October 28, 2026 5:05 am

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चंडीगढ़ में आउटसोर्सिंग टेंडरों का खेल! अधिकारियों की शह पर चलती रही ‘बाबूगिरी’, कथित फर्जी दस्तावेजों के सहारे करोड़ों के ठेके हासिल करने का आरोप!

सीबीआई की छापेमारी के बाद मैनपावर कंपनियों पर शिकंजा, तीन संचालकों के खिलाफ एफआईआर; तीन साल के टेंडरों की जांच में खुल सकते हैं कई राज

टेंडर की शर्तें ऐसी कि चहेती कंपनियों के लिए रास्ता आसान होने के आरोप,

दीपावली व त्योहारों पर अधिकारियों के घर पहुंचने वाले महंगे उपहारों की चर्चा , अब की बार दीपावली फीकी रहने की उम्मीद

बाबूगिरी न्यूज़
चंडीगढ़, 22 अक्तूबर। सरकारी विभागों में आउटसोर्स कर्मचारियों की भर्ती और तैनाती के नाम पर करोड़ों रुपये के टेंडर जारी होते रहे, कंपनियां ठेके हासिल करती रहीं और पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठने के बावजूद व्यवस्था चलती रही। अब मैनपावर कंपनियों से जुड़े कथित फर्जी दस्तावेजों और टेंडर आवंटन में अनियमितताओं का मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की कार्रवाई के बाद सुर्खियों में है। सवाल उठ रहा है कि आखिर टेंडर की शर्तें बनाने वाले अधिकारियों ने दस्तावेजों की जांच कैसे की? कंपनियों को पात्र किस आधार पर घोषित किया गया? और यदि कागजात में गड़बड़ी थी, तो सरकारी तंत्र की जांच व्यवस्था उसे पकड़ने में नाकाम क्यों रही?
चंडीगढ़ में आउटसोर्सिंग के ठेकों को लेकर उठे सवाल अब केवल कंपनियों तक सीमित नहीं हैं। जांच का असली सवाल यह है कि टेंडर हासिल करने वाली कंपनियों के साथ-साथ उन अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल कब और कितनी गहराई से होगी, जिनके हस्ताक्षरों से करोड़ों रुपये के ठेकों का रास्ता साफ हुआ।
सीबीआई की छापेमारी, एफआईआर और विजिलेंस की जांच के बीच अब यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन गया है।

टेंडर का खेल या नियमों की आड़ में पसंदीदा कंपनियों को फायदा?

मैनपावर टेंडरों में पात्रता तय करने के लिए अनुभव, सालाना टर्नओवर, कार्यालय के स्थान और दूसरे वित्तीय एवं तकनीकी मानकों की शर्तें रखी जाती हैं। इनका उद्देश्य योग्य कंपनियों का चयन करना और सरकारी कामकाज के लिए सक्षम एजेंसी सुनिश्चित करना होता है।
लेकिन शिकायतों में आरोप लगाया गया कि कुछ टेंडरों की शर्तें ऐसी थीं, जिनसे प्रतिस्पर्धा सीमित हो सकती थी और कुछ कंपनियों को फायदा मिलने की आशंका पैदा होती थी।
कहीं अनुभव की शर्तों पर सवाल उठे, कहीं टर्नओवर के मानकों को लेकर आपत्ति सामने आई और कहीं स्थानीय कार्यालय से जुड़ी अनिवार्यताओं की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हुए।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये शर्तें वास्तव में विभागों की जरूरतों के अनुरूप थीं या इनके कारण दूसरी योग्य कंपनियों के लिए रास्ता मुश्किल हुआ?
यदि किसी टेंडर में अनावश्यक रूप से कठोर शर्तें रखी गईं, तो यह भी जांचना होगा कि उन्हें तैयार करने वाले अधिकारियों ने ऐसा किस आधार पर किया। क्या सभी कंपनियों के लिए समान नियम लागू किए गए? क्या किसी कंपनी को पात्र बनाने के लिए नियमों में ढील दी गई? क्या किसी योग्य बोलीदाता को बाहर करने के लिए शर्तों का इस्तेमाल हुआ?
इन सवालों के जवाब टेंडर की फाइलों और अधिकारियों के निर्णयों की जांच से ही सामने आ सकते हैं।

