August 28, 2026 3:12 pm

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महंगाई की मार से गरीब की थाली बेहाल, प्याज ने फिर बिगाड़ा बजट

ओ.पी. पाल -विनायक फीचर्स

भारत में प्याज का संकट, पिछले कुछ दशकों में राजनीतिक और आर्थिक इतिहास बदलने का गवाह बनते देखा गया है। इसका कारण भी स्पष्ट रहा है, कि भारतीय रसोई की नींव अगर स्वाद, सेहत और सुगंध पर टिकी है, तो उसमें चीनी की मिठास और प्याज का तड़का दो सबसे मजबूत स्तंभ माने जाते हैं। लेकिन हाल के दिनों में खाद्यान्न और खाद्य पदार्थों के दामों में उतार-चढ़ाव ने आम उपभोक्ता के घरेलू बजट के गणित को पूरी तरह बिगाड़ कर रख दिया है। पहले तो खाद्य तेलों और चीनी की कीमतों में आई नरमी अचानक दामों में उछाल में बदल गई, और अब बाजार में प्याज की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की आंखों में आंसू लाने की शुरुआत कर दी है। सवाल यह उठता है कि क्या चीनी की कड़वाहट के बाद अब प्याज वाकई आमजन को रुलाने की तैयारी में है? हालांकि, स्थिति गंभीर होने से पहले ही केंद्र व राज्य सरकारों ने मोर्चा संभाल लिया है। जमाखोरों और कालाबाजारी करने वालों पर सख्त कानूनी शिकंजा कसने के निर्देश दिए गए हैं।

दरअसल, चीनी की कड़वाहट के बाद प्याज की अचानक बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने विशेष योजना तैयार की है। केंद्रीय उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे ने (24 अगस्त को)जानकारी दी है कि महाराष्ट्र के नासिक से प्याज का सरकारी बफर स्टॉक ‘कांदा एक्सप्रेस’ के जरिए देश के प्रमुख खपत केंद्रों तक भेजना शुरु किया है। प्रथम चरण में प्याज की खेप चेन्नई, मदुरै, दिल्ली, एर्नाकुलम और गुवाहाटी भेजी जा रही है। नासिक के बफर स्टॉक से ‘कांदा एक्सप्रेस’ के रेल रैक के जरिए पहुंचाई जा रही इस आपूर्ति को थोक और खुदरा दोनों बाजारों में उतारा जाएगा। राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी संघ (एनसीसीएफ) और भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (नेफेड) जैसी सरकारी एजेंसियों के माध्यम से खुदरा बाजार में 35 रुपये प्रति किलो की रियायती दर पर प्याज बेचा जाएगा। केंद्र सरकार के पास चालू वर्ष के लिए 1.21 लाख टन प्याज का सुरक्षित बफर स्टॉक उपलब्ध है, जो घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पूरी तरह पर्याप्त है। अधिकारियों का मानना है कि आने वाले महीनों में देश में प्याज की उपलब्धता संतोषजनक रहेगी। बफर स्टॉक की स्थापना नाफेड और एनसीसीएफ के जरिए आपात स्थिति और त्योहारों के दौरान कीमतों को स्थिर रखने के लिए ही की जाती है। उपभोक्ताओं पर पड़ने वाली यह महंगाई केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर एक आम नागरिक की थाली और उसकी बचत पर पड़ता है। जब रसोई के चीनी, दालें, एडिबल ऑयल और प्याज जैसे मूल सामान महंगे होते हैं, तो सबसे ज्यादा नुकसान निम्न और मध्यम वर्ग का होता है। एक सामान्य भारतीय परिवार के मासिक खर्च में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी 40 फीसदी से 50 फीसदी तक होती है। जब प्याज और चीनी जैसी बुनियादी चीजें महंगी होती हैं, तो शिक्षा, स्वास्थ्य और मनोरंजन जैसे अन्य अनिवार्य खर्चों में कटौती करनी पड़ती है। वहीं महंगाई के कारण लोग गुणवत्तापूर्ण खान-पान से समझौता करने को मजबूर हो जाते हैं। सब्जियों और दालों के कम उपयोग से बच्चों और महिलाओं में पोषण संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं।

