नदी में सहज नहीं उल्टा बह पाना
आसान कहां है पानी को पानी कह पाना
अपनी गवर-मिंट और ओप्पो-जीशन पब्लिक को निहाल करने का कोई अवसर नहीं चूकती। अगर किसी को शक है तो वो हरियाणा विधानसभा की कार्यवाही देखने के लिए एक दफा खुद को उपस्थित कर दे,उसके सारे वहम दूर हो जाएंगे। ऐसा माना जाता है कि ये सिललिसा आदि काल से चला आ रहा होगा और इसके अनंत काल तक जारी रहने की आशंका है। पहले किसी और ढंग से तो अब किसी और तरीके से। मुददा एक ही है कि-हम किस तरह से पब्लिक की बैजा-बैजा करा दें। लां-लां-लां करा दें। हर कोई पब्लिक के लिए खुद को कुर्बान होता दिखाने के लालायित रहता है। जब कभी विधानसभा का सैशन आता है तो गवर-मिंट में अलग सा माहौल बन जाता है। बना दिया जाता है। क्या अफसर और क्या मंत्री.. सभी ऐसे व्यस्त हो जाते हैं कि..तौबा तौबा। पूछिए मत। चौकिंए मत। जिसे फोन करो.. वो कहेगा.. मेरा सैशन में क्वैचशन लगा हुआ है। मेरा कालिंग अटैंशन आ रहा है। मेरा सैशन में बिल आ रहा है। मैं सीएम के रिप्लाई की तैयारी में हंू। कोेई अफसर बताएगा कि मैं तो सीएम की विधानसभा की ब्रीफिंग की तैयारी में बिजी हंू। क्वैचशन आवर की बीफ्रिंग शुरू होने वाली है। इन साहब लोगों के निजी स्टाफ के लोग ऐसा बर्ताव करेंगे कि जैसे कि पता नहीं कौन सी बड़ी खुफिया इनफोरमेशन के बोझ तले ये दबे जा रहे हैं। इनको फोन करो तो ये डरते डरते से-सहमे सहमे से कहेंगे कि.. साहब बहुत बिजी हैं। विधानसभा सैशन की ब्रीफिंग शुरू हो चुकी है। ब्रीफिंग खत्म होने वाली है। बीफ्रिंग कुछ लंबी चल गई है। और फिर अचानक से खबर प्रकट होती है कि.. शुक्र है कि.. आखिरकार ब्रीफिंग खत्म हो गई है। फाइल हाथ में लिए बाबू बदहवास से यहां वहां सचिवालय के कोरिडोर में भाग रहे होते हैं। कह रहे होते हैं कि..नोट फोर पैड बनाना है। ये जवाब एजी से वैट करवाना है। विधानसभा सैशन के नाम पर गवर-मिंट में क्या कुछ नहीं हो रहा होता।अफसरों-कर्मचारियों की छुटटी कैसिंल हो जाती है। इनके सरकारी टूर बंद हो जाते हैं। अगर कोई कर्मचारी इमरजैंसी में छुटी की एप्लीकेशन टिका दे तो एसे एचओडी ऐसे धमकाते हैं कि… तुम्हें पता नहीं है क्या कि दो दिन बाद विधानसभा का सैशन शुरू होने वाला है? माहौल ऐसा बना दिया जाता है कि या तो क्रांति का बिगुल 1857 में फंूका गया था या फिर इस सैशन में फंूका जाएगा। अफसर दीर्घा में अलग ही माहौल होता है। किसी अधिकारी के विभाग का क्वैचशन जब प्रश्नकाल का समय खत्म होने या किसी अन्य वजह से सैशन में पूछा जाता तो वो राहत की सांस लेता है। उसे अगल बगल वाले साथी अफसर मुबारकवाद सी दे रहे होते हैं और ये सोच रहे होते हैं कि इसकी तो बला टल गई,लेकिन वो जो जीरो आवर के बाद मेरा कालिंग अटेंशन आ रहा है