सीबीआई की छापेमारी के बाद तीन संचालकों पर एफआईआर

मैनपावर कंपनियों से संबंधित कथित अनियमितताओं को लेकर सीबीआई की कार्रवाई ने मामले को और गंभीर बना दिया है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, जांच एजेंसी ने चंडीगढ़ में चार ठिकानों पर छापेमारी की और तीन कंपनियों के संचालकों के खिलाफ कथित धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश से संबंधित एफआईआर दर्ज की।
रिपोर्टों में संदीप मलिक, रेखा और सतीश कुमार के नाम सामने आए हैं। मामले में अज्ञात निजी व्यक्तियों और सरकारी कर्मचारियों की भूमिका की जांच किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
शिक्षा विभाग ग्रुप-डी कर्मचारी यूनियन की शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कुछ कंपनियों ने सरकारी ठेके हासिल करने के लिए कथित तौर पर फर्जी अनुभव प्रमाणपत्रों और दूसरे दस्तावेजों का इस्तेमाल किया। शिकायत में कंपनियों के बीच कथित संबंधों और सरकारी अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग भी की गई।
अब जांच एजेंसी के सामने यह पता लगाने की चुनौती है कि प्रस्तुत किए गए दस्तावेज वास्तविक थे या नहीं, उन्हें किसने जारी किया और टेंडर प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों ने उनका सत्यापन किस प्रकार किया।
यदि दस्तावेज फर्जी पाए जाते हैं, तो केवल उन्हें जमा करने वालों की ही नहीं, बल्कि सत्यापन प्रक्रिया में किसी जानबूझकर की गई लापरवाही या मिलीभगत के प्रमाण मिलने पर संबंधित जिम्मेदार लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
फिलहाल आरोपों को अदालत में सिद्ध तथ्य नहीं माना जा सकता। अंतिम निष्कर्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही निकलेगा।

तीन साल के टेंडरों की जांच, पुरानी फाइलें खुलने की तैयारी

मामले में एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चंडीगढ़ प्रशासन के सतर्कता विभाग ने पिछले तीन वर्षों में जारी मैनपावर टेंडरों की जांच के निर्देश दिए हैं। इस जांच में विभिन्न विभागों, बोर्डों, निगमों और कार्यालयों में आउटसोर्स सेवाओं के लिए जारी निविदाओं की पड़ताल की जानी है।
जांच का दायरा बढ़ने से अब केवल मौजूदा विवादित टेंडरों पर ही नहीं, बल्कि पुराने फैसलों पर भी सवाल उठ सकते हैं।
किन कंपनियों को कितने टेंडर मिले? किन शर्तों के आधार पर उन्हें पात्र घोषित किया गया? क्या दस्तावेजों का सत्यापन हुआ था? क्या किसी कंपनी को बार-बार ठेके मिले? क्या दूसरी कंपनियों को अनुचित कारणों से प्रतिस्पर्धा से बाहर किया गया?
ये वे सवाल हैं, जिनके जवाब सामने आने पर टेंडर व्यवस्था की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
यदि जांच में अलग-अलग विभागों में एक जैसी प्रकृति के काम के लिए असंगत पात्रता शर्तें या नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित टेंडरों की वैधता और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ सकते हैं।
हालांकि, केवल किसी कंपनी को बार-बार ठेका मिलने से अपने आप अनियमितता सिद्ध नहीं होती। इसके लिए पूरी प्रक्रिया, पात्रता और निर्णयों की जांच जरूरी है।

वित्त विभाग के निर्देशों से भी उठे सवाल
20 अक्टूबर 2026 को सामने आई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चंडीगढ़ प्रशासन के वित्त विभाग ने मैनपावर टेंडरों में पारदर्शिता और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए विभागों को निर्देश जारी किए।
इन निर्देशों में पात्रता संबंधी शर्तों को उचित, वस्तुनिष्ठ और काम की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप रखने पर जोर दिया गया। अनावश्यक रूप से कठोर अनुभव या टर्नओवर की शर्तों तथा अनुचित भौगोलिक प्रतिबंधों से बचने की बात भी सामने आई।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब आउटसोर्सिंग टेंडरों की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
अब देखना होगा कि इन निर्देशों का जमीन पर कितना असर होता है। क्या भविष्य के टेंडरों में सभी कंपनियों को समान अवसर मिलेंगे? क्या पात्रता की शर्तें तय करने के लिए स्पष्ट मानक अपनाए जाएंगे? और क्या पहले जारी किए गए विवादित टेंडरों की जांच में भी जवाबदेही तय होगी?
पारदर्शिता के निर्देश तभी प्रभावी माने जाएंगे, जब नियमों का उल्लंघन करने वालों की पहचान हो और जिम्मेदारी केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित न रहे।

