अधिकारियों से कथित मारपीट से लेकर शॉर्ट टेंडर और भुगतान तक—व्यवस्था पर उठ रहे सवाल, विजिलेंस जांच की मांग
बाबूगिरी न्यूज़
चंडीगढ़, 8 अक्तूबर। चंडीगढ़ प्रशासन के इंजीनियरिंग विंग में कुछ ठेकेदारों के कथित दबदबे को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, विभाग के कुछ आला अधिकारियों को कथित रूप से दबंग प्रवृत्ति वाले ठेकेदारों के दबाव और विवादों का सामना करना पड़ रहा है।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि एक अधिकारी के कार्यालय में घुसकर उसके साथ कथित तौर पर मारपीट की घटना हुई, लेकिन मामला सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया। चर्चा है कि अधिकारी ने किसी तरह की कार्रवाई कराने के बजाय मामले को दबाए रखना ही उचित समझा। हालांकि, इस पूरे मामले की आधिकारिक पुष्टि और घटना से जुड़े तथ्य जांच का विषय हैं।
क्या यह पहली घटना है?
विभागीय स्तर पर ऐसी चर्चाएं भी सामने आ रही हैं कि यह कथित घटना पहली नहीं है। इससे पहले भी ठेकेदारों और अधिकारियों के बीच विवाद तथा कथित दुर्व्यवहार की घटनाएं होने की बात कही जा रही है। सवाल यह है कि यदि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ ही इस तरह का व्यवहार हो रहा है तो निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों पर कितना दबाव रहता होगा?
शॉर्ट टेंडर को लेकर भी सवाल
इंजीनियरिंग विंग में कथित तौर पर शॉर्ट टेंडर प्रक्रिया के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि कुछ मामलों में दबाव या ब्लैकमेलिंग के हालात के बीच जल्दबाजी में टेंडर जारी किए जाते हैं। ऐसे मामलों में पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और सरकारी धन के उचित इस्तेमाल की स्वतंत्र जांच की जरूरत बताई जा रही है।
बिना काम भुगतान का आरोप, जांच की मांग
कुछ टेंडरों को लेकर इससे भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ ठेकेदारों को कथित तौर पर पूरा काम किए बिना ही भुगतान कर दिया गया। यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं तो यह सरकारी धन और टेंडर प्रक्रिया से जुड़ा गंभीर मामला हो सकता है।
इसीलिए मांग उठ रही है कि इंजीनियरिंग विंग में पिछले कुछ वर्षों में जारी किए गए शॉर्ट टेंडर, कार्यादेश, माप पुस्तिकाएं, बिल, भुगतान और मौके पर हुए वास्तविक कार्य का स्वतंत्र सत्यापन कराया जाए।
कौन चला रहा है दबाव का खेल?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि अधिकारियों पर वास्तव में ठेकेदारों की ओर से दबाव बनाया जा रहा है तो इन ठेकेदारों को संरक्षण या ताकत आखिर कहां से मिल रही है? क्या विभाग के भीतर ही कोई अधिकारी या कर्मचारी उन्हें मदद पहुंचा रहा है? यह भी जांच का विषय है।
मामले की निष्पक्ष जांच होने पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और सरकारी प्रक्रिया का कहीं दुरुपयोग तो नहीं हुआ।
विजिलेंस जांच से सामने आ सकता है सच
पूरे मामले में विजिलेंस जांच की मांग उठ रही है। जांच में विशेष रूप से शॉर्ट टेंडर, ठेकेदारों को दिए गए काम, भुगतान, मौके पर हुए निर्माण कार्य, गुणवत्ता, अधिकारियों की भूमिका और कथित दबाव या मारपीट की घटनाओं को शामिल करने की मांग की जा रही है।
अब सवाल सिर्फ एक कथित मारपीट की घटना का नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग विंग में ठेकेदारी व्यवस्था की पारदर्शिता और सरकारी धन की निगरानी का है। यदि आरोप निराधार हैं तो जांच से स्थिति साफ हो जाएगी और यदि इनमें सच्चाई है तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय होना जरूरी है।












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