तेरे जाने से तेरा जाएगा क्या जान तो हमारी जाएगी,
यार ने धोखा किया क्यों मेरे साथ पूछ लिया तो यारी जाएगी
राजनीति में बहुत दफा संकेतों से ही ये अनुमान लगाना पड़ता है कि किस नेता का सियासी मार्किट में क्या भाव है। जैसे कि हरियाणा में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुडडा की दिल्ली कोठी में आयोजित लंच पर राहुल गांधी अपनी बहन प्रियंका गांधी के संग पहुंच गए। इस से हरियाणा कांग्रेसियो में ये मैसेज गया कि दिल्ली दरबार में अभी हुडडा के पूरे पूरे नंबर हैं। अब इन नंबरों को जांचने परखने का दूसर मौका एक और आ रहा है। वो है हरियाणा में राज्यसभा का चुनाव। रामचंद्र जांगड़ा और किरन चौधरी का कार्यकाल पूरा होने की वजह से हरियाणा में राज्यसभा की दो खाली सीटों को भरने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 5 मार्च है। चुनावी समीकरणों के हिसाब से एक सीट भाजपा और एक सीट कांग्रेस की लग रही है। बताते हैं कि राज्यसभा चुनाव के लिए अपनी बात हाईकमान तक पहुंचाने के लिए ही भूपेंद्र हुडडा हरियाणा विधानसभा के सत्र के दौरान ही दिल्ली पहुंच गए। अब ये देखना रोचक होगा कि हुड्डा की राय को हाईकमान कितनी तव्वजो देता है। इधर,राज्यसभा जाने की खातिर भाजपा के कई नेता भी लाबिंग में जुटे हुए हैं। देखना होगा कि भाजपा हाईकमान पैराशूट उम्मीदवार उतारता है या फिर प्रदेश के नेताओं में से ही किसी को जनता की सेवा का मौका दे कर उनको मेवा देता है। उम्मीदवार के चयन में ये देखना रोचक होगा कि केंद्रीय मंत्री मनोहरलाल खटटर की पंसद को भाजपा हाईकमान कितनी तव्वजो देती है। हरियाणा भाजपा में पिछले 11 बरसों में वन वे ट्रेफिक चल रहा है। ऐसा सा लगता है हरियाणा के राजपाठ का ये रोड़ मनोहरलाल ने बनाया है और इस पर मनोहरलाल खुद की बनाई हुई गाड़ी में खुद ही सवार होकर चल रहे हैं। जहां उनका मन होता है, वहां वो गाड़ी रोक कर अपने किसी मनचाहे को अपने संग बिठा लेते हैं। उसकी झोली में सत्ता की कुछ रोड़ी डाल देते हैं,किसी पद पर बिठा देते हैं,सरकारी होने की फीत लगा देते हैं और जहां मन होता है उसे कान पकड़ कर उतार देते हैं। मनोहरलाल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ऐसा वरदस्त है कि उनकी राह में कांटे बिछाने तो दूर ऐसा सोचने की जुर्रत भी आज कोई भाजपाई नहीं कर सकता। अतीत में जिस किस ने उनके लिए परेशानी पैदा करने की कोशिश की मनोहरलाल उनको अपने इस्टाइल में जवाब दे चुके हैं। इलाज कर चुके हैं। उस पर होशियार इतने हैं कि इलाज करने के बाद वो कभी अपनी मुखारबिंद से ये दावा भी नहीं करते कि उन्होंने फलां का इलाज कर दिया। जब कभी उन से इस बाबत पूछो तो मंद मंद मुस्कराने लग जाते हैं। ऐसे में अब हरियाणा का राज्यसभा का चुनाव एक तरह से मनोहरलाल और भूपेंद्र हुडडा के पार्टी हाईकमान में सियासी ग्राफ के बारे में फिर से खुल कर इशारा करेगा…करेगा लेकिन खामोशी से। अगर इनके पंसदीदा लोग उम्मीदवार बन जाते हैं तो ये कहा जा सकता है कि दोनों का दिल्ली में फुल जलवा कायम है। राज्यसभा टिकट के लिए एक अनार सौ बीमार वाली हालात है। जिन को टिकट मिल जाए उनको हमारी एडवांस में शुभकामनाएं और जिनको नहीं मिले उनके लिए यही कहा जा सकता है..
