June 5, 2026 4:29 am

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दिल्ली के दरबार और लोकतंत्र का भ्रम क्लब संस्कृति, सत्ता नेटवर्क और आम आदमी की दूरी

डॉ. प्रियंका सौरभ
दिल्ली केवल भारत की राजधानी नहीं, बल्कि सत्ता की वह पुरानी चौसर है जहाँ मोहरे बदलते रहते हैं, पर खेल वही रहता है। यहाँ इतिहास केवल किताबों में नहीं बसता, बल्कि इमारतों की दीवारों, बंद दरवाज़ों और चमचमाते गलियारों में साँस लेता है। इस शहर में कुछ रास्ते जनता के लिए होते हैं और कुछ रास्ते उन लोगों के लिए, जिन्हें किसी परिचय की आवश्यकता नहीं पड़ती। लोकतंत्र की भीड़ भरी सड़कों के समानांतर यहाँ सत्ता के ऐसे शांत दरबार बसे हुए हैं, जहाँ प्रवेश केवल उन्हीं को मिलता है जिनके पास प्रभाव, वंश, संपर्क और सामाजिक प्रतिष्ठा का अदृश्य पासपोर्ट होता है। दिल्ली जिमखाना क्लब इसी स्थायी सत्ता का एक चमकदार प्रतीक है।

हाल के दिनों में जब इस क्लब को खाली कराने और उसकी लीज समाप्त होने की चर्चा तेज हुई, तब पहली बार लगा कि किसी ने उस दुनिया की ओर उंगली उठाई है जिसे अब तक छूना भी असंभव माना जाता था। यह केवल एक भवन का प्रश्न नहीं है; यह उस मानसिकता का प्रश्न है जिसने लोकतंत्र के भीतर भी अभिजात्य साम्राज्य खड़े कर दिए। यह उस व्यवस्था पर सवाल है जिसमें कुछ लोग हमेशा मालिक बने रहते हैं और बाकी लोग केवल दर्शक।

दिल्ली जिमखाना क्लब की स्थापना अंग्रेजों ने 1913 में “इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब” के रूप में की थी। वह दौर केवल राजनीतिक गुलामी का नहीं, बल्कि सामाजिक अपमान का भी दौर था। अंग्रेजों ने क्लबों को मनोरंजन स्थल से अधिक सामाजिक छँटनी के उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया। वहाँ वही व्यक्ति “सभ्य” माना जाता था जो अंग्रेजी जीवन शैली के निकट हो। भारतीयों के लिए ऐसे क्लबों के दरवाज़े या तो बंद रहते थे, या इतने संकरे कि प्रवेश करते हुए भी उन्हें हीनता का अनुभव हो। भाषा, पहनावा, खान-पान और रंग तक से सामाजिक स्तर तय किया जाता था।
आजादी आई, तिरंगा लहराया, अंग्रेज चले गए, लेकिन उनकी बनाई हुई सामाजिक संरचनाएँ पूरी तरह नहीं टूटीं। वायसराय हाउस राष्ट्रपति भवन बन गया, आईसीएस का नाम आईएएस हो गया, पर सत्ता की आत्मा बहुत अधिक नहीं बदली। पहले जिन कुर्सियों पर गोरे साहब बैठते थे, वहाँ बाद में भूरे साहब बैठने लगे। लोकतंत्र आया, लेकिन अभिजात्य संस्कृति जस की तस बनी रही।

दिल्ली जिमखाना धीरे-धीरे उस वर्ग का ठिकाना बन गया जिसे लोकतंत्र में भी कभी जनता के बीच जाकर स्वयं को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यहाँ सदस्यता मिलना किसी परीक्षा को पास करने से अधिक कठिन माना जाता है। वर्षों का इंतजार, लाखों की फीस और प्रभावशाली संपर्क—ये सब मिलकर इसे सत्ता के एक ऐसे दुर्ग में बदल देते हैं जहाँ केवल वही पहुँच सकता है जिसके पास विशेषाधिकार की चाबी हो। यह क्लब खेल से अधिक सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रमाणपत्र बन गया।

विडंबना देखिए कि लोकतंत्र समानता की बात करता है, लेकिन राजधानी के हृदय में ऐसे द्वीप मौजूद हैं जहाँ समानता प्रवेश द्वार पर ही दम तोड़ देती है। देश का सामान्य नागरिक टैक्स देता है, पर जिन जमीनों पर ये क्लब खड़े हैं, वहाँ उसका सहज प्रवेश तक संभव नहीं। गरीब की झुग्गी पर बुलडोज़र चल सकता है, फुटपाथ पर बैठे रेहड़ी वाले को हटाया जा सकता है, लेकिन हजारों करोड़ की सरकारी जमीनों पर फैले इन स्थायी साम्राज्यों से प्रश्न पूछने की हिम्मत बहुत कम लोग कर पाते हैं।
दिल्ली की सबसे क्रूर सच्चाई यही है कि यहाँ गरीब आदमी हमेशा अस्थायी होता है और अमीर आदमी हमेशा स्थायी। रिक्शावाले से पूछा जाता है कि “कब हटोगे?”, लेकिन दशकों से सरकारी जमीनों पर बने एलीट क्लबों से कोई नहीं पूछता कि उनका अधिकार कब समाप्त होगा। यह केवल आर्थिक असमानता नहीं, बल्कि मानसिक असमानता है। समाज ने इसे प्रतिष्ठा और मर्यादा का नाम देकर सामान्य बना दिया है।
लेकिन कहानी केवल जिमखाना तक सीमित नहीं है। दिल्ली गोल्फ क्लब हो, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर हो या इंडिया हैबिटेट सेंटर—ये सभी केवल संस्थान नहीं, बल्कि सत्ता के समानांतर संसार हैं। दिल्ली गोल्फ क्लब में केवल खेल नहीं होता; वहाँ सत्ता और पूँजी का मौन संवाद चलता है। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर बाहर से सांस्कृतिक मंच दिखता है, पर भीतर वह सेवानिवृत्त सत्ता का पुनर्जन्म स्थल बन जाता है। वहाँ वे लोग मिलते हैं जिनके पद समाप्त हो चुके होते हैं, लेकिन प्रभाव अब भी जीवित रहता है। इंडिया हैबिटेट सेंटर में वातानुकूलित सभागारों में गरीबी और सामाजिक न्याय पर चर्चाएँ होती हैं, जबकि उन्हीं चर्चाओं के बाहर खड़ा सामान्य नागरिक उस दुनिया का हिस्सा भी नहीं बन पाता जिसकी बातें उसके नाम पर की जा रही होती हैं।
यही स्थायी सत्ता की असली ताकत है।

