April 5, 2026 12:47 pm

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जाति, न्याय और लोकतंत्र : एक असहज सच्चाई – डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत का लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली नहीं, बल्कि एक नैतिक संकल्प है—समानता, न्याय और बंधुत्व का। संविधान की प्रस्तावना इसी संकल्प का उद्घोष करती है। परंतु आज जब हम अपने चारों ओर देखते हैं, तो यह प्रश्न असहज रूप से सामने खड़ा होता है कि क्या हम उस संकल्प के साथ न्याय कर पा रहे हैं? या फिर लोकतंत्र का यह ढांचा भीतर से दरक चुका है, जहाँ कानून, व्यवस्था और सत्ता—तीनों ही जाति, वर्ग और पहचान की गिरफ़्त में हैं।
आज कानून बनते हैं, संशोधन होते हैं, नए-नए प्रावधान जोड़े जाते हैं, परंतु उनके पीछे की मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक हो गया है। क्या ये कानून नागरिक के लिए हैं, या किसी विशेष समूह, वर्ग या वोट बैंक के लिए? जब विधायन का आधार तर्क और न्याय की जगह सामाजिक पहचान लेने लगे, तब लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ना तय है। कानून का काम समाज को जोड़ना है, लेकिन यदि वही समाज को खाँचों में बाँटने का माध्यम बन जाए, तो यह स्थिति केवल चिंताजनक नहीं, बल्कि खतरनाक भी है।
न्याय व्यवस्था की भूमिका किसी भी लोकतंत्र में सबसे पवित्र मानी जाती है। न्यायालय वह स्थान है जहाँ अंतिम उम्मीद जाकर टिकती है। लेकिन जब यह धारणा बनने लगे कि न्याय की दहलीज़ पर पहुँचने से पहले व्यक्ति की जाति, हैसियत और राजनीतिक संरक्षण देखा जा रहा है, तो विश्वास की नींव हिलने लगती है। न्याय केवल निर्णय नहीं होता; वह भरोसा होता है। और जब यह भरोसा टूटता है, तो उसका असर केवल एक व्यक्ति पर नहीं, पूरे समाज पर पड़ता है। आज न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या, फैसलों में देरी, और कुछ मामलों में दिखता स्पष्ट या अप्रत्यक्ष पक्षपात—ये सब लोकतंत्र के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रश्नचिह्न हैं।
लोकतंत्र के नाम पर सत्य का क्षरण एक धीमी लेकिन निरंतर प्रक्रिया है। यह एक दिन में नहीं होता। पहले असुविधाजनक सवालों को ‘राष्ट्र-विरोधी’ कहा जाता है, फिर आलोचना को ‘षड्यंत्र’ बताया जाता है, और अंततः सच बोलने वालों को हाशिए पर धकेल दिया जाता है। जब संसद में बहसें समाधान से अधिक शोर बन जाएँ, जब मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सत्ता का विस्तार बन जाए, और जब सामाजिक विमर्श भावनाओं के उकसावे तक सिमट जाए—तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र केवल औपचारिक रूप से जीवित है, उसकी आत्मा संकट में है।
समरसता की बातें हर मंच से होती हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इसके उलट दिखाई देती है। समाज में विभाजन गहराता जा रहा है—धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, भाषा और क्षेत्र के नाम पर। सत्ता इन विभाजनों को पाटने के बजाय, अक्सर इन्हें साधन की तरह इस्तेमाल करती है। ‘फूट डालो और राज करो’ अब इतिहास की किताबों में दर्ज कोई औपनिवेशिक नीति नहीं रही, बल्कि समकालीन राजनीति की एक प्रभावी रणनीति बन चुकी है। जब जनता आपस में उलझी रहती है, तब सत्ता से सवाल करने की ताक़त कमजोर पड़ जाती है।
यह विडंबना ही है कि एक ओर जाति-पाति मिटाने की बातें होती हैं, दूसरी ओर हर राजनीतिक गणित जातिगत समीकरणों पर आधारित होता है। चुनावी टिकटों से लेकर नीतिगत फैसलों तक, जाति एक निर्णायक तत्व बनी हुई है। ऐसे में ‘जाति से ऊपर उठने’ का उपदेश खोखला प्रतीत होता है। यदि सचमुच जाति अप्रासंगिक होती, तो उसका उल्लेख हर नीति, हर बहस और हर चुनाव में इतनी प्रमुखता से क्यों होता?