हमें क्या इल्म था हम ऐसे झांसे में भी आएंगे
उसी साकी के झूठे दिलासे में भी आएंगे
बहारें बन के जो आया था मेरी प्यास बुझाने
खबर क्या थी हम जहरीले कासे में भी आएंगे
लुटा कर होश हम बैठे हैं अब मयखाने की चौखट पर
अब क्या पता किस किस तमाशे में भी आएंगे
सीबीआई जांच
कभी कभी हालात ऐसे हो जाते हैं कि एक ही वक्त पर कई दफा पोल खुल जाया करती है। चाहे वो कोई इंसान हो या सरकारी प्रतिष्ठान हो या फिर सरकारी दुकान हो। जैसे कि हाल ही में चंद दिनो के अंतराल पर अदालतों से विपक्ष के दो बड़े नेताओं को राहत मिल गई। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल को शराब के स्कैम में अदालत ने बरी कर दिया। इधर, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुडडा को एजीएल प्लाट आवंटन में पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने बड़ी राहत दे दी। उनको अरोप मुक्त्त कर दिया। रोचक तथ्य ये है कि केजरीवाल और हुडडा के खिलाफ इन दोनों ही मुकदमों की बागडोर देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी सीबीआई के हाथ में थी। ये वही सीबीआई है कि जिसके बारे में देश में कहीं भी कुछ छोटे से छोटा या बड़े से बड़ा अपराध हो जाए तो नेता और जनता एक स्वर में ये मांग उठाया करते हैं कि इस मामले को सीबीआई को दे दिया जाए। बहुत दफा बहुत से केस तो सीबीआई को राज्य सरकारें इसलिए भी देती हैं क्योंकि लोग स्टेट पुलिस की बजाय सीबीआई में ज्यादा भरोसा करते हैं। रोचक तथ्य ये है कि सीबीआई का ज्यादा सा अपना कैडर नहीं है और नीच से लेकर ऊपर तक के पदों पर यहां डैपुटेशन पर लोग आते हैं। यानी राज्यों के पुलिस कर्मचारी और अधिकारियों के सहारे ही सीबीआई चल रही है। कहीं की ईट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा। इसी सीबीआई के लिए एक दफा अदालत ने पिंजरे का तोता भी कहा था। सीबीआई पर विभिन्न सरकारों में सियासी इस्तेमाल होने के आरोप भी लगते रहे हैं। अब अगर इस सीबीआई के बनाए हुए मुकदमें यंू अदालतों में औधे मुंह गिरेंगे तो सीबीआई की साख पर तो बटटा लगना ही है। वैसे भी अपने देश में इत्तफाक से कुछ ऐसा सा इतिहास रहा हैकि बड़े लोगों को अदालतों से कम की कसूरवार ठहराया जाता रहा है। अगर किसी निचली अदालत ने उनको किसी मामले में कसूरवार ठहरा भी दिया तो ऊपर की अदालतों तक पहुंचते पहुंचते उनको इंसाफ मिल ही जाता है और वो बरी हो ही जाते हैं। लगे हाथ ये भी बतला दें कि 2016 में जाट आरक्षण आंदोलन मामले में हिंसा और आगजनी के चर्चित मामले में भी ताजा ताजा फैसला आ गया है। ये मामला भी सीबीआई के सुरक्षित हाथों में सौंपा गया था। अदालत ने दस बरस तक चली सुनवाई में सभी 56 आरोपियों को बरी कर दिया है। अब तो आप के मन में सीबीआई जांच को लेकर कोई वहम नहीं होना चाहिए। ये सोचना निहायत ही गलत होगा कि सीबीेआई में फन्ने खां तफतीशी बैठे हैं। सीबीआई की हालात पर कहा जा सकता है..
