October 28, 2026 12:46 pm

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96 वर्ष की आयु में सत्यवती शर्मा ने किया देहदान, चिकित्सा शिक्षा के लिए छोड़ी मानव सेवा की अमिट विरासत

पति के पदचिह्नों पर चलते हुए पूरी की अंतिम इच्छा, पीजीआईएमईआर चंडीगढ़ को दान किया पार्थिव शरीर; परिवार ने किया संकल्प का सम्मान

बाबूगिरी न्यूज़
चंडीगढ़, 26 अक्टूबर। मानवता की सेवा का संकल्प जीवन की अंतिम सांस के बाद भी निभाया जा सकता है। इसी भावना का प्रेरणादायक उदाहरण 96 वर्षीय श्रीमती सत्यवती शर्मा ने प्रस्तुत किया। उन्होंने चिकित्सा शिक्षा और भावी पीढ़ियों के प्रशिक्षण में योगदान देने के उद्देश्य से देहदान का निर्णय लिया। उनके निधन के बाद उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए परिवार ने उनका पार्थिव शरीर पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआईएमईआर), चंडीगढ़ के शरीर रचना विभाग को दान किया।
श्रीमती सत्यवती शर्मा, स्वर्गीय श्री महान बीर शर्मा की धर्मपत्नी थीं। उनका निधन 11 अक्टूबर, 2026 को 96 वर्ष की आयु में हुआ था। उनकी इच्छा के अनुरूप उनके पुत्र श्री सर्व प्रकाश शर्मा ने अपनी बहन श्रीमती उमा अग्निहोत्री, पुत्रवधू श्रीमती नीरू शर्मा, पौत्र श्री अभिमन्यु और परिवार के अन्य सदस्यों के सहयोग से देहदान की प्रक्रिया पूरी की।
श्रीमती शर्मा का यह निर्णय इस विश्वास को दर्शाता है कि मानव शरीर मृत्यु के बाद भी समाज के लिए उपयोगी हो सकता है। चिकित्सा शिक्षा में देहदान का विशेष महत्त्व है। इससे चिकित्सा के विद्यार्थियों को मानव शरीर की संरचना को समझने और व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त करने में सहायता मिलती है। इस प्रकार देहदान भावी चिकित्सकों के ज्ञान और कौशल को विकसित करने में योगदान देता है।

स्वयं लिया था देहदान का निर्णय

परिवार के अनुसार, श्रीमती सत्यवती शर्मा ने अपने जीवनकाल में ही स्वेच्छा से पीजीआईएमईआर का देहदान कार्ड भरकर हस्ताक्षर किए थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से अपनी इच्छा व्यक्त की थी कि मृत्यु के बाद उनका शरीर चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के कार्य आए।
उनके पुत्र सर्व प्रकाश शर्मा ने बताया कि परिवार के लिए उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करना भावनात्मक क्षण होने के साथ-साथ गर्व का विषय भी था। परिवार ने उनकी इच्छा को सर्वोपरि रखते हुए देहदान का निर्णय पूरा किया।
उन्होंने कहा कि उनकी माता स्वतंत्र विचारों वाली, प्रगतिशील और दूरदर्शी महिला थीं। उनका मानना था कि ज्ञान, करुणा और मानव सेवा का महत्त्व सामाजिक रूढ़ियों से कहीं अधिक है। सीमित औपचारिक शिक्षा के बावजूद वह जीवनभर नई जानकारियां हासिल करने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने में विश्वास रखती थीं।

