चंडीगढ़, 4 जनवरी। देशभर के कर्मचारी और मजदूर संगठनों ने केंद्र सरकार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन तेज करने का फैसला लिया है। इस आंदोलन का औपचारिक ऐलान 9 जनवरी को नई दिल्ली में आयोजित कर्मचारियों-मजदूरों के राष्ट्रीय सम्मेलन में किया जाएगा। सम्मेलन में देशभर से हजारों प्रतिनिधि भाग लेंगे।
अखिल भारतीय राज्य सरकारी कर्मचारी महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुभाष लांबा ने बताया कि देश की 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियन और केंद्र व राज्य सरकार के कर्मचारियों की सैकड़ों अखिल भारतीय फेडरेशनों ने संयुक्त रूप से यह निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि सरकार लगातार कर्मचारियों और मजदूरों की प्रमुख मांगों की अनदेखी कर रही है, जिससे आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
सुभाष लांबा ने बताया कि प्रमुख मांगों में पीएफआरडीए एक्ट को रद्द कर पुरानी पेंशन योजना लागू करना, ठेका व संविदा कर्मियों को नियमित करना, सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण पर रोक, खाली पदों पर नियमित भर्ती, एनईपी और बिजली संशोधन बिल पर रोक, तथा 18 महीने के बकाया डीए-डीआर का भुगतान शामिल है।
उन्होंने बताया कि इस सम्मेलन में हरियाणा से सर्व कर्मचारी संघ हरियाणा, हरियाणा कर्मचारी महासंघ सहित सीटू, एटक, इंटक, एचएमएस, एआईयूटीयूसी जैसे प्रमुख मजदूर संगठनों के प्रतिनिधि भाग लेंगे।
सुभाष लांबा ने वेनेजुएला के निर्वाचित राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी की कथित गिरफ्तारी की कड़ी निंदा करते हुए इसे अमेरिकी साम्राज्यवाद की बर्बर कार्रवाई बताया। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर भी देशभर में विरोध कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने 21 नवंबर 2025 को 29 श्रम कानूनों को समाप्त कर बनाए गए चार लेबर कोड लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी है। ये लेबर कोड मजदूरों के यूनियन बनाने, आठ घंटे की ड्यूटी, हड़ताल और सामूहिक सौदेबाजी जैसे अधिकारों पर सीधा हमला हैं। साथ ही प्रबंधन को छंटनी के अधिकार देकर मजदूरों को असुरक्षित बना दिया गया है।
लांबा ने कहा कि सरकार ने न्यूक्लियर एनर्जी कानून (शांति) पारित कर इस क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया है और इंश्योरेंस सेक्टर में 100 प्रतिशत एफडीआई को मंजूरी दी है। इसके अलावा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 को समाप्त कर रोजगार और आजीविका की गारंटी मिशन (ग्रामीण) विधेयक-2025 पारित कर रोजगार की गारंटी खत्म कर दी गई है।
उन्होंने बताया कि न्यूनतम वेतन 26 हजार रुपये करने की मांग भी लगातार नजरअंदाज की जा रही है, जबकि महंगाई के मौजूदा सूचकांक के अनुसार यह 30 हजार रुपये से अधिक होना चाहिए।
सुभाष लांबा ने कहा कि इन्हीं नीतियों के कारण देश के कर्मचारी और मजदूर अब सरकार के खिलाफ निर्णायक आंदोलन के मूड में हैं।











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