रूखसत हुआ तो आंख मिला कर भी नहीं गया
वो क्यों गया है ये भी बता कर नहीं गया
वो यंू गया कि बाद ए सबा याद आ गई
एहसास तक भी हम को दिला कर नहीं गया
यूं लग रहा है जैसे अभी लौट आएगा
जाते हुए चिराग बुझा कर नहीं गया
बस इक लकीर खींच गया दरमियान में
दीवार में रास्ते बना कर भी नहीं गया
शायद वो मिल ही जाए मगर जुस्तुजू है शर्त
वो अपने नक्श ए पा तो मिटा कर नहीं गया
मेरे मकां में आज तक वही खुशबू बसी हुई
लगता है यंू कि जैसे वो आ कर नहीं गया
अब तक तो फूल जैसी ही ताजा थी उस की याद
जब तक वो पत्तियों को जुदा कर नहीं गया
रहने दिया न उस ने किसी का काम का मुझे
और खाक में भी मुझ को मिला कर नहीं गया
अपना अपना तरीका
अपने हरियाणा विधानसभा में विधायक चाहे विपक्ष के हों या फिर सत्ता पक्ष के वो जनहित के मुददे जोरदार तरीके से उठा रहे हैं। इस कड़ी में आदित्य सुरजेवाला,मनमोहन भड़ाना,करन चौटाला,आदित्य देवीलाल,गोकुल सेतिया,सुनील सतपाल सांगवान,पवन खरखौदा, हरेंद्र रामरत्न,प्रमोद विज आदि ऐसे नाम हैं जिन्होंने अपनी विधानसभा से जुड़े मुददों और प्रदेश के मुददों को जोरदार ढंग से उठाया। विधानसभा के बजट सत्र के शून्यकाल में इन विधायकों ने सलीके से और तरीके से अपनी बात कही। पक्ष और विपक्ष की ओर से मुददे उठाने के तरीके में एक मौलिक अंतर जरूर रहा। जहां सत्ता पक्ष के लोग पहले मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी सरकार की पहले तारीफ कर भूमिका बना कर बाद में अपनी समस्याएं उठाते हैं, वहीं विपक्ष वाले सीधे ही सरकार पर हमलावार हो जाते हैं। बिजली मंत्री अनिल विज पैरों में फ्रैक्चर होने की वजह से वो इस दफा विधानसभा सदन में नहीं आ पाए। हरियाणा सरकार में मंत्री राव नरबीर, महिपाल ढांडा, कृष्णलाल पंवार, विपुल गोयल, रणबीर गंगवा सदन में विपक्ष के हमलों की धार कुंद करने की कोशिश तो करते हैं,लेकिन फिर भी विज की कमी तो सदन में महसूस हो ही रही है। इस माहौल पर कहा जा सकता है कि..
कुछ भी न जब दिखाई दे तब देखता हंू मैं
फिर भी ये खौफ सा है कि सब देखता हंू मैं
आंखें तुम्हारे हाथ पे रख कर मैं चल दिया
अब तुम में मुनहसिर है कि कब देखता हंू मैं
नाकाम ए इश्क हंू सो मेरा देखना भी देख
कम देखता हंू और गजब देखता हंू मैं
सैनी का नायाब अंदाज
ऐसा कहा जाता है कि जितना कम बोलोगे, उतने ज्यादा सुने जााओगे। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी इस फार्मूले से उल्ट चल रहे हैं और विधानसभा में बोलने के हर उपलब्ध अवसर को हाथों हाथ लपक रहे हैं। वो विपक्ष के उठाए मुददों की जवाब देने के लिए पूरी तैयारी से सदन में आते हैं। तथ्यवार और सिलसिलेवार ढंग से हरियाणा विधानसभा में अपनी बात रखते हैं। कई दफा तो उनकी बात इतनी लंबी हो जाती है कि विपक्ष के अलावा सत्ता पक्ष के लोग भी ये चाहते हैं कि उनकी बात जल्द खत्म हो। लेकिन नायब तो नायब हैं। वो जो तैयारी कर के आते हैं,जो वो पढ कर आते हैं,जो वो रट कर आते हैं, वो पूरा कहे बिना नहीं मानते। ऐसा सा मानिए कि उनको परीक्षा के प्रश्नपत्र की पहले से जानकारी होती है और फिर वो उसकी भरपूर तैयारी बिठाते हैं और फिर क्लास में अकेले एक प्रश्न का जवाब ही नहीं, बल्कि सारी किताब सी पढ जाते हैं। सैनी की सुन कर विपक्ष की हालात कुछ ऐसी सी हो जाती है..
सजाएं पायी हैं कुछ ऐसी दिल लगाने की
न अब है रोने की ताकत ना मुस्कराने की
कदम कदम तेरी हसरत तेरी जुदाई का गम
तेरे बगैर किसी तरह जी ना पाये हम
हजार कोशिशें की तुझ को भूल जाने की











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