सरकारें बदलती हैं, मंत्री बदलते हैं, राजनीतिक नारे बदलते हैं, लेकिन यह नेटवर्क हर शासन में सुरक्षित रहता है। यह वह वर्ग है जिसे चुनावी हार का भय नहीं होता, क्योंकि उसकी शक्ति केवल राजनीति से नहीं, सामाजिक पहुँच और संस्थागत प्रभाव से आती है। यही कारण है कि दिल्ली को केवल राजनीतिक राजधानी नहीं, बल्कि स्थायी सत्ता की राजधानी भी कहा जा सकता है।

इतिहास गवाह है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग भी कई बार इस संरचना को चुनौती देने में असफल रहे। राजीव गांधी के दौर में सुरक्षा कारणों से इस क्लब को हटाने की चर्चा हुई, लेकिन वह संभव नहीं हो पाया। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं थी; यह उस गहरे प्रभाव का संकेत था जो ऐसे संस्थानों के पास मौजूद रहा है। वर्षों से इन क्लबों के भीतर रिश्ते बने, नीतियाँ प्रभावित हुईं और सत्ता के अनौपचारिक गठजोड़ तैयार होते रहे। लोकतंत्र के समानांतर यह एक ऐसी सामाजिक सत्ता थी जो किसी चुनाव से नियंत्रित नहीं होती।

आज जब इन संस्थानों की वैधता, लीज और सामाजिक औचित्य पर प्रश्न उठ रहे हैं, तो बहस केवल कानूनी नहीं रह जाती। यह उस मानसिकता पर सवाल बन जाती है जिसने अंग्रेजों द्वारा निर्मित श्रेष्ठताबोध को स्वतंत्र भारत में भी सम्मान का प्रतीक बनाए रखा। दुर्भाग्य यह है कि हमने अंग्रेजों को तो विदा किया, पर अंग्रेजियत को नहीं। अंग्रेजी भाषा, विदेशी पहनावा, क्लब संस्कृति और सत्ता से निकटता को हमने आधुनिकता और प्रतिष्ठा का पर्याय बना दिया।
यही वह संस्कृति थी जिसने लोकतंत्र को भी दो हिस्सों में बाँट दिया—एक वह भारत जो लाइन में खड़ा रहता है, दूसरा वह भारत जिसके लिए दरवाज़े स्वयं खुल जाते हैं। एक वह भारत जो मतदान करता है, दूसरा वह भारत जो निर्णय लेता है।

यह भी सच है कि केवल एक क्लब को चुनौती देने से व्यवस्था नहीं बदलती। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता संरचना का परिवर्तन है। यदि केवल प्रतीकात्मक कार्रवाई हो और बाकी संस्थान वैसे ही चलते रहें, तो यह बहस अधूरी रह जाएगी। लेकिन यदि यह प्रश्न व्यापक रूप से उठता है कि सरकारी जमीनों पर बने निजी अभिजात क्लबों का सामाजिक और नैतिक औचित्य क्या है, तब यह विमर्श ऐतिहासिक महत्व प्राप्त करेगा।

दरअसल, संघर्ष केवल जमीन का नहीं, आत्मसम्मान का भी है। सवाल यह है कि क्या भारत अपनी लोकतांत्रिक आत्मा को सचमुच स्वीकार करेगा, या फिर औपनिवेशिक श्रेष्ठताबोध को नए चेहरों के साथ आगे बढ़ाता रहेगा। लोकतंत्र केवल संसद की कुर्सियों में नहीं बसता; वह उस क्षण में भी परखा जाता है जब एक सामान्य नागरिक किसी शक्ति-संपन्न दरवाज़े के सामने खड़ा होता है। यदि वह दरवाज़ा केवल इसलिए बंद हो कि उसके पास वंश, संपर्क या विशेष वर्ग की पहचान नहीं है, तो लोकतंत्र अधूरा है।

भारत को क्लब चाहिए, सांस्कृतिक केंद्र चाहिए, खेल संस्थाएँ चाहिए—लेकिन ऐसे संस्थान नहीं जो जनता से कटे हुए निजी साम्राज्य बन जाएँ। ऐसे मंच चाहिए जो भारतीयता का सम्मान करें, न कि औपनिवेशिक श्रेष्ठता का पुनरुत्पादन। लोकतंत्र का अर्थ केवल वोट डालना नहीं, बल्कि बराबरी का अनुभव करना है।
शायद समय आ गया है कि भारत अपने लोकतंत्र को केवल संविधान की किताबों से निकालकर उन बंद दरवाज़ों तक ले जाए जहाँ आज भी बराबरी प्रवेश पाने की प्रतीक्षा कर रही है।

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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