रंग ए महफिल चाहता है इक मुकम्मल इंकलाब
चंद शम्माओं के भड़कने से भौर नहीं हुआ करती
अपने यहां दशकों से एक बड़ा मुददा है खराब शिक्षा व्यवस्था का। दुर्भाग्य से किसी भी सरकार ने इस समस्या का गंभीरता से निराकरण की दिशा में ठोस पहलकदमी नहीं किया। पेपर लीक इसी बदहाल शिक्षा व्यवस्था-सिस्टम का एक छोटा सा हिस्सा-किस्सा है। इस से बड़ा नाजुक मसला है कि हमारे यहां शिक्षा व्यवस्था ऐसी है जहां हम शिक्षित होकर भी शिक्षित नहीं होते। हम से बेहतर तो अनपढ होते हैं। हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में अक्सर ऐसा होता है कि हम कहीं के नहीं रहते। ना हम पढे लिखे होते हैं और ना अनपढ। ये हमें किसी लायक नहीं छोड़ती। ना इधर का रखती,ना उधर का। हम बीच के होते हैं। और जो बीच के होते हैं, वो कहीं के नहीं होते। किसी के नहीं होते। आज के इस लेख में इसी समस्या और उसके समाधानों पर चर्चा करते हैं। पहली तो ये कि शिक्षा का सीधा सबंध रोजगार से होना चाहिए। शिक्षा ऐसी हो जो न केवल डिग्री दे,बल्कि इंसान को इंसान बनाएं। उस में नैतिक और सामाजिक मूल्यों को सम्माहित किया जाए। शिक्षित होने का एक मतलब ये भी हो कि व्यक्ति को रोजगार की कोई कमी नहीं रहेगी। अब हमारे यहां करोड़ों लोग बेरोजगार इसलिए ही हैं कि उनके पास डिग्री तो है,लेकिन उनको कोई काम नहीं आता। यंू तो उनके पास बीए एमए,एमफिल,पीएचडी न जाने किस किस की डिग्री हैं,लेकिन वो एक एप्लीकेशन तक नहीं लिख सकते। वकील की डिग्री हथिया ली है,लेकिन कानून की जानकारी से दूर दूर तक वास्ता नहीं।
स्कूल जाना आनंददायी हो
हमारे यहां शिक्षा की शुरूआत स्कूलों से होती है। स्कूल जाना ऐसा हो कि बच्चों को वहां जाने का चाव चढ जाए। वहां पर शुरूआत में उनको पढाई से ज्यादा एक्सट्रा कैरिकुल एक्टिविटी में लगाया जाए। पर अपने यहां तो बच्चे का बस्ता ही बच्चे के वजन से ज्यादा हो जाता है। किसी तरह से वो स्कूल से पिंड छुटा कर घर पहुंचता है तो होमवर्क का पंगा शुरू हो जाता है। जुम्मा जुम्मा उसे स्कूल में दाखिला लिए चार दिन होते हैं कि उसके मासिक और तिमाही टैस्ट शुरू हो जाते हैं। शिक्षकों का और अभिभावकों का सारा जोर इसमें होता है कि बच्चा ज्यादा से ज्यादा नंबर लाए। कक्षा में-स्कूल में पहले स्थान पर आए। जो माता पिता उच्च पदों पर पहुंच गए तो उनका सपना है कि बच्चा उन जैसा सा होनहार बन जाए। जो माता पिता जीवन में ज्यादा कुछ हासिल नहीं कर पाए वो ये सोचते हैं कि हमारा बच्चा हम से कई गुना आगे निकल जाए। हमारे खानदान का नाम रौशन कर जाए। सारी उम्मीदों-अरमानों का बोझ एक नन्हीं सी जान बच्चे पर डाल दिया जाता है। कई बच्चे इन उम्मीदों का लोड लेने में सक्षम नहीं है,नतीजा वो आत्महत्या करने पर विवश हो जाते हैं।
मुनाफे का कारोबार बनी शिक्षा
रही सही कसर अपने यहां शिक्षक पूरी कर देते हैं। एक समय हमारे यहां सरकारी स्कूलों में बेहतरीन शिक्षक होते थे। तब प्राइवेट स्कूलों का कहीं नामों निशान नहीं था। सरकारी स्कूल के बालक ही आईएएस,डाक्टर,वैज्ञानिक और न जाने क्या क्या बना करते थे। अब बहुत से सरकारी शिक्षक तो प्रोपर्टी डीलर बने हुए हैं। कोई भैंस खरीदने बेचेने का कारोबार कर रहा है तो कोई अनाज के बिजनैस में जुटा है। बहुत से सरकारी शिक्षकों ने तो अपनी जगह दूसरों को ही इस काम के लिए रख लिया है कि वो ही उनके स्थान पर स्कूलों में पढाएंगे। कुल मिला कर इन शिक्षकों का पढाई के अलावा हर चीज पर ध्यान है। ये