सरकारी भवनों के नाम पर फिर खुला “टेंडर खेल”, ठेकेदारों में चर्चा तेज
बाबूगिरी हिंदी न्यूज़
चंडीगढ़, 22 मई। चंडीगढ़ प्रशासन के इंजीनियरिंग विभाग द्वारा जारी किए गए एक नए ई-टेंडर ने सरकारी कार्यप्रणाली और टेंडर सिस्टम की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी आवासीय भवनों में इलेक्ट्रिकल इंस्टॉलेशन और मेंटेनेंस के नाम पर जारी इस टेंडर को लेकर विभागीय गलियारों और ठेकेदारों के बीच चर्चाओं का बाजार गर्म है। अंधा बांटे रेवड़ी, फिर फिर अपनो को दे। ये कहावत चंडीगढ़ प्रशासन के इंजीनिरिंग विंग पर स्टिक बैठती है।
करीब 3.41 लाख रुपये के इस कार्य के लिए ई-टेंडर जारी किया गया है, लेकिन जिस प्रकार की जटिल शर्तें और औपचारिकताएं लगाई गई हैं, उससे छोटे और स्वतंत्र ठेकेदार खुद को बाहर महसूस कर रहे हैं। आरोप है कि ऐसे टेंडरों की शर्तें अक्सर पहले से तय फर्मों और “चहेते ठेकेदारों” को लाभ पहुंचाने के हिसाब से तैयार की जाती हैं।
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छोटे ठेकेदारों की एंट्री लगभग बंद!
टेंडर में वैध लाइसेंस, जीएसटी, एफिडेविट, ऑनलाइन ईएमडी, तकनीकी दस्तावेज, प्रदर्शन गारंटी समेत कई ऐसी शर्तें जोड़ी गई हैं, जिन्हें पूरा करना छोटे ठेकेदारों के लिए आसान नहीं माना जा रहा। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर कुछ लाख रुपये के सामान्य मेंटेनेंस कार्य के लिए इतनी भारी-भरकम प्रक्रिया क्यों लागू की गई?
सूत्रों का कहना है कि प्रशासनिक विभागों में लंबे समय से “फिक्स टेंडर मॉडल” पर काम होने की चर्चाएं होती रही हैं, जहां कागजों में प्रतिस्पर्धा दिखाई जाती है लेकिन असली लाभ सीमित लोगों तक पहुंचता है।
सरकारी भवनों की हालत बदहाल, फिर भी हर साल लाखों के टेंडर
सबसे बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि हर वर्ष सरकारी भवनों के रखरखाव और इलेक्ट्रिकल कार्यों पर लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, तो फिर कई सरकारी रिहायशी परिसरों में बिजली व्यवस्था बदहाल क्यों बनी हुई है?
कई स्थानों पर खराब वायरिंग, टूटी लाइटें, खुले बिजली बोर्ड और सुरक्षा मानकों की अनदेखी की शिकायतें पहले भी सामने आती रही हैं। इसके बावजूद बार-बार नए टेंडर जारी होने से विभागीय कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठ रही हैं।
ई-टेंडरिंग के नाम पर सिर्फ औपचारिकता?
हालांकि प्रशासन दावा करता है कि पूरी प्रक्रिया ई-टेंडरिंग के माध्यम से पारदर्शी बनाई गई है, लेकिन ठेकेदारों का आरोप है कि तकनीकी शर्तों और दस्तावेजी पेचीदगियों के जरिए आम प्रतिभागियों को बाहर कर दिया जाता है।
जानकारों का कहना है कि कई मामलों में निविदाएं केवल औपचारिकता बनकर रह जाती हैं और परिणाम पहले से तय होने की आशंकाएं बनी रहती हैं।
जवाबदेही तय करने की मांग
सामाजिक कार्यकर्ताओं और कुछ ठेकेदारों ने मांग उठाई है कि इंजीनियरिंग विभाग के टेंडरों की स्वतंत्र एजेंसी से जांच करवाई जाए और यह सार्वजनिक किया जाए कि पिछले वर्षों में किन फर्मों को कितने कार्य आवंटित किए गए।
लोगों का कहना है कि यदि सरकारी धन जनता की सुविधाओं पर खर्च हो रहा है तो उसकी गुणवत्ता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।













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