September 13, 2026 10:04 am

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लेख: जंग, सब्ज़ी और घरेलू कूटनीति – एक आम भारतीय की असाधारण कहानी

रंजन गुप्ता
दुनिया जब युद्ध की आग में जल रही हो, मिसाइलें आसमान चीर रही हों, तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हों और टीवी चैनलों पर एंकर चिल्ला-चिल्लाकर माहौल को और गर्म कर रहे हों—ऐसे समय में एक आम इंसान की ज़िंदगी कैसी होती है?
इस सवाल का जवाब है—रमेश की कहानी।
एक हफ्ता बीत चुका था। वैश्विक हालात में कोई सुधार नहीं था। लेकिन रमेश की जिंदगी में बदलाव शुरू हो चुका था—मजबूरी में।
पेट्रोल के दाम इतने बढ़ गए कि उसने स्कूटर छोड़कर पैदल चलना शुरू कर दिया। शुरुआत में हर कदम उसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति की साज़िश लगता था। लेकिन धीरे-धीरे वही रास्ता उसका साथी बन गया।
उसे नए शॉर्टकट मिले, नई दुकानें दिखीं, और सबसे खास—लोगों से बात करने का मौका मिला, जिनके पास से वह पहले तेज़ी से निकल जाता था।
इसी दौरान उसकी नज़र पड़ी—बाज़ार के एक कोने पर बैठी सब्ज़ी बेचने वाली लड़की पर।
रंग-बिरंगा दुपट्टा, चेहरे पर मुस्कान, और सजी-संवरी सब्ज़ियाँ—जैसे कोई कला प्रदर्शनी हो।
रमेश को उसका नाम नहीं पता था, लेकिन पिछले तीन दिनों से वह हर दिन सब्ज़ियाँ खरीद रहा था—चाहे ज़रूरत हो या नहीं।
पहले दिन टमाटर, दूसरे दिन भिंडी (जो घर में कोई नहीं खाता), और तीसरे दिन तो वह बातों में इतना खो गया कि 2 किलो लौकी खरीद लाया।
घर पर उसकी पत्नी सुनीता हर बार हैरान होती—“ये सब क्यों?”
और रमेश हर बार कोई न कोई बहाना बना देता—“ये रणनीतिक खरीदारी है।”
लेकिन असली बदलाव तब आया, जब एक दिन वह मुस्कुराते हुए घर लौटा और गर्व से बोला—“वैश्विक युद्ध चलता रहेगा… लेकिन आज मैं बहुत खुश हूँ।”
कारण पूछने पर उसने सच्चाई बता दी—“क्योंकि आज मैंने सबसे खूबसूरत सब्ज़ीवाली से सब्ज़ी खरीदी।”
तीन सेकंड की खामोशी।
और फिर सुनीता का फैसला—“कल से सब्ज़ी मैं लाऊंगी।”
यहीं से शुरू होती है असली कहानी—घरेलू कूटनीति की।
अगले दिन जब सुनीता बाज़ार पहुंची, तो सब्ज़ीवाली ने मुस्कुराकर कहा—“आप रमेश भैया की पत्नी हैं ना?”
एक पल के लिए माहौल ठहर गया। लेकिन फिर दोनों के बीच जो बातचीत हुई, उसने सारी गलतफहमियाँ दूर कर दीं।
सुनीता को पता चला कि रमेश से 10 रुपये ज़्यादा लिए जा रहे थे—क्योंकि उसने कभी मोलभाव ही नहीं किया।
दोनों हँस पड़ीं।
घर लौटकर सुनीता ने रमेश से कहा—“कल से तुम ही सब्ज़ी लेने जाओगे।”
रमेश के लिए यह राहत की सांस थी—लेकिन साथ ही एक नई चुनौती भी।
अब वह हर दिन बाज़ार जाता, लेकिन एक फर्क था—अब सुनीता की निगरानी भी साथ थी।
एक दिन जब वह फिर सब्ज़ीवाली से बातें कर रहा था, पीछे से सुनीता की आवाज़ आई—“बस पैसे सही देना।”
तीनों हँस पड़े।
यहीं रमेश को एक बड़ी बात समझ आई—यह अब कोई जंग नहीं थी, यह एक गठबंधन था।
इस पूरी कहानी में एक गहरी सच्चाई छुपी है।
वैश्विक राजनीति, युद्ध, महंगाई—ये सब बड़े मुद्दे हैं, लेकिन एक आम इंसान की जिंदगी में असली जंग कहीं और चल रही होती है।
घर के अंदर।
रिश्तों में।
छोटी-छोटी बातों में।
रमेश की नजर में, दुनिया की राजनीति समझना आसान है—लेकिन घर की राजनीति समझना लगभग नामुमकिन।
निष्कर्ष: आप विश्व युद्ध से बच सकते हैं, महंगाई झेल सकते हैं, लेकिन एक साथ अपनी पत्नी और अपने “क्रश” के बीच संतुलन बनाना—यही असली कूटनीति है।
और शायद यही एक आम भारतीय की सबसे बड़ी कला भी।

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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