August 28, 2026 2:31 pm

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रक्षा बंधन : कच्चे धागे से बंधा पक्का रिश्ता

डॉ. सुधाकर आशावादी -विभूति फीचर्स           

श्रावण माह की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला पर्व रक्षाबंधन भारतीय पर्व परम्पराओं में अनूठा पर्व है, जिसमें बहन भाई के निश्छल एवं समर्पित प्रेम के दर्शन होते हैं। आदिकाल से चले आ रहे इस पर्व में पारिवारिक सदस्यों के मध्य नैतिक व मर्यादित आचरण की सीख से साथ भाई का बहन के प्रति दायित्व निभाने का संकल्प निहित है। कौन नहीं जानता, कि सनातन परम्पराओं में परिवार मिल जुल कर सामूहिक समृद्धि की और अग्रसर रहने का बड़ा आधार रहा है। समय समय पर बड़ों का बड़प्पन एवं छोटों पर उनका असीम स्नेह रिश्तों में झलकता रहा है।
रिश्तों के प्रति असीम स्नेह और समर्पण के प्रतीक पर्व पर यदि नजर डालें, तो स्पष्ट होगा, कि अतीत में यह पर्व पूर्ण रूप से परिवार के साथ बैठकर मेल मिलाप का बड़ा आधार रहा है। मौसम के अनुसार विशेष व्यंजन इसे मनाए जाने के विधि विधान में कब सम्मिलित हो गए, पता ही नहीं चला।  कुशल गृहणियों ने पर्व में कब सेवई (जवों ) की मिठास भर दी, स्पष्ट नहीं है, लेकिन इतना अवश्य है, कि उस दौर में बाजारी वस्तुओं के स्थान पर घर के पकवानों को अधिक महत्व दिया जाता था। यदि रक्षाबंधन का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अध्ययन करें, तो लगता है, कि आधुनिकता की दौड़ में समाज पर्व के मौलिक स्वरूप बिसरा चुका है। न तो भाई बहन के रिश्तों में वह पहले जैसी गर्माहट रही और न पहले जैसा समर्पण। सच कहा जाए, तो रक्षाबंधन पर्व भी एक विशेष इवेंट बन चुका है, जिसमें महंगी राखियां, महंगी मिठाइयां, महंगा आयोजन तो है, मगर अपनेपन की आत्मीय झलक का अभाव है। कुछ समय के लिए भाई की कलाई पर बाँधे जाने वाले कच्चे धागे की जगह महंगी सोने, चांदी और हीरों से जड़ी राखियां बांधना कुछ परिवारों में स्टेटस सिम्बल बन गया हैं। मुँह मीठा कराने के लिए मीठी सेवइयों की जगह सोने की परत वाली मिठाइयां तथा महंगे व्यंजन पर्व की मौलिकता पर ग्रहण लगा चुके हैं। आम आदमी के लिए भले ही यह पर्व औपचारिकता निभाने तक सीमित रह गया हो, मगर आधुनिकता ने इस पर्व को भी व्यापार का परिचायक बना दिया है।
सोशल मीडिया, यूट्यूब चैनल पर्व के गौरवमयी इतिहास एवं भारतीय समाज में इसकी महत्ता दर्शाने के स्थान पर गरीब अमीर का भेद और बहन का आर्थिक लालच दर्शाकर इस पर्व को बदनाम करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहे हैं। सवाल यह है, कि जो पर्व भारतीय पर्व श्रृंखला के चार पर्वों में मुख्य पर्व है, उस पर्व को आधुनिकता के रंग में रंगकर हम विकृत क्यों करना चाहते हैं। जबकि यह पर्व सादगी भरा एवं कच्चे धागे की डोर से बंधे आत्मीय निश्छल प्रेम का प्रतीक है।
विभूति फीचर्स)

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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