आशाओं के इस देश में निराशा का बढ़ता विस्तार केवल आर्थिक कारणों से नहीं है। बेरोज़गारी, महँगाई और संसाधनों की असमानता तो कारक हैं ही, लेकिन उससे भी बड़ा कारण है—विश्वास का टूटना। जनता ने जिन हाथों में सत्ता सौंपी, उनसे यह अपेक्षा थी कि वे सबके हित में काम करेंगे। परंतु जब वही सत्ता अपने अस्तित्व को बचाने के लिए समाज को बाँटने लगे, आलोचना से डरने लगे और असहमति को दबाने लगे, तब लोकतंत्र का नैतिक आधार कमजोर हो जाता है।
सत्ता का सच से मुँह फेर लेना किसी भी समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है। जब शासन केवल अपनी छवि गढ़ने में व्यस्त हो जाए और वास्तविक समस्याओं से आँख चुराने लगे, तब झूठ एक समानांतर यथार्थ रच देता है। इस यथार्थ में आँकड़े चमकदार होते हैं, भाषण ऊँचे होते हैं, लेकिन आम आदमी की ज़िंदगी लगातार कठिन होती जाती है। सच को ढँकने के लिए प्रचार का सहारा लिया जाता है, और धीरे-धीरे जनता को यही सिखाया जाता है कि सवाल करना असभ्यता है।
विधान सभाओं और संसद में सामाजिक न्याय की बातें अक्सर सुनाई देती हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर वही अन्याय नए-नए रूपों में सामने आता है। नीतियों में सुधार के नाम पर ऐसे प्रावधान लाए जाते हैं, जो या तो आधे-अधूरे होते हैं या फिर नए विवादों को जन्म देते हैं। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब नीति-निर्माण में प्रभावित वर्गों की वास्तविक भागीदारी न हो, और फैसले ऊपर से थोपे जाएँ।
लोकतंत्र की असली परीक्षा संकट के समय होती है। क्या वह सबसे कमजोर नागरिक के साथ खड़ा होता है, या सबसे ताकतवर के साथ? आज यह प्रश्न पहले से अधिक प्रासंगिक है। जब अन्याय किसी ‘दूसरे’ के साथ होता है, तब समाज का एक बड़ा हिस्सा चुप रहता है। लेकिन यही चुप्पी कल अपने ही अधिकारों के क्षरण का कारण बनती है। चयनात्मक नैतिकता—जहाँ हम केवल अपने हित का अन्याय देखते हैं—लोकतंत्र को भीतर से खोखला कर देती है।
यह संपादकीय किसी एक सरकार, एक दल या एक नेता के विरुद्ध आरोप-पत्र नहीं है। यह एक सामूहिक आत्मावलोकन का आग्रह है। लोकतंत्र केवल शासकों की जिम्मेदारी नहीं, नागरिकों की भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है। सवाल पूछना, असहमति जताना और सच के साथ खड़ा होना—यही लोकतंत्र की असली शक्ति है। यदि हम सुविधा के लिए चुप रहना चुनते हैं, तो फिर व्यवस्था के पतन की जिम्मेदारी से भी हम बच नहीं सकते।
आज आवश्यकता है कि न्याय को फिर से उसके मूल अर्थ में लौटाया जाए—निष्पक्ष, निर्भीक और समान। कानून का उद्देश्य सत्ता को सुरक्षित करना नहीं, बल्कि नागरिक के अधिकारों की रक्षा करना होना चाहिए। राजनीति का धर्म ध्रुवीकरण नहीं, समाधान होना चाहिए। और लोकतंत्र का अर्थ केवल पाँच साल में एक बार मतदान करना नहीं, बल्कि हर दिन सजग रहना होना चाहिए।
यदि हम अब भी नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह नहीं पूछेंगी कि हमने किसे वोट दिया था, बल्कि यह पूछेंगी कि जब समाज बाँटा जा रहा था, जब न्याय पहचान पूछ रहा था, और जब सच को दबाया जा रहा था—तब हमने क्या किया। यही प्रश्न आज के भारत के लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा और सबसे जरूरी सवाल है।

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Author: BabuGiri Hindi

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