सब काम करते हैं सिवाय बच्चों को पढाने का। सरकारी स्कूलों में बेहतर आधारभूत ढांचा है। बेहतर वेतन है। इसके बावजूद यहां पढाई का स्तर प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले काफी निम्न है। अब प्राइवेट शिक्षण संस्थानों की बाढ आई हुई है। शिक्षा जो कभी सेवा हुआ करती थी अब बड़ा बिजनैस बन गई है। हर कोर्स के लिए मौटी फीस वसूली जाती है। हालत ये है कि प्राइवेट कालेज डाक्टर की पढाई करवाने के लिए 50 लाख से एक करोड़ रूपए तक वसूल लेते हैं। हस्पताल और शिक्षण संस्थान मुनाफा कमाने वाले सबसे बड़े कारोबार में से एक हैं और लगभग हर बड़ा बिजनैस हाउस इस कारोबार में घुसा हुआ है।
डिग्री तो है, लेकिन हुनर नहीं
कुछ समय पहले एक रिपोर्ट आई कि अमेरिका और कनाडा गए करीब 40 हजार भारतीय युवाओं की डिग्रियां फर्जी पाई गई। जब इन युवाओं की डिग्री को इन देशों ने इंडिया में चैक करवाया गया तो यहां की यूनिवर्सिटी से ये जवाब आया कि इस छात्र ने तो कभी उनके यहां दाखिला ही नहीं लिया। सब जुगाड़ से चल रहा है। अगर ये डिग्री असली भी होती तो ऐसे युवा भी बहुत होते जिनके पास हुनर नहीं होता। अगर उन से उनकी पढाई के बारे में कुछ पूछ लिया जाए तो उनकी झट से पोल खुल जाती। मैं कुछ ऐसे युवाओं को भी जानता हंू यंू तो उन्होंने कम्प्यूटर सांइस,मैकेनिकल इंजीनियरिंग और सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री का खुद के लिए जुगाड़ कर रखा है,लेकिन ये अपनी पढाई का ए बी सी नहीं जानते। इसीलिए डिग्री होने के बावजूद इनको चपरासी की नौकरी के भी लाले पड़े हुए हैं। जब भी ये कहीं नौकरी के लिए इंटरव्यू पर जाते हैं,झट से इनकी पोल खुल जाती है।
धनाढय लोग नहीं पढाते इंडिया में बच्चे
जरूरत है कि अब स्कूल टाइम से ही छात्रों को वैज्ञानिक परीक्षण- परीक्षाओं से ये आंक लिया जाए कि वो किस क्षेत्र में बेहतर करेगा। कहां उसके गुल खिलाने की ज्यादा संभावनाएं है। अगर वो खिलाड़ी बनना चाहता है तो उसे उस दिशा में आगे बढाया जाए। अगर वो पेंटर बनना चाहता है तो वहां की शिक्षा दीक्षा दी जाए। अगर वो अभिनेता बनना चाहता है तो बने। डाक्टर बनना चाहता है तो उस दिशा में आगे बढाया जाए। कारपेंटर बनना चाहता है तो उसे वो तालीम दिलवाई जाए। अपने देश में आज कारपेंटर, पलंबर, इलैक्ट्रिशियन,वैल्डर आदि की इतनी भारी डिमांड है,लेकिन इस काम में निपुण लोग उपलब्ध नहीं हैं। मजाक में ये भी कहा जाता है कि युवाओं को इंजीनियरिंग की पढाई का कर्ज उतारने के लिए आईटीआई करनी पड़ रही है। जैसे कि हमारे साथ कभी नौकरी की शुरूआत में ये भी हुआ कि एक बुर्जुग ने पूछा कि आप क्या काम करते हो-मैंने कहा कि पत्रकार हंू। वो बोले-वो तो ठीक है, सुन लिया,लेकिन आप काम क्या करते हो? शिक्षा व्यवस्था का हाल ऐसा हो चला है कि जिसके पास भी पैसा है वो अपने बच्चों को इंडिया में पढाना ही नही चाहता। मैं कितने ही नेताओं, अधिकारियों, बिजनसमैन को जानता हंू कि जिनके बच्चे बाहरवीं के बाद विदेशों में पढाई पढ रहे हैं। कितने ही मंत्रियों के बच्चे विदेशों में पढ रहे हैं। अगर उनको इंडिया में बेहतर शिक्षा उपलब्ध होती तो शायद वो विदेश जाने की तरफ नहीं सोचते। क्या सरकार इस संभावना पर विचार कर सकती है कि अधिकारियों और नेताओं के बच्चे सरकारी शिक्षण संस्थानों में ही पढेंगे। इस अकेले एक काम से भी रेल पटरी पर आ जाएगी। काफी हद.. बहुत हद तक इस समस्या का समाधान हो जाएगा। इस हालात पर बशीर बद्र का शेर है..
