क्रॉस वोटिंग पर कांग्रेस सख्त, 4 विधायकों को नोटिस; कानूनी स्थिति पर विशेषज्ञ की अहम राय
चंडीगढ़: हरियाणा से राज्यसभा की दो सीटों के लिए हुए चुनाव के बाद सामने आई क्रॉस वोटिंग और वोट रद्द होने की घटनाओं के बीच संवैधानिक पहलुओं को लेकर नई बहस छिड़ गई है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट और संवैधानिक मामलों के जानकार हेमंत कुमार ने स्पष्ट किया है कि राज्यसभा चुनाव में बागी रुख अपनाने वाले विधायकों पर दलबदल विरोधी कानून लागू नहीं होता, लेकिन सदन के भीतर पार्टी व्हिप मानना उनके लिए अनिवार्य रहेगा।
चुनाव परिणाम और क्रॉस वोटिंग से बढ़ा विवाद
16 मार्च को हुए चुनाव में भाजपा के संजय भाटिया और कांग्रेस के कर्मवीर सिंह बौद्ध विजयी रहे, जबकि निर्दलीय उम्मीदवार सतीश नांदल मामूली अंतर से हार गए। मतगणना के बाद खुलासा हुआ कि भाजपा के एक और कांग्रेस के चार विधायकों के वोट तकनीकी कारणों से रद्द हो गए, जबकि पांच कांग्रेस विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की।
हालांकि कांग्रेस के 37 विधायक होने के बावजूद पार्टी उम्मीदवार को केवल 28 वोट ही मिल सके। इसके बाद पार्टी ने चार बागी विधायकों के नाम सार्वजनिक करते हुए उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया।
राज्यसभा चुनाव ‘सदन की कार्यवाही’ नहीं
एडवोकेट हेमंत कुमार के अनुसार, भारतीय संविधान और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के मुताबिक राज्यसभा चुनाव को विधानसभा की आंतरिक कार्यवाही नहीं माना जाता। इसलिए किसी भी राजनीतिक दल द्वारा अपने विधायकों को वोटिंग के लिए व्हिप जारी करना कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होता।
उन्होंने कहा कि विधायक अपनी इच्छा से वोट डालने, मतदान से दूर रहने या यहां तक कि जानबूझकर वोट रद्द करवाने के लिए भी स्वतंत्र हैं।
दलबदल कानून नहीं होगा लागू
हेमंत के मुताबिक, क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायकों के खिलाफ पार्टी अनुशासनात्मक कार्रवाई—जैसे निलंबन या निष्कासन—की जा सकती है, लेकिन उन्हें दलबदल विरोधी कानून के तहत विधानसभा सदस्यता से अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
उन्होंने 2022 के उदाहरण का हवाला देते हुए बताया कि आदमपुर के तत्कालीन विधायक कुलदीप बिश्नोई ने भी राज्यसभा चुनाव में पार्टी लाइन से हटकर वोट दिया था, जिसके बाद उन्हें पार्टी पदों से हटाया गया था, हालांकि उनकी विधायकी बरकरार रही।
सदन के अंदर व्हिप मानना जरूरी
हेमंत कुमार ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि ऐसे बागी विधायक विधानसभा की कार्यवाही के दौरान पार्टी व्हिप का उल्लंघन करते हैं—जैसे किसी विधेयक पर पार्टी के खिलाफ वोट करना या अनुपस्थित रहना—तो उनके खिलाफ दलबदल कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है और उनकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के 1996 के एक फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि निष्कासित या निलंबित विधायक भी सदन में अपनी मूल पार्टी के व्हिप का पालन करने के लिए बाध्य होते हैं।
ओपन बैलेट व्यवस्था पर उठे सवाल
हेमंत कुमार ने यह भी सवाल उठाया कि जब राज्यसभा चुनाव में विधायक स्वतंत्र रूप से मतदान करने के लिए बाध्य नहीं हैं, तो फिर 2003 में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन कर ओपन बैलेट प्रणाली लागू करने का क्या औचित्य है, जिसमें पार्टियों के अधिकृत एजेंट यह देख सकते हैं कि विधायक ने किसे वोट दिया।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद हरियाणा की राजनीति में हलचल तेज हो गई है और कांग्रेस पार्टी अपने विधायकों के खिलाफ आगे की कार्रवाई पर मंथन कर रही है।











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