June 10, 2026 1:47 pm

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चंडीगढ़ को प्रशासनिक ओवरलैप नहीं, सुशासन सुधारों की जरूरत

नियोजित शहर की पहचान बचाने के लिए संस्थागत संतुलन और जवाबदेही को मजबूत करना होगा
लेखक: आर. के. गर्ग
चंडीगढ़ केवल एक शहर नहीं, बल्कि भारत में आधुनिक शहरी नियोजन का एक सफल प्रयोग है। देश के प्रथम नियोजित शहर के रूप में इसकी पहचान सुव्यवस्थित सेक्टरों, बेहतर बुनियादी ढांचे, हरित वातावरण और अनुशासित प्रशासनिक व्यवस्था के कारण बनी। वर्षों तक यह शहर प्रशासनिक दक्षता और सुशासन का उदाहरण माना जाता रहा। लेकिन समय के साथ प्रशासनिक ढांचे में कुछ ऐसी प्रवृत्तियां विकसित होती दिखाई दे रही हैं, जो भविष्य में संस्थागत संतुलन और जवाबदेही के लिए चुनौती बन सकती हैं।
यह मुद्दा किसी अधिकारी विशेष की कार्यशैली या क्षमता का नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक संरचना का है, जिसमें धीरे-धीरे अधिकारों का केंद्रीकरण और संस्थागत सीमाओं का धुंधलापन बढ़ता दिखाई दे रहा है। यदि इस स्थिति पर समय रहते विचार नहीं किया गया, तो इसका असर प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक सेवाओं की गुणवत्ता पर पड़ सकता है।

जब संस्थाओं की सीमाएं धुंधली होने लगती हैं
चंडीगढ़ में यूटी प्रशासन, जिला प्रशासन, नगर निगम, चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड, सिटको, स्मार्ट सिटी लिमिटेड और अनेक बोर्ड, सोसायटियां व स्वायत्त संस्थाएं कार्यरत हैं। इन सभी का गठन अलग-अलग उद्देश्यों और जिम्मेदारियों के साथ किया गया था, ताकि प्रशासनिक कार्यों का विशेषज्ञता आधारित विभाजन हो सके।
लेकिन वर्तमान व्यवस्था में कई बार ऐसा दिखाई देता है कि विभिन्न संस्थाओं के बीच की प्रशासनिक सीमाएं स्पष्ट नहीं रह गई हैं। कई महत्वपूर्ण विभागों और संस्थाओं का अतिरिक्त प्रभार एक ही अधिकारी को सौंप दिया जाता है। यह व्यवस्था अल्पकालिक प्रशासनिक सुविधा तो दे सकती है, लेकिन लंबे समय में संस्थागत स्वतंत्रता और प्रभावी निगरानी व्यवस्था को कमजोर कर सकती है।

सुशासन की रीढ़ है ‘चेक एंड बैलेंस’
किसी भी आधुनिक लोकतांत्रिक प्रशासन की सफलता उसके “चेक एंड बैलेंस” सिस्टम पर निर्भर करती है। नीति बनाने वाली संस्था, उसे लागू करने वाली एजेंसी और उसकी निगरानी करने वाला तंत्र अलग-अलग और स्वतंत्र होना चाहिए।
जब एक ही अधिकारी कई संस्थाओं का नेतृत्व करता है, तब यह संतुलन प्रभावित हो सकता है। ऐसी स्थिति में नीति निर्माण, नियमन और क्रियान्वयन के बीच आवश्यक दूरी कम हो जाती है। भले ही अधिकारी पूरी ईमानदारी और निष्पक्षता से कार्य कर रहा हो, लेकिन संस्थागत व्यवस्था केवल व्यक्तिगत निष्ठा पर नहीं बल्कि मजबूत संरचनात्मक संतुलन पर टिकती है।
स्वायत्त निकायों की घटती स्वतंत्रता चिंता का विषय
चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड, सिटको और अन्य सार्वजनिक संस्थाओं का गठन इसलिए किया गया था ताकि वे विशेषज्ञता आधारित निर्णय ले सकें और अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकें। इसी प्रकार नगर निगम को नागरिकों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए स्थापित किया गया था।
लेकिन यदि इन संस्थाओं की प्रशासनिक स्वायत्तता लगातार कम होती है और निर्णय लेने की शक्ति सीमित हाथों में सिमटती जाती है, तो इनके गठन का मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है। किसी भी शहर का स्वस्थ प्रशासन तभी संभव है, जब उसकी संस्थाएं मजबूत, स्वतंत्र और जवाबदेह हों।

अस्थायी नेतृत्व से प्रभावित होती है नीतियों की निरंतरता
चंडीगढ़ जैसे शहर में शहरी नियोजन, पर्यटन, आवास, परिवहन, वित्तीय प्रबंधन और संपदा प्रशासन जैसे विषयों पर दीर्घकालिक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।
लेकिन अधिकारियों के लगातार स्थानांतरण और एक अधिकारी के पास कई विभागों के अतिरिक्त प्रभार होने से किसी एक क्षेत्र पर निरंतर ध्यान देना कठिन हो जाता है। इससे न केवल योजनाओं की गति प्रभावित होती है, बल्कि संस्थागत स्मृति और प्रशासनिक निरंतरता भी कमजोर पड़ती है।