कहां आंसुओं की ये सौगात होगी
नए लोग होंगे नई बात होगी
मैं हर हाल में मुस्कराना चाहता हंू
तुम्हारी मोहब्बत अगर साथ होगी
चरागों को आंखों में महफूज रखना
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी
परेशान हो तुम भी,परेशान हंू मैं भी
चले मय कदे में वहीं बात होगी
चरागों की लौ से सितारों की जौं तक
तुम्हें मैं मिलूगां जहां रात होगी
जहां वादियों में नए फूल आए
हमारी तुम्हारी मुलाकात होगी
मुसाफिर हैं हम भी मुसाफिर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाकत होगी
उदार बने सरकारी नीतियां
सरकार के कर्णधारों,नीति निर्माताओं को लगातार ये मंथन करते रहना चाहिए कि भविष्य किस का है? बाजार क्या चाहता है? मार्किट में किस की डिमांड है? किस क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं ज्यादा हैं? उसी अनुरूप शिक्षा मिलनी चाहिए और नीतियां बननी चाहिए। हमारे यहां आज भी सरकारी नौकरी के प्रति ही ज्यादातर युवाओं का रूझान है। मिसाल के तौर पर हरियाणा सरकार पांच साल में कितनी नौकरी दे देगी? बहुत ही ज्यादा मुस्तैदी से काम करेगी तो ज्यादा से ज्यादा एक लाख युवाओं को नौकरी दे देगी,जबकि नौकरी के तलबगार युवाओं की संख्या इस से कई गुना ज्यादा है। जिनको नौकरी नहीं मिलेगी, अब वो युवा कहां जाएं? सरकार को स्किल डवलपमेंट के साथ साथ ऐसे कोर्स की शुरूआत भी करनी चाहिए कि जिस से इन युवओं का माइंडसेट उद्यमी बनने की दिशा में पे्रेरित हो। वो रोजगार पाने की बजाय रोजगार देने की दिशा में सोचे। उद्यमी बनने की दिशा में सोचे। इस काम के लिए सरकार को उदार नीतियां और नियम बनाने चाहिए। आसान दरों पर कर्ज की व्वस्था होनी चाहिए। मार्गदर्शन की व्यवस्था होनी चाहिए। सरकारी सिस्टम ऐसा हो कि वो इन युवाओं को अंडा देने वाली मुर्गी के तौर पर ना देखे, बल्कि उनके लिए पलके पावंड़े बिछाए रहे। उनको सारी सरकारी मंजूरी खटाखट मिल जाए। बिना सरकारी बाबूओं को चढावा चढाएं मिल जाएं। इस दिशा में अगर सामूहिक प्रयास होंगे तो निश्चित तौर पर सुधार की दिशा में बढा जा सकेगा। ये समय की मांग है कि सरकार को शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव लाने की-इंकलाब लाने की निर्णायक पहल करनी चाहिए। इस नेक कार्य में पहले ही बहुत देर हो चुकी है। इस हालात पर कैफी आजमी का एक शेर है..
सब उठो,मैं भी उठूं,तुम भी उठो, वो भी उठे
कोई खिड़की इस दीवार में खुल ही जाएगी











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