August 28, 2026 3:49 pm

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इतिहास के आईने में जन गण मन और वंदे मातरम्

रविशंकर कुमार चौधरी -विनायक फीचर्स

अभिनेता मुकेश खन्ना के हालिया बयान ने एक बार फिर उस बहस को जीवित कर दिया है, जो भारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास में लंबे समय से उठती रही है। उन्होंने कहा कि भारत का राष्ट्रगान जन गण मन नहीं, बल्कि वंदे मातरम् होना चाहिए। उनके अनुसार जन गण मन ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम के सम्मान में लिखा गया था, जबकि वंदे मातरम् भारतीय राष्ट्रभक्ति का अधिक प्रामाणिक प्रतीक है।
बयान सामने आते ही सोशल मीडिया पर पक्ष-विपक्ष में तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गईं। लेकिन भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से अलग यदि इस प्रश्न को इतिहास के दस्तावेजों और घटनाक्रम के आधार पर देखा जाए, तो तस्वीर कहीं अधिक जटिल और रोचक दिखाई देती है।
सर्वप्रथम विवाद की शुरुआत और जड़ें 1911 में दिखाई देती हैं। दिसंबर 1911 में ब्रिटेन के सम्राट जॉर्ज पंचम भारत आए थे। इसी समय कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन आयोजित हुआ और 27 दिसंबर, 1911 को रवींद्रनाथ टैगोर की रचना ‘भारोतो भाग्य बिधाता’ का सार्वजनिक गायन हुआ। बाद में इसी रचना का पहला अंतरा भारत के राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के रूप में स्वीकार किया गया चूंकि जॉर्ज पंचम की भारत यात्रा और इस गीत के सार्वजनिक गायन का समय लगभग एक ही था, इसलिए कुछ समकालीन समाचार माध्यमों ने यह धारणा बना दी कि यह गीत ब्रिटिश सम्राट के स्वागत में लिखा गया था। यही धारणा आगे चलकर विवाद का आधार बनी।
लेकिन किसी ऐतिहासिक घटना के केवल समय-साम्य को उसके कारण का प्रमाण मान लेना इतिहास की दृष्टि से उचित नहीं है। इस पूरे विवाद को समझने के लिए स्वयं रवींद्रनाथ टैगोर के लिखित स्पष्टीकरणों को देखना आवश्यक है
आइए देखें कि टैगोर ने स्वयं क्या कहा था? 1937 में टैगोर ने अपने मित्र पुलिन बिहारी सेन को लिखे पत्र में इस आरोप का स्पष्ट खंडन किया। उनका कहना था कि उनसे ब्रिटिश सम्राट की प्रशंसा में गीत लिखने की अपेक्षा की गई थी, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनके गीत का ‘भाग्य विधाता’ किसी ब्रिटिश राजा को नहीं, बल्कि भारत के लोगों के भाग्य के नियंता को संबोधित करता था। 1939 में उन्होंने एक बार फिर इस विषय पर स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने इस धारणा पर असंतोष व्यक्त किया कि कोई उन्हें ब्रिटिश सम्राट की प्रशंसा में गीत लिखने वाला कवि समझ सकता है। इसलिए ‘जन गण मन’ को जॉर्ज पंचम की स्तुति के रूप में प्रस्तुत करने से पहले टैगोर के इन स्पष्ट बयानों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि ‘वंदे मातरम्’ का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्व कम था। इसके विपरीत, ‘वंदे मातरम्’ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के सबसे शक्तिशाली प्रतीकों में से एक था। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसकी रचना की और बाद में इसे अपने उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया। 1905 के ‘बंग-भंग विरोधी आंदोलन’ के दौरान ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता और राष्ट्रीय स्वाभिमान का घोष बन गया। क्रांतिकारी आंदोलनों, राजनीतिक सभाओं और राष्ट्रवादी जुलूसों में इसकी गूंज सुनाई देती थी।
हालांकि गीत के बाद के अंतरों में भारतभूमि को देवी के विभिन्न रूपों दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के प्रतीकों से जोड़ा गया है। इसी कारण मुस्लिम नेताओं और संगठनों के एक वर्ग ने इसके कुछ अंशों पर आपत्ति जताई। कांग्रेस के भीतर भी इस बात पर विचार हुआ कि ऐसा राष्ट्रीय गीत चुना जाए जिसे विभिन्न धार्मिक समुदाय समान रूप से स्वीकार कर सकें। यहीं से ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ को लेकर राजनीतिक-सांस्कृतिक बहस ने नया रूप लिया।
1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद कई प्रांतों में कांग्रेस की सरकारें बनीं। सरकारी और सार्वजनिक कार्यक्रमों में कौन-सा गीत गाया जाए, यह प्रश्न भी सामने आया। ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता था, लेकिन उसके कुछ अंशों को लेकर मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग की आपत्तियां भी सामने थीं। दूसरी ओर ‘जन गण मन’ अपेक्षाकृत अधिक सर्वसमावेशी प्रतीत होता था। इसलिए यह केवल दो गीतों की पसंद का प्रश्न नहीं था। इसके पीछे उस समय के भारत की बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक सामाजिक संरचना, राष्ट्रीय आंदोलन की राजनीति और एक ऐसे राष्ट्रीय प्रतीक की आवश्यकता थी जिसे स्वतंत्र भारत के नागरिक व्यापक रूप से स्वीकार कर सकें।