सरकारें  बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने और जमाखोरी रोकने के लिए हमेशा ही एक बहुस्तरीय रणनीति अपनाती है। अभी भी जमाखोरों और कालाबाजारी करने वालों पर नकेल कसने के लिए केंद्र सरकार ने ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम’ के तहत राज्यों को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि वे थोक और खुदरा व्यापारियों के लिए स्टॉक लिमिट तय करें। वहीं मंडियों में अवैध भंडारण करने वालों के खिलाफ छापेमारी और सख्त कानूनी कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं।  केंद्र सरकार नैफेड(भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ) और एनसीसीएफ के माध्यम से लाखों टन प्याज का ‘बफर स्टॉक’ बनाकर रखती है। जब खुदरा बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, तो रियायती दरों पर मोबाइल वैन और सरकारी आउटलेट्स के जरिए उपभोक्ताओं तक प्याज पहुंचाया जाता है।  प्याज और चीनी के निर्यात पर जरूरत पड़ने पर न्यूनतम निर्यात मूल्य लगाया जाता है या निर्यात को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया जाता है ताकि घरेलू बाजार में उपलब्धता बनी रहे। आवश्यकता पड़ने पर अन्य देशों से प्याज व चीनी के आयात को सुगम बनाने के लिए कस्टम ड्यूटी (सीमा शुल्क) घटाई जाती है।
भारत के राजनीतिक और आर्थिक इतिहास में प्याज का एक विशेष स्थान रहा है। प्याज केवल एक सब्जी नहीं, बल्कि एक ऐसा संवेदनशील कारक रहा है जिसने कई बार चुनाव के नतीजे बदले हैं और सरकारों को हिलाकर रख दिया है। मसलन देश में साल 1980 का ‘प्याज चुनाव’। भारतीय राजनीति में प्याज का पहला बड़ा प्रभाव 1980 के आम चुनाव में देखने को मिला। उस समय तत्कालीन जनता पार्टी सरकार के कार्यकाल में प्याज के दाम आसमान छूने लगे थे। इंदिरा गांधी ने प्याज की महंगाई को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया और गले में प्याज की माला पहनकर प्रचार किया। नतीजतन, जनता पार्टी की सरकार गिर गई और कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई। इसी प्रकार भारतीय इतिहास का सबसे चर्चित खाद्य संकट साल 1998 का प्याज संकट माना जाता है, जब महाराष्ट्र और कर्नाटक में बेमौसम बारिश से प्याज की फसल पूरी तरह तबाह हो गई थी। उस समय दिल्ली और राजस्थान विधानसभा चुनावों में तत्कालीन सत्तारूढ़ पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। साल 2010 में प्याज संकट तब आया, जब नासिक और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में अत्यधिक और बेमौसम बारिश के कारण खरीफ की फसल खराब हो गई। ऐसे समय में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान से प्याज का आयात किया और निर्यात पर पूरी तरह रोक लगाई और सीमा शुल्क शून्य कर दिया। इसके बाद साल 2013 के मध्य में मानसून की अनिश्चितता और सप्लाई चेन में बिचौलियों की साठगांठ के कारण देश भर में प्याज के दामों ने आसमान छूना शुरु किया तो विपक्ष ने सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए। हालांकि साल 2019 में प्याज का महा-संकट देखने को मिला, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में भारी बाढ़ के कारण मंडियों में रखा लाखों टन प्याज सड़ गया और खरीफ फसल बुरी तरह प्रभावित हुई। इन हालातों को संभालने के लिए केंद्र सरकार को तुर्की, मिस्र और अफगानिस्तान से प्याज आयात करना पड़ा और देशव्यापी स्टॉक लिमिट लागू करनी पड़ी।
महाराष्ट्र में नासिक को एशिया की सबसे बड़ी प्याज मंडी माना जाता है। पूरे भारत में प्याज के थोक भाव और मूल्य निर्धारण  इसी मंडी के आवक और बोली से तय होते है। वहीं महुआ (गुजरात) की मंडी मुख्य रूप से सफेद प्याज के व्यापार और डीहाइड्रेशन (सूखा प्याज पाउडर उद्योग) के लिए देश भर में प्रसिद्ध है। इसके अलावा मध्य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, बिहार व आंध्र प्रदेश में भी कई दर्जन प्रमुख उत्पादक जिले और प्रसिद्ध मंडिया हैं, जहां से प्याज की कीमतें निर्धारित होकर देशभर में आपूर्ति की जाती है।

(विनायक फीचर्स)

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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