June 15, 2026 5:45 pm

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कभी ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ रहा भारतीय सांख्यिकीय तंत्र आज संदेह के घेरे में

भारत की आज़ादी के समय पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक ऐसी अर्थव्यवस्था विरासत में मिली थी, जिसे अंग्रेज़ों ने दशकों के औपनिवेशिक शोषण से पूरी तरह बर्बाद कर दिया था। इसके साथ ही देश के सामने अभूतपूर्व राजनीतिक चुनौतियाँ भी थीं—500 से अधिक रियासतों का एकीकरण, एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का निर्माण, और करोड़ों लोगों की आकांक्षाओं को दिशा देना।
इन तमाम चुनौतियों के बावजूद नेहरू सरकार ने विकास की दीर्घकालिक नींव रखने से कभी समझौता नहीं किया। देश में सैकड़ों विश्वस्तरीय, स्वायत्त और पेशेवर संस्थानों की स्थापना की गई, जिनकी बदौलत भारत को वैश्विक स्तर पर सम्मान और भरोसा मिला। भारत का आधिकारिक सांख्यिकीय तंत्र (Official Statistical System) भी इसी दूरदर्शिता का परिणाम था।
भारतीय सांख्यिकी तंत्र: एक वैश्विक मिसाल
1950 में प्रो. पी.सी. महालनोबिस के नेतृत्व में नेशनल सैंपल सर्वे (NSS) की स्थापना हुई, जिसे बाद में NSSO नाम दिया गया। 1951 में सेंट्रल स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट, आगे चलकर सेंट्रल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (CSO) बना। 2005 में नेशनल स्टैटिस्टिकल कमीशन (NSC) का गठन किया गया, जो 2019 तक सांख्यिकीय प्रणाली की स्वायत्तता और गुणवत्ता का प्रहरी रहा।
भारत ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सांख्यिकी के बुनियादी सिद्धांतों को बहुत पहले अपना लिया था—उस समय जब कई विकसित देश भी ऐसा करने पर विचार ही कर रहे थे। यही कारण है कि 1950 से 2014 तक भारतीय डेटा को दुनिया “गोल्ड स्टैंडर्ड” मानती रही।
आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक, वैश्विक विश्वविद्यालय और शोध संस्थान भारत के रोज़गार, गरीबी, स्वास्थ्य, उपभोग और अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों को वैश्विक बेंचमार्क के रूप में इस्तेमाल करते रहे।
2011-12 के उपभोग सर्वे के आधार पर ही वर्ल्ड बैंक ने वैश्विक गरीबी रेखा को नई परिभाषा दी थी। NSSO का 68वाँ हेल्थ और मॉर्बिडिटी सर्वे आज भी निम्न और मध्यम आय वाले देशों के लिए मानक माना जाता है।
2014 तक राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रहा डेटा
2014 तक सत्ता में रही सभी सरकारों—चाहे कांग्रेस की UPA हो या अटल बिहारी वाजपेयी की NDA—ने सांख्यिकीय संस्थानों की स्वायत्तता, पारदर्शिता और पेशेवर ईमानदारी में दखल नहीं दिया।
राजनीतिक रूप से असहज होने के बावजूद कभी भी डेटा को न तो रोका गया और न ही बदला गया।
2014 के बाद तस्वीर क्यों बदली?
लेकिन 2014 के बाद यह पूरी परंपरा उलट गई। बड़े-बड़े वादों के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार न तो 2 करोड़ नौकरियाँ दे पाई, न किसानों की आय दोगुनी कर पाई, न ही समावेशी विकास का सपना पूरा कर सकी।
परिणामस्वरूप आज—
भारत प्रति व्यक्ति GDP में दुनिया में 142वें स्थान पर है
बेरोज़गारी कई दशकों के उच्चतम स्तर पर है
महँगाई और घटती आय आम जनता को तोड़ रही है
MSME और अनौपचारिक क्षेत्र गहरे संकट में हैं
असमानता, प्रदूषण, भूख और सामाजिक विभाजन बढ़ रहा है
जब हकीकत कड़वी हो, तो डेटा को दबाया जाता है
इसी विफलता को छिपाने के लिए सरकार ने डेटा में हेरफेर और उसे दबाने की नीति अपनाई।
2015 में GDP का बेस ईयर बदला गया
नई पद्धतियों से UPA काल की वृद्धि घटाई गई और NDA काल की बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई गई
पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम के अनुसार GDP ग्रोथ को औसतन 2.5 प्रतिशत अंक तक बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया
2019 में NSC के कार्यकारी चेयरमैन पी.सी. मोहनन समेत कई सदस्यों का इस्तीफा, लेबर फोर्स सर्वे और कंज्यूमर एक्सपेंडिचर सर्वे को दबाना, NSSO-CSO का मनमाना विलय—ये सभी घटनाएँ इसी सिलसिले की कड़ियाँ हैं।
वैश्विक भरोसे को भी लगा झटका
आईएमएफ ने भारत के नैशनल अकाउंट्स को ‘C ग्रेड’ दिया—जो कभी ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ कहलाने वाले तंत्र के लिए बेहद शर्मनाक है।
डेटा संग्रह में अनौपचारिक क्षेत्र की अनदेखी और पद्धतिगत कमजोरियों की ओर अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने खुलकर इशारा किया।
डेटा नहीं, तो जवाबदेही नहीं
डेटा के अभाव में न कोविड मौतों की सही संख्या पता है,
न प्रवासी मजदूरों की,
न नोटबंदी से गई नौकरियों की,
न भगदड़ों में मारे गए लोगों की।
140 वर्षों में पहली बार जनगणना नहीं होना भविष्य के लिए गंभीर खतरे की घंटी है। गलत योजना, संसाधनों की बर्बादी और डेमोग्राफिक डिविडेंड का नुकसान तय है।
निष्कर्ष
अब समय आ गया है कि सरकार राजनीतिक छवि से ऊपर उठकर देश के भविष्य के लिए ईमानदार, समयबद्ध और पारदर्शी डेटा सार्वजनिक करे।
सच से भागकर देश नहीं चलता—सच से ही देश बनता है।
राजीव शर्मा
जनरल सेक्रेटरी एवं चीफ स्पोक्सपर्सन
चंडीगढ़ प्रदेश कांग्रेस
हूँ।

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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