स्थिरता को भी देखना चाहिए।
इन सवालों के जवाब उम्मीदवार के राजनीतिक चरित्र और उसकी प्राथमिकताओं को समझने में मदद कर सकते हैं।

पुराने कार्यकर्ताओं की निष्ठा का भी सवाल
दलबदल की राजनीति का एक दूसरा पहलू उन कार्यकर्ताओं से जुड़ा है जो वर्षों तक पार्टी के लिए काम करते हैं।
वे बूथ स्तर पर संगठन खड़ा करते हैं। चुनाव के दौरान घर-घर जाकर प्रचार करते हैं। पार्टी के कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। मुश्किल समय में नेतृत्व के साथ खड़े रहते हैं। लेकिन चुनाव आते ही यदि किसी दूसरे दल से आया हुआ राजनीतिक चेहरा अचानक मजबूत उम्मीदवार बताकर टिकट हासिल कर लेता है, तो वर्षों से मेहनत कर रहे कार्यकर्ताओं के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा होता है।
क्या संगठन के प्रति निष्ठा और वर्षों की मेहनत का कोई मूल्य नहीं है?
यदि टिकट पाने का सबसे आसान रास्ता दल बदलना बन जाए, तो इससे राजनीतिक दलों के समर्पित कार्यकर्ताओं को क्या संदेश जाएगा?
पार्टियों को इस पहलू पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए।
केवल ‘जीतने की क्षमता’ काफी नहीं
राजनीतिक दल चुनाव में जीतने की संभावना को महत्व देते हैं। यह स्वाभाविक भी है। लेकिन नगर निगम चुनाव केवल चुनावी गणित का खेल नहीं है।
पार्टियों को उम्मीदवार चुनते समय ‘जीतने की क्षमता’ के साथ ‘विश्वसनीयता’ को भी समान महत्व देना चाहिए।
उम्मीदवार की छवि कैसी है?
पिछले पांच वर्षों में वह जनता के बीच कितना रहा?
क्या वह वार्ड की समस्याओं के लिए उपलब्ध रहा?
क्या उसने नगर निगम से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठाई?
क्या उसके खिलाफ गंभीर सार्वजनिक सवाल हैं?
क्या उसने अपने राजनीतिक निर्णयों में निरंतरता दिखाई?
ये सभी प्रश्न टिकट वितरण का हिस्सा बनने चाहिए।
नगर निगम चुनाव में असली मुद्दे क्या हैं?
चंडीगढ़ के मतदाता के लिए नगर निगम चुनाव का मतलब केवल पार्टी और उम्मीदवार नहीं है। आम नागरिक को अपने वार्ड में रोजमर्रा की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
सफाई व्यवस्था, कूड़ा उठाने की व्यवस्था, टूटी सड़कें, पानी की समस्या, पार्कों की हालत, स्ट्रीट लाइट, आवारा पशु, जलभराव, संपत्ति कर, पार्किंग, सार्वजनिक सुविधाएं और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे सीधे नागरिक के जीवन को प्रभावित करते हैं।
इसलिए मतदाता को यह देखना चाहिए कि उम्मीदवार इन मुद्दों पर अगले पांच साल कितनी मजबूती से जनता के साथ खड़ा रह सकता है।
पांच साल जनता के बीच रहने वाला पार्षद चाहिए
नगर निगम का पार्षद केवल चुनाव के समय दिखाई देने वाला प्रतिनिधि नहीं होना चाहिए। उसकी वास्तविक परीक्षा चुनाव जीतने के बाद शुरू होती है।

मतदाता को पूछना चाहिए—
क्या पार्षद जनता की शिकायत सुनता है?
क्या वह अधिकारियों के सामने वार्ड की समस्याएं उठाता है?
क्या वह नगर निगम की बैठकों में सक्रिय रहता है?
क्या वह विकास कार्यों की निगरानी करता है?
क्या वह पांच साल बाद फिर वोट मांगने से पहले अपने काम का हिसाब देने को तैयार है?
यही वह कसौटी है जिस पर उम्मीदवार को परखा जाना चाहिए।

दल बदलना अपराध नहीं, लेकिन सवाल करना जनता का अधिकार
यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि दल बदलना अपने आप में अपराध नहीं है। लोकतंत्र में राजनीतिक विचार बदलने का अधिकार हर व्यक्ति को है। परिस्थितियां बदल सकती हैं, नीतियों से मतभेद हो सकते हैं और कोई नेता नई राजनीतिक विचारधारा के साथ जाना चाह सकता है।
लेकिन यदि दल परिवर्तन का पैटर्न बार-बार केवल चुनावी टिकट और राजनीतिक लाभ के आसपास दिखाई दे, तो जनता को सवाल पूछने का अधिकार है।
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को उम्मीदवार चुनने की स्वतंत्रता है।
उसी लोकतंत्र में मतदाता को उम्मीदवार को स्वीकार या अस्वीकार करने की भी पूरी स्वतंत्रता है।

शुरू होनी चाहिए एक जनमुहिम
इसीलिए चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव 2026 के संदर्भ में एक सार्वजनिक और लोकतांत्रिक मुहिम पर विचार किया जा सकता है—
“दलबदलुओं को टिकट नहीं—वोट भी नहीं!”
इसका अर्थ किसी व्यक्ति विशेष का विरोध करना नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य राजनीतिक जवाबदेही और उम्मीदवारों के सार्वजनिक मूल्यांकन की परंपरा मजबूत करना होना चाहिए।

मतदाता उम्मीदवार से पूछे—
आपने दल क्यों बदला?
उम्मीदवार अपना पक्ष रखे।
यदि कारण वैचारिक है तो जनता उसे समझे।
यदि कोई ठोस नीतिगत कारण है तो उस पर चर्चा हो।
लेकिन यदि कारण केवल चुनावी अवसर या टिकट हासिल करना है, तो मतदाता अपने विवेक से फैसला करे।

पार्टियों से भी अपील
राजनीतिक दलों से भी अपील है कि टिकट वितरण को केवल चुनावी जीत के आंकड़ों तक सीमित न रखें।
Winnability के साथ Credibility भी देखें।
जिस उम्मीदवार का राजनीतिक इतिहास जनता के सामने स्पष्ट हो, जिसने अपने क्षेत्र में काम किया हो और जो पांच साल जनता के बीच रहा हो, उसे प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
दलबदल को राजनीतिक पुरस्कार की तरह पेश करने से बचना भी जरूरी है।

आखिर में फैसला जनता का
चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव 2026 में सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि “कौन जीतेगा?”
इस बार कुछ और सवाल भी पूछे जाने चाहिए—
कौन अपने सिद्धांतों के साथ खड़ा रहा?
कौन अपने कार्यकर्ताओं के साथ खड़ा रहा?
कौन पांच साल जनता के साथ खड़ा रहा?
और सबसे महत्वपूर्ण—
कौन सिर्फ टिकट के साथ खड़ा रहा?
राजनीतिक दल टिकट दे सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र में अंतिम मुहर मतदाता लगाता है।
टिकट पार्टी का हो सकता है, वोट जनता का है।
दल बदलकर टिकट मिल सकता है, लेकिन जनता का विश्वास अपने आप नहीं मिलता।
चंडीगढ़ नगर निगम चुनाव 2026 को केवल सत्ता और सीटों की लड़ाई न बनने दें। इसे राजनीतिक चरित्र, जवाबदेही, निष्ठा और जनविश्वास की परीक्षा बनाएं।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत किसी पार्टी का टिकट नहीं, जनता का विश्वास है।

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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