राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने का स्पष्ट रोडमैप प्रस्तुत किया है। इस नीति में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, नियामक ढांचे को सरल करने और शिक्षा को भविष्योन्मुखी बनाने के उद्देश्य से भारतीय उच्च शिक्षा आयोग की स्थापना की संस्तुति की गई थी। इसी क्रम में प्रस्तुत विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक भारतीय शिक्षा व्यवस्था में एक अत्यंत महत्वपूर्ण, आवश्यक और स्वागतयोग्य पहल है। यह विधेयक न केवल उच्च शिक्षा में गुणवत्ता, पारदर्शिता और मानकीकरण सुनिश्चित करेगा, बल्कि इसके दूरगामी प्रभाव विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता और सुशासन को भी सुदृढ़ करेंगे।
वर्तमान में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) जैसे संस्थान उच्च शिक्षा, शिक्षक शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में अलग-अलग स्वायत्त निकायों के रूप में कार्य कर रहे हैं। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक के माध्यम से इन सभी संस्थानों के कार्यों को एकीकृत कर एक शीर्ष नियामक आयोग के अंतर्गत लाने का प्रस्ताव एक दूरदर्शी कदम है। इससे उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और शिक्षक शिक्षा के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित होगा तथा शिक्षा के सभी क्षेत्रों में गुणवत्ता और मानकों की स्पष्टता सुनिश्चित हो सकेगी।
इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों को स्पष्ट नियमन, प्रभावी समन्वय और गुणवत्तापूर्ण मानकों के माध्यम से उत्कृष्टता की ओर अग्रसर करना है। इसके अंतर्गत तीन स्वतंत्र परिषदों—
विकसित भारत शिक्षा विनिमय परिषद,
विकसित भारत शिक्षा गुणवत्ता परिषद और
विकसित भारत शिक्षा मानक परिषद
का गठन प्रस्तावित है। इन परिषदों के माध्यम से खंडित और परस्पर विरोधी नियमन समाप्त होंगे तथा एक समान, संगठित और पारदर्शी संरचना विकसित होगी, जिससे अकादमिक स्वतंत्रता और वस्तुनिष्ठता को बढ़ावा मिलेगा।
विधेयक के अंतर्गत उच्च शिक्षण संस्थानों को शैक्षणिक और प्रशासनिक मामलों में अधिक स्वायत्तता प्रदान की जाएगी। इससे बहु-विषयक, बहु-भाषिक, शोध-आधारित और लचीले पाठ्यक्रमों का संचालन सरल होगा। भारतीय ज्ञान परंपरा, अवधारणात्मक समझ और नवाचार पर आधारित शिक्षा को बढ़ावा मिलेगा, जिसका सीधा लाभ विद्यालयी शिक्षा को भी प्राप्त होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के मूल सिद्धांत—अनुभवात्मक, समग्र और विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षा—को विद्यालय स्तर पर प्रभावी रूप से लागू करने में यह विधेयक सहायक सिद्ध होगा।
विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक उच्च शिक्षण संस्थानों को बड़े बहु-विषयक शिक्षा केंद्रों में विकसित करने तथा भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक मूल्यों, भारतीय भाषाओं और कलाओं के समावेशन पर विशेष बल देता है। उच्च शिक्षा में योग, भारतीय दर्शन, विज्ञान, आयुर्वेद, कला और लोकज्ञान का आधुनिक संदर्भों में अध्ययन विद्यालयी पाठ्यक्रमों और शिक्षण पद्धतियों को भी समृद्ध करेगा। इससे विद्यार्थियों में भाषा, संस्कृति, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रीय चेतना का विकास होगा तथा वे वैश्विक दृष्टि के साथ अपनी भारतीय पहचान से जुड़े रहेंगे।