अच्छे कर्म और मानव सेवा को देती थीं प्राथमिकता

श्रीमती सत्यवती शर्मा जीवन को अच्छे कर्मों, दयाभाव और दूसरों की सहायता करने का अवसर मानती थीं। उनका विश्वास था कि जिस समाज से व्यक्ति को बहुत कुछ मिलता है, उसके प्रति कुछ लौटाना भी उसका दायित्व है। इसी विचार ने उन्हें मृत्यु के बाद देहदान करने के लिए प्रेरित किया।
परिवार के मुताबिक, उन्होंने धार्मिक, नैतिक और मूल्यपरक जीवन व्यतीत किया। अपने बच्चों में ईमानदारी, देशभक्ति और सभी जीवों के प्रति प्रेम जैसे संस्कार विकसित किए। वह प्रेरणादायक साहित्य पढ़ने की शौकीन थीं और देश-दुनिया की घटनाओं से परिचित रहने के लिए नियमित रूप से समाचार पत्र पढ़ती थीं। दैनिक भास्कर भी उनके नियमित पठन का हिस्सा था।

आर्य समाज की शिक्षाओं से मिली प्रेरणा

श्रीमती शर्मा के जीवन पर आर्य समाज की शिक्षाओं का भी प्रभाव था। वह तर्कसंगत सोच, अंधविश्वास से दूरी और सामाजिक कल्याण के लिए व्यावहारिक कार्यों को प्राथमिकता देती थीं। उनका मानना था कि संसाधनों का इस्तेमाल ऐसे कार्यों में होना चाहिए, जिनसे जरूरतमंद लोगों को वास्तविक लाभ मिले।
इसी सोच के तहत वह अनाथालयों और गरीब एवं वंचित समुदायों के कल्याण के लिए काम करने वाले गैर-सरकारी संगठनों की सहायता करती थीं। वह विशेष रूप से उन संस्थाओं को सहयोग देना पसंद करती थीं, जहां सहायता जरूरतमंद लोगों तक पहुंचने का भरोसा हो।

पति ने भी किया था देहदान

श्रीमती सत्यवती शर्मा का देहदान उनके परिवार की सामाजिक सेवा से जुड़ी परंपरा को आगे बढ़ाता है। उनके पति स्वर्गीय श्री महान बीर शर्मा ने भी चिकित्सा संबंधी उद्देश्यों के लिए अपना शरीर दान करने का निर्णय लिया था। वर्ष 2012 में पुणे स्थित बी. जे. मेडिकल कॉलेज को उनका पार्थिव शरीर दान किया गया था, जहां उनका उपचार चल रहा था।
इस तरह पति-पत्नी दोनों ने मृत्यु के बाद भी चिकित्सा क्षेत्र और समाज के हित में योगदान देने का संकल्प लिया। श्रीमती शर्मा ने अपने पति के पदचिह्नों पर चलते हुए इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

परिवार के लिए गर्व का विषय बना अंतिम संकल्प

परिवार के लिए श्रीमती शर्मा की अंतिम इच्छा को पूरा करना केवल एक भावनात्मक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उनके जीवन मूल्यों के प्रति सम्मान भी था। उनका निर्णय यह संदेश देता है कि सामाजिक सेवा के लिए उम्र, औपचारिक शिक्षा और परिस्थितियां बाधा नहीं बनतीं। दृढ़ इच्छाशक्ति और मानवता के प्रति संवेदनशीलता से व्यक्ति ऐसा योगदान दे सकता है, जिसका लाभ आने वाली पीढ़ियों को भी मिल सकता है।
शरीर रचना विभाग, पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ ने इस पुनीत कार्य के लिए परिवार के प्रति आभार व्यक्त किया और शर्मा की अंतिम इच्छा का सम्मान करने के लिए परिवार की सराहना की।
सत्यवती शर्मा का देहदान समाज के लिए प्रेरणा है। उनका जीवन और अंतिम निर्णय यह संदेश देता है कि मानव सेवा केवल जीवनकाल तक सीमित नहीं है। देहदान के माध्यम से व्यक्ति चिकित्सा शिक्षा, अनुसंधान और भावी चिकित्सकों के प्रशिक्षण में योगदान देकर मानवता की सेवा की अपनी विरासत को आगे बढ़ा सकता है।

देहदान संबंधी जानकारी
संदेश: देहदान — महादान, जरूर करें।
शरीर रचना विभाग, पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़
कार्यालय समय हेल्पलाइन: 0172-2755201
24 घंटे हेल्पलाइन: 9660030095

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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