हजारों कर्मचारियों के नाम पर करोड़ों का कारोबार, हिसाब भी होना चाहिए

आउटसोर्सिंग व्यवस्था में बड़ी संख्या में कर्मचारी सरकारी विभागों और संस्थानों में सेवाएं देते हैं। मीडिया रिपोर्टों में संबंधित एजेंसियों के माध्यम से लगभग 30 हजार कर्मचारियों को काम मिलने का दावा किया गया है।
ऐसे में टेंडरों की जांच का संबंध केवल कंपनियों के कारोबारी हितों से नहीं, बल्कि कर्मचारियों के वेतन और रोजगार से भी है।
जांच में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कागजों पर दर्ज कर्मचारियों की संख्या और वास्तविक तैनाती में कोई अंतर तो नहीं था। निर्धारित वेतन और कर्मचारियों को किए गए भुगतान का मिलान हुआ या नहीं। भविष्य निधि और कर्मचारी राज्य बीमा से संबंधित वैधानिक दायित्वों का पालन किया गया या नहीं।
यदि किसी एजेंसी ने सरकारी विभाग से भुगतान लेने के लिए गलत जानकारी दी हो या कर्मचारियों के नाम पर प्रस्तुत रिकॉर्ड में गड़बड़ी की हो, तो उसकी जांच आवश्यक है।
हालांकि, इन बिंदुओं पर किसी अनियमितता की पुष्टि उपलब्ध तथ्यों से नहीं होती। इन्हें जांच के संभावित पहलुओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
दीपावली पर महंगे उपहारों की चर्चा,

इस पूरे मामले के बीच अधिकारियों और मैनपावर कंपनियों के बीच कथित नजदीकियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आपके इनपुट के अनुसार, दीपावली और अन्य त्योहारों के दौरान कुछ अधिकारियों के घर महंगे उपहार पहुंचने की चर्चा है।
यदि किसी कंपनी ने ठेका हासिल करने या अपने कारोबारी हित साधने के लिए किसी अधिकारी को अनुचित लाभ दिया हो, तो यह गंभीर आरोप होगा। लेकिन उपहार दिए जाने, उनकी कीमत, उन्हें देने वाले व्यक्ति और टेंडर संबंधी किसी फैसले के बीच संबंध को प्रमाणित करना आवश्यक है।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी से यह स्थापित नहीं होता कि किसी नामित अधिकारी को किसी विशेष कंपनी ने दीपावली पर उपहार दिया या बदले में टेंडर में लाभ पहुंचाया गया।
इसलिए इस पहलू पर भी जांच एजेंसियों को शिकायतों, दस्तावेजों और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पड़ताल करनी होगी।
यदि किसी अधिकारी और कंपनी के बीच अनुचित लेन-देन के प्रमाण सामने आते हैं, तो मामला केवल टेंडर की शर्तों तक सीमित नहीं रहेगा।

अबकी बार फीकी रह सकती है दीपावली!

सीबीआई की कार्रवाई, एफआईआर, विजिलेंस की जांच और वित्त विभाग के निर्देशों के बाद आउटसोर्सिंग टेंडरों से जुड़े मामले में जवाबदेही का दबाव बढ़ गया है।
जिन कंपनियों के दस्तावेजों और टेंडरों की जांच हो रही है, उनके लिए अब हर दावे और प्रमाणपत्र की प्रामाणिकता महत्वपूर्ण होगी। वहीं, सरकारी अधिकारियों की भूमिका भी जांच का विषय बन सकती है, यदि रिकॉर्ड में उनके फैसलों या सत्यापन प्रक्रिया से संबंधित कोई गड़बड़ी सामने आती है।
ऐसे माहौल में त्योहारों के दौरान उपहारों के आदान-प्रदान से जुड़ी शिकायतें भी अधिक संवेदनशील हो सकती हैं। हालांकि, यह कहना कि अधिकारियों को उपहार मिलना बंद हो गया है या इस बार किसी अधिकारी की दीपावली फीकी रहेगी,
फिर भी, इस पूरे प्रकरण ने एक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या सरकारी ठेकों में नियमों का पालन होगा या नियमों की आड़ में कंपनियों को लाभ पहुंचाने के आरोप आगे भी उठते रहेंगे?

असली परीक्षा: कंपनियों के साथ जिम्मेदार अधिकारियों की भी जांच
अब निगाहें जांच एजेंसियों की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। सीबीआई को कथित फर्जी दस्तावेजों और कंपनियों की भूमिका की जांच करनी है, जबकि विजिलेंस की पड़ताल से पिछले तीन वर्षों के टेंडरों की प्रक्रिया पर रोशनी पड़ सकती है।
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह होगा कि जांच केवल उन कंपनियों तक सीमित रहती है, जिन्होंने ठेके हासिल किए, या टेंडर की शर्तें तैयार करने, दस्तावेजों का सत्यापन करने और अंतिम मंजूरी देने वाले अधिकारियों की भूमिका भी निष्पक्ष तरीके से परखी जाती है।
यदि किसी स्तर पर मिलीभगत, जानबूझकर नियमों की अनदेखी या अनुचित लाभ पहुंचाने के प्रमाण मिलते हैं, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, जिन अधिकारियों और कंपनियों के खिलाफ आरोप साबित नहीं होते, उनके साथ भी निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
चंडीगढ़ में आउटसोर्सिंग टेंडरों की जांच अब सरकारी खरीद व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही की बड़ी कसौटी बन गई है। करोड़ों के ठेकों की फाइलें खुलेंगी तो पता चलेगा कि गड़बड़ी कहां हुई, किसने नियमों का पालन किया और किसकी भूमिका की जांच जरूरी है।

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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