डिजिटल और तकनीकी शिक्षा को सशक्त बनाने पर भी इस विधेयक में विशेष जोर दिया गया है। उच्च शिक्षा संस्थानों में विकसित ई-सामग्री, डिजिटल प्लेटफॉर्म, लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम (LMS), ऑनलाइन मूल्यांकन और ब्लेंडेड लर्निंग मॉडल क्रमिक प्रभाव के माध्यम से विद्यालयों तक पहुँचेंगे। इसके परिणामस्वरूप विद्यालयी स्तर पर स्मार्ट कक्षाएँ, डिजिटल कंटेंट और तकनीक-आधारित शिक्षण पद्धतियाँ व्यापक रूप से अपनाई जा सकेंगी। इससे विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों के विद्यार्थियों को समान शैक्षणिक अवसर उपलब्ध होंगे।
विधेयक के अनुसार उच्च शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण, शोध-आधारित, कौशल-युक्त और रोजगारपरक बनाने से विद्यालयी शिक्षा को भी अनेक स्तरों पर लाभ मिलेगा। शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से नवाचार, अनुसंधान और आधुनिक शिक्षण विधियाँ विद्यालयों तक पहुँचेंगी। इससे विद्यालयों में कार्यरत शिक्षक विषयवस्तु में अधिक दक्ष, शोध-सचेत और नवीन शिक्षण तकनीकों को अपनाने में सक्षम होंगे, जिससे अधिगम-शिक्षण की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार आएगा।
समावेशी शिक्षा को उच्च शिक्षा में सशक्त करने की संस्तुति भी इस विधेयक का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। वंचित वर्गों, ग्रामीण क्षेत्रों और दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए विकसित नीतियाँ विद्यालयी शिक्षा के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होंगी। इससे विद्यालयों में समान अवसर, अनुकूल वातावरण और लचीले पाठ्यक्रम सुनिश्चित किए जा सकेंगे।
शिक्षक शिक्षा किसी भी शिक्षा व्यवस्था की आधारशिला होती है। वर्तमान में शिक्षक-प्रशिक्षण प्रणाली विभिन्न मानकों और निगरानी ढाँचों के कारण अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थानों को एक सुदृढ़ नियामक ढाँचे के अंतर्गत लाकर स्पष्ट मानक, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व सुनिश्चित करता है। इससे विद्यालयों को उच्च गुणवत्ता वाले, संवेदनशील और दक्ष शिक्षक उपलब्ध हो सकेंगे, जो विद्यार्थियों की संज्ञानात्मक, भावात्मक, सामाजिक और नैतिक आवश्यकताओं को समग्र रूप से संबोधित कर सकें।
यह विधेयक उच्च शिक्षा और विद्यालयी शिक्षा के बीच की दूरी को पाटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। सीखने के प्रतिफलों (Learning Outcomes) और स्नातक गुणों (Graduate Attributes) को अनिवार्य कर विद्यालयी और उच्च शिक्षा के बीच सार्थक संरेखण स्थापित किया जा सकेगा। रटंत प्रणाली के स्थान पर विश्लेषणात्मक सोच, समस्या-समाधान और अनुभवात्मक अधिगम को बढ़ावा मिलेगा।
अंततः यह कहा जा सकता है कि विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक केवल उच्च शिक्षा सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी प्रभाव विद्यालयी शिक्षा की जड़ों को भी सुदृढ़ करेंगे। यह विधेयक राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 में निहित विद्यार्थियों के समग्र विकास की अवधारणा को जमीनी स्तर पर साकार करने में सहायक सिद्ध होगा। गुणवत्तापूर्ण शिक्षक, समावेशी दृष्टिकोण और नवाचार-आधारित शिक्षा के माध्यम से भावी पीढ़ी 21वीं सदी के कौशलों से युक्त, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित होगी। इस प्रकार यह विधेयक विकसित भारत के निर्माण की दिशा में एक दूरदर्शी और ऐतिहासिक आधारशिला सिद्ध होगा।
प्रो. दिनेश प्रसाद सकलानी
निदेशक, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT), नई दिल्ली











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