वो पता नहीं कितना लंबा चलेगा? क्या इसमें ओप्पो-जीशन कुछ हंगामा तो नहीं कर देंगा? क्या मेरे दसवीं फेल मंत्री जवाब तो ठीक से दे देंगे ना? क्या कोई ऐसा मुददा तो नहीं उठ जाएगा जिस से मेरी किरकरी हो जाएगी? क्या सब शांति से निपट जाएगा? दिल की धड़कनें तेज हुई रहती हैं। सांसे फूली रहती हैं। स्पीकर विधानसभा सैशन की तैयारियों के लिए मीटिंग पे मीटिंग करते रहते हैं। कभी पुलिस वाले अफसरों से, तो कभी अपने स्टाफ से, तो कभी सरकार के अफसरों से। पूरे विधानसभा परिसर में अलग ही माहौल होता है। ऐसा लगता हर किसी के सिर पर उसकी क्षमता से कई गुना ज्यादा बोझा लदा हुआ है। जिस किसी को फोन करो तो वो आपको ये अहसास करवाएगा कि सारे सैशन का भार उसके कंधों पर ही है। इस बोझे से वो कभी भी कोलप्स कर सकता है। लगभग कांपती हुई से आवाज में कहेंगे कि मैं सैशन की मीटिंग में हंू। बाद में बात करता हंू।
पहले से माहौल बनाना शुरू करता हैं ओप्पो-जीशन
इधर ओप्पो-जीशन वाले हैं कि वो सैशन को खुद के लिए करो या मरो बनाने पर तुले होते हैं। इस के लिए वो कई दिन पहले से माहौल बनाना शुरू कर देते हैं। इस प्रक्रिया की शुरूआत विधायक दल की मीटिंग बुलाने के नाम पर हुआ करती है। मीटिंग में तरह तरह के लोग तरह तरह की चर्चाएं करते हैं। प्रैस वालों को बताया जाता है कि इस दफा सैशन में या तो गवर-मिंट नहीं या फिर ओप्पो-जीशन नहीं। मतलब ये कि जैसा कि गांव में कहा जाता है कि गुस्से वाला म्हारा राम सिंह भी खूब है और उधर हिटलर भी कम नहीं है। अब भगवान ही जाने कि होगा क्या। एक न एक की तो जान जाएगी। बहराल क्या सत्ता और क्या विपक्ष,सभी पक्ष खुद को ऐसा दिखाने के लिए व्याकुल होते हैं कि..
मैं उस माटी का वृक्ष नहीं
जिसे नदियों ने सींचा है
बंजर माटी में पलकर मैंने
मृत्यु से जीवन खींचा है
शीशे से कब तक तोड़ोगे
मिटने वाला मैं नाम नहीं
तुम मुझको कब तक रोकोगे
तुम्हारे बस का ये काम नहीं
मीडिया वाले भी चार्ज हुए रहते हैं
इधर, हम मीडिया वाले भी इस सैशन आयोजन के लिए पूरी कमर कसे होते हैं। पहले से ही बड़ी बड़ी खबरें पेल रहे होते हैं। अलग से ही चार्ज हुए रहते हैं। लिख मारते हैं कि इस दफा हंगामेदार रहेगा सत्र। विपक्ष ने की जोरदार तैयारी। सरकार को घेरेगा विपक्ष। पलटवार करने को सरकार ने बनाई रणनीति। मेरा तो जब से क ख ग से वास्ता पड़ा है मैं तो तभी ये ये खबरें और हैडिंग पढ रहा हंू। नेता बदल गए,सरकारें बदलती गई,पत्रकार बदल गए,लेकिन अगर नहीं बदली तो ये खबरें। अब तो इलैक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया वाले भी मार्किट में आ गए हैं। इनकी अलग ही कहाणी चल रही होती है। इनको जब देखो ये बाइट करने के लिए ही यहां वहां बकरा तलाश रहे होते हैं। कह रहे होते कि उसकी बाइट हो गई..