लंबे समय से जमे कर्मचारियों पर बढ़ती निर्भरता
प्रशासनिक ढांचे में एक अन्य महत्वपूर्ण असंतुलन भी दिखाई देता है। जहां वरिष्ठ अधिकारी सीमित अवधि के लिए पदों पर रहते हैं, वहीं कई विभागों में संविदा, आउटसोर्स, सोसायटी और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी वर्षों तक एक ही स्थान पर कार्यरत रहते हैं।
अनेक मामलों में इनके लिए कोई स्पष्ट स्थानांतरण या रोटेशन नीति नहीं होती। परिणामस्वरूप विभागीय प्रक्रियाओं और कार्यप्रणाली की वास्तविक जानकारी कुछ चुनिंदा कर्मचारियों तक सीमित हो जाती है। नए अधिकारियों को स्वाभाविक रूप से ऐसे कर्मचारियों पर निर्भर रहना पड़ता है।
अनुभव निश्चित रूप से मूल्यवान होता है, लेकिन अत्यधिक निर्भरता जवाबदेही और पारदर्शिता को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि कई विशेषज्ञ लंबे समय से कार्यरत कर्मचारियों के लिए भी रोटेशन और निगरानी व्यवस्था की आवश्यकता पर बल देते हैं।

नागरिकों के लिए जवाबदेही का संकट
आज आम नागरिक के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसे यह समझने में कठिनाई होती है कि उसकी समस्या के समाधान के लिए वास्तव में जिम्मेदार संस्था कौन-सी है।
कई बार सड़क एक एजेंसी के अधीन होती है, पार्किंग दूसरी संस्था देखती है, रखरखाव किसी तीसरे विभाग के पास होता है और अतिक्रमण नियंत्रण की जिम्मेदारी किसी चौथी एजेंसी की होती है। आवास संबंधी मामलों में नगर निगम, एस्टेट ऑफिस और हाउसिंग बोर्ड की भूमिकाएं भी आपस में जुड़ी होती हैं।
इस स्थिति में नागरिकों को एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक भटकना पड़ता है, जबकि जवाबदेही स्पष्ट नहीं हो पाती। एक नियोजित शहर के लिए यह स्थिति आदर्श नहीं मानी जा सकती।
अब समय है व्यापक प्रशासनिक समीक्षा का
चंडीगढ़ को नई प्रशासनिक संस्थाएं बनाने से अधिक आवश्यकता मौजूदा ढांचे की व्यापक समीक्षा की है। प्रत्येक संस्था की भूमिका, अधिकार क्षेत्र और जवाबदेही को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए।
प्रमुख संस्थाओं को समर्पित नेतृत्व दिया जाए और एक ही अधिकारी को लंबे समय तक कई महत्वपूर्ण प्रभार देने की परंपरा पर पुनर्विचार किया जाए। नीति निर्माण, नियमन और क्रियान्वयन के बीच संस्थागत दूरी बनाए रखना सुशासन की बुनियादी आवश्यकता है।

क्या होने चाहिए सुधार?
चंडीगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाने के लिए कुछ प्रमुख कदम उठाए जा सकते हैं—
प्रत्येक संस्था की भूमिका और अधिकार क्षेत्र की स्पष्ट परिभाषा।
महत्वपूर्ण विभागों और निकायों के लिए समर्पित नेतृत्व।
नीति निर्माण, नियमन और क्रियान्वयन के बीच संतुलन।
स्वायत्त निकायों को अधिक पेशेवर स्वतंत्रता।
प्रमुख पदों पर न्यूनतम स्थिर कार्यकाल सुनिश्चित करना।
संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए पारदर्शी स्थानांतरण एवं रोटेशन नीति।
सतर्कता, आंतरिक लेखा परीक्षण और जवाबदेही तंत्र को मजबूत करना।
प्रशासनिक ओवरलैप और केंद्रीकरण की समीक्षा के लिए स्वतंत्र गवर्नेंस ऑडिट कराना।
नियोजित शहर को चाहिए नियोजित शासन व्यवस्था
चंडीगढ़ की पहचान केवल उसकी चौड़ी सड़कों, हरित पट्टियों और सुनियोजित सेक्टरों से नहीं है। उसकी असली ताकत उसकी प्रशासनिक स्पष्टता और संस्थागत व्यवस्था रही है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासनिक समन्वय और संस्थागत स्वतंत्रता के बीच संतुलन कायम रखा जाए। यदि अधिकारों का अत्यधिक केंद्रीकरण बढ़ता है और जवाबदेही बिखरती है, तो सुशासन की गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है।
चंडीगढ़ एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। यदि समय रहते संस्थागत सुधारों की दिशा में कदम उठाए गए, तो यह शहर आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुशासन और प्रशासनिक दक्षता का आदर्श बना रह सकता है। आखिरकार, एक नियोजित शहर को नियोजित शासन व्यवस्था भी चाहिए।

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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