डॉ. विजय गर्ग
आज का दौर तीव्र प्रतिस्पर्धा का दौर है। हर विद्यार्थी, हर अभिभावक और हर शैक्षणिक संस्थान एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर है—सफलता। लेकिन इस अंधी दौड़ में एक अहम सवाल धीरे-धीरे पीछे छूटता जा रहा है: क्या हम वास्तव में शिक्षा हासिल कर रहे हैं, या सिर्फ परीक्षा पास करने की तकनीक सीख रहे हैं?
प्रतिस्पर्धा का बढ़ता दबाव
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में प्रतियोगी परीक्षाओं का महत्व अत्यधिक बढ़ गया है। डॉक्टर, इंजीनियर या प्रशासनिक अधिकारी बनने की चाह में विद्यार्थी बहुत कम उम्र से ही कोचिंग और टेस्ट सीरीज़ के चक्र में फंस जाते हैं। इस दबाव के चलते वे विषयों की गहराई को समझने के बजाय अंकों और रैंक पर अधिक ध्यान देने लगते हैं।
बुनियादी शिक्षा की उपेक्षा
बुनियादी शिक्षा का अर्थ केवल पढ़ना-लिखना नहीं, बल्कि समझना, सोचना और प्रश्न पूछने की क्षमता विकसित करना है। दुर्भाग्यवश, आज की शिक्षा प्रणाली में यह पहलू कमजोर होता जा रहा है।
विद्यार्थी रटने की प्रवृत्ति के शिकार हो रहे हैं
गणित, भाषा और विज्ञान की मूल अवधारणाएं कमजोर रह जाती हैं
जिज्ञासा और रचनात्मकता में कमी आ रही है
जब नींव ही कमजोर होगी, तो सफलता की इमारत अधिक समय तक टिक नहीं सकती।
कोचिंग संस्कृति का प्रभाव
कोचिंग संस्थानों के बढ़ते प्रभाव ने शिक्षा को एक व्यवसाय का रूप दे दिया है। यहां ज्ञान अर्जन के बजाय परीक्षा में अधिक अंक लाना प्राथमिक उद्देश्य बन गया है। इसका परिणाम यह है कि:
विद्यार्थी स्कूल शिक्षा को हल्के में लेने लगते हैं
अवधारणात्मक समझ की जगह शॉर्टकट्स और ट्रिक्स पर निर्भरता बढ़ती है
शिक्षा का मूल उद्देश्य धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है
मानसिक और भावनात्मक प्रभाव
यह प्रतिस्पर्धा केवल शैक्षणिक स्तर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है।
तनाव और चिंता में वृद्धि
असफलता का डर
आत्मविश्वास में कमी
कई बार विद्यार्थी अपनी वास्तविक रुचियों और प्रतिभाओं को पहचान ही नहीं पाते, क्योंकि वे एक तय ढर्रे पर चलने को मजबूर होते हैं।
शिक्षा का बदलता उद्देश्य
शिक्षा का मूल उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास—नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक—होता है। किंतु आज शिक्षा का अर्थ केवल नौकरी प्राप्त करना रह गया है। इस संकीर्ण सोच ने शिक्षा को उसके वास्तविक स्वरूप से दूर कर दिया है।
समाधान की दिशा
इस समस्या का समाधान केवल नीतियों में बदलाव से नहीं, बल्कि सामूहिक सोच में परिवर्तन से संभव है:
अवधारणात्मक और समझ-आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए
स्कूलों में शिक्षण को रोचक, व्यावहारिक और प्रयोगात्मक बनाया जाए
अभिभावक बच्चों पर अनावश्यक दबाव डालने से बचें
विद्यार्थियों को उनकी रुचियों और क्षमताओं के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिले
निष्कर्ष
सफलता की दौड़ में शामिल होना गलत नहीं है, लेकिन यदि इस दौड़ में हम अपनी बुनियादी शिक्षा को खो दें, तो यह सफलता अधूरी रह जाती है। मजबूत नींव ही स्थायी और सार्थक सफलता की कुंजी है।
यदि शिक्षा को पुनः उसके मूल उद्देश्य—ज्ञान, समझ और व्यक्तित्व विकास—की ओर मोड़ा जाए, तभी हम एक सशक्त, संतुलित और जागरूक समाज का निर्माण कर सकते हैं।
— डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्रिंसिपल, मलोट (पंजाब)










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