उसकी बाइट करनी है.. वो बाइट नहीं दे रहा .. जब उसने तुझे बाइट दे दी, तो वो मुझे बाइट क्यों नहीं दे रहा? ऐसा कर मुझे भी बाइट दिला दे या फिर अपने वाली बाइट मुझे दे दे। विधानसभा की प्रैस लाबी में अलग ही नजारा उत्पन्न होता है। वहां पर बहुत से लोग सिर्फ और सिर्फ फूड एंड बेवरेज को ओब्लाइज करने के लिए ही पोजीशन लिए होते हैं। उपस्थित होते हैं। उनका एक सूत्री प्रोग्राम ये है कि प्रैस लाबी में खाने पीने के लिए आने वाली किसी भी वस्तु से तत्काल अपना इनकाउंटर कराने में वो पीछे न रह जाएं। मौका ना चूक जाएं। कईयों का शारीरिक सोष्ठव देख कर ये अचरज होता है कि जितना उनका वजन है, उसका आधा भोजन तो वो एक टेम पर अपने अंदर सरका देते हैं,फिर भी वो कुपोषण का शिकार क्यों दिखते रहते हैं? ये इतने आलराउंडर प्लेयर होते हैं कि रायता और चाय एक साथ निपटा रहे होते हैं। दोनों से समान भाव से पेश आ रहे होते हैं। हमारे संविधान के अनुच्छेद 14-18 में समानता का अधिकार ये सुनिश्चित करता है कि समाज,कानून और प्रशासन की दृष्टि से सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जाए। किसी भी व्यक्ति को जाति, लिंग, धर्म,जन्म स्थान या वर्ग के आधार पर विशेषाधिकार या भेदभाव का सामना ना करना पड़े। समानता के अधिकार को जितना सम्मान हमारी प्रैस लाबी में मिलता है,उसकी मिसाल हिस्ट्री में मिलना मुश्किल है। प्रैस लाबी के हर कोने में समानता के अधिकार से हर कोई इतनी उदारता से पेश आता है कि वो खुद को अपमानित महसूस कर रहा होता है।
तैयारी कुछ और प्रश्न पत्र कुछ
इस सबके बाद वो ऐतिहासिक घड़ी आती है.. जिस पल के लिए सभी पक्षों ने इतनी तैयारी की होती है.. अपने अपने लाव लश्करों को तोपों और गोला बारूद से इतना लैस किया होता कि उनके लिए एक एक पग रखना-डग भरना मुश्किल हो जाता है। पहले के प्रचार-दुष्प्रचार के विपरीत विधानसभा में गवर-मिंट और ओप्पो-जीशन की मुठभेड़ कुछ इस अंदाज में होती तो वहां कुछ अलग ही दृश्य उत्पन्न हो जाता है। पहले की सारी तैयारी फुस्स सी हो जाती है। ऐसा लगता है कि तैयारी कुछ दिखाई गई,करवाई गई,बताई गई,छपवाई गई और इम्तिहान में प्रश्न पत्र कुछ दूसरा ही अवतरित हो गया है। यहां कौन किसकी तरफ है और कौन किस की तरफ है,कई दफा कुछ पता नहीं लगता। किस की किस से सेटिंग है और किस की किस से फिक्सिंग है..कुछ पता नहीं चलता। शायद..