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह प्रश्न संविधान सभा के सामने भी आया। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान होगा। साथ ही ‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी ऐतिहासिक भूमिका और राष्ट्रीय महत्व के कारण समान सम्मान देने की बात कही गई। इस प्रकार स्वतंत्र भारत ने किसी एक गीत को इतिहास से मिटाया नहीं। उसने दोनों को उनका उचित स्थान दिया। जन गण मन को राष्ट्रगान और वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि रवींद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश शासन की आलोचना करने में कभी संकोच नहीं किया। 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद उन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदान की गई ‘नाइटहुड’ की उपाधि वापस कर दी। वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड को लिखे अपने पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी त्रासदी के समय ब्रिटिश सरकार से प्राप्त सम्मान धारण करना उनके लिए उचित नहीं था।
इस घटना से यह अवश्य स्पष्ट होता है कि टैगोर ब्रिटिश सत्ता के अंध-समर्थक नहीं थे। इसलिए ‘जन गण मन’ की रचना को उनके पूरे राजनीतिक और नैतिक जीवन से काटकर केवल 1911 की परिस्थितियों के आधार पर समझना इतिहास को अत्यधिक सरल बना देना होगा। रवीन्द्रनाथ टैगोर भारतीय राष्ट्रवाद की व्यापक आवाज थे।  टैगोर का राष्ट्रवाद संकीर्ण राजनीतिक राष्ट्रवाद नहीं था। वे भारत की राष्ट्रीय चेतना को मानवतावाद, स्वतंत्र चिंतन और सांस्कृतिक विविधता से जोड़कर देखते थे। महात्मा गांधी उन्हें गुरुदेव कहते थे। गीतांजलि के लिए उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला और वे एशिया के पहले नोबेल साहित्य पुरस्कार विजेता बने। डब्ल्यू. बी. यीट्स जैसे विश्वप्रसिद्ध कवि भी उनके साहित्य से गहराई से प्रभावित थे। 1930 में जर्मनी में अल्बर्ट आइंस्टीन और टैगोर की प्रसिद्ध बातचीत भी आधुनिक बौद्धिक इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं में गिनी जाती है। विज्ञान, सत्य, मानव चेतना और वास्तविकता जैसे विषयों पर दोनों की चर्चा ने भारतीय और पश्चिमी बौद्धिक परंपराओं के संवाद को एक नया आयाम दिया।
टैगोर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के संबंध भी इस संदर्भ में विशेष महत्व रखते हैं। सुभाष चंद्र बोस टैगोर के व्यक्तित्व और विचारों से अत्यंत प्रभावित थे। 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद से उनके इस्तीफे और राजनीतिक संघर्ष के दौर में टैगोर ने उन्हें देशनायक कहकर संबोधित किया। यह संबंध केवल व्यक्तिगत सम्मान का नहीं था। यह इस बात का प्रमाण भी है कि भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के एक अत्यंत उग्र और संघर्षशील राष्ट्रवादी नेता के लिए टैगोर भारतीय राष्ट्रीय चेतना के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि थे। सात अगस्त, 1941 को टैगोर के निधन पर नेताजी ने उन्हें राष्ट्र की महानतम विभूतियों में से एक के रूप में श्रद्धांजलि दी।
इस बहस का एक दिलचस्प पक्ष नेताजी की आजाद हिंद सरकार से भी जुड़ा है। आजाद हिंद फौज का राष्ट्रगीत ‘शुभ सुख चैन’ था, जिसकी धुन रवींद्रनाथ टैगोर की ‘भारोतो भाग्य बिधाता’ से प्रेरित थी। यह तथ्य इस बात की ओर संकेत करता है कि नेताजी और उनके सहयोगियों ने टैगोर की रचना को औपनिवेशिक सत्ता की चापलूसी के प्रतीक के रूप में नहीं देखा था। बल्कि उसे भारतीय राष्ट्रीय चेतना के सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में अपनाया।
आज राष्ट्रगान पर बहस हो, लेकिन इतिहास के साथ। वंदे मातरम् के प्रति सम्मान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति के प्रति सम्मान है। उसी प्रकार जन गण मन के प्रति सम्मान स्वतंत्र भारत की संवैधानिक परंपरा और उसके राष्ट्रीय प्रतीक के प्रति सम्मान है।
किसी नागरिक को यह विचार रखने का अधिकार है कि राष्ट्रगान के लिए कोई दूसरा गीत अधिक उपयुक्त होता।
लोकतंत्र में राष्ट्रीय प्रतीकों पर विमर्श भी हो सकता है। लेकिन विमर्श और ऐतिहासिक तथ्य दो अलग चीजें हैं।
यदि जन गण मन को जॉर्ज पंचम की स्तुति बताना है, तो उसके पक्ष में प्रमाण भी देने होंगे। केवल इतना कि जॉर्ज पंचम की भारत यात्रा और गीत का सार्वजनिक गायन एक ही समय के आसपास हुआ था, पर्याप्त प्रमाण नहीं है। दोनों गीतों की ऐतिहासिक भूमिका को समझना महत्वपूर्ण है। किसी भी देश और उसके देशवासियों के राष्ट्रगान केवल एक गीत नहीं होता, वह राष्ट्र की सामूहिक स्मृति का प्रतीक होता है और उस स्मृति के साथ सबसे बड़ा न्याय यही है कि हम उसे राजनीतिक आरोपों से नहीं, इतिहास के प्रमाणों से समझें।
(विनायक फीचर्स)

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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