सब पहले से तय हो जाता होगा कि आप ऐसे कह देना.. फिर हम ऐसे कर देंगे.. आप ये डिमांड कर देना और फिर हम ये अनाउसमेंट कर गुजरेंगे। अखबार-टीवी न्यूज की हैडलाइन बन जाएगी। आपका काम चल जाएगा और हमारी इज्जत भी रह जाएगी। दोनों पार्टियों के लिए विन विन सिचुएशन हो जाएगी। इस माहौल में हम पत्रकार बड़ी खबरें पेल रहे होते हैं कि ओप्पो-जीशन ने गवर-मिंट को घेरा। ये अजब तरह की ही घेराबंदी होती जिसमें ना तो प्रश्नकाल हो पाता और ना ही जनहित का कोई अन्य मुददा उठ पाता। सब कुछ हंगामे की भेंट है चढ जाता। जब सैशन खत्म होता है तो अखबारों में इसकी समीक्षा लिखी जाती है। कुछ बरस पहले इसमें ओप्पो-जीशन को विजेता दिखाए जाने की परंपरा थी,लेकिन अब बदले हुए हालात में गवर-मिंट को हर हाल में हावी दिखाया जाता है। दो दशक से ये रिवाज मीडिया में कुछ ज्यादा ही हो गया है।
जो भी सदन में व्यवधान डाले, उसको टीए डीए ना मिले
यंू तो ऐसा बहुत पहले हो जाना चाहिए था,लेकिन अगर अब भी हो जाए तो भी हमें इन सैशन में आने वाले महानुभावाओं का शुक्रगुजार होना चाहिए कि ये इसमें कुछ काम करने की आदत भी डाल लें। खुद का मिनीस्टर-अमएलए बनना-होना कुछ तो जस्टिफाई कर दें। थोड़ी सी ही सही.. जनहित की-जनता के प्रति जवाबदेही की अपनी डयूटी ही निभा लें। ये ना हो कि टीए-डीए लें,फोटोबाजी करें और चल मेरे भाई। ऐसा लगता है कि सदन में हर कुछ कार्य सम्पन्न हो रहा होता है कि सिवाय जनहित के। ऐसा दृष्य उत्पन्न होता है कि तू मेरी खुजा, मैं तेरी पीठ खुजाऊं। यहां क्या नहीं होता.. लगभग सब होता है। मुशायरा होता है.. शेरो शायरी होती है। विरह के गीत गाए जाते हैं। स्तुतिगान होता है। विरोध की पराकाष्ठा होती है और अपनापन चरम पर होता है। व्यंग्य भी होता है,तंज भी होता है। गिले शिकवे होते हैं। अहसान किए जाते हैं और अहसान उतारे जाते हैं। एक दूसरे की पोल खोली जाती है तो एक दूसरे का महिमामंडन होता है। अलग डाल पर होने के बावजूद वफादारी और बेवफाई की रस्में एक साथ निभाई जाती हैं। कहना बहू को, सुनाना सास को, की तर्ज पे कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना होता है। शेर और बकरी एक घाट पर पानी पी रहे होते हैं। आलिंगनबद्ध होते हैं। इजहार ए मोहब्बत होता है। ये दुर्लभ गुण सामान्य इंसान में कहां ही संभव होते हैं। ये तो हमारे पूज्नीय नेताओं का जिगरा है कि वो ये सब हुनर रखते हैं। जब इस सब से भी इनका गुजारा नहीं होता तो ये भरे सदन में तू तू-मैं मैं पर उतर आते है। गाली गलौज में जुट जाते हैं। इनके प्रेम-प्रणय की इंतहा ये कि ये मारपीट पर भी उतर आते हैं। विधानसभा की कार्रवाई और संचालन के नियमों ये तत्काल संशोधन होना चाहिए कि जो भी प्रश्नकाल में व्यवधान डालेगा, उसे सदन की कार्यवाही से उस दिन के लिए सस्पेंड किया जाएगा। उसे टीए-डीए नहीं मिलेगा। चाहे ये पाप गवर-मिंट वाले करें या फिर ओप्पो-जीशन वाले.. सब से समान भाव से पेश आया जाएगा। सैशन से पहले खाम खां कि इतनी जो ये हाईप क्रिएट हो जाती है-करवाई जाती है, उस पर कुछ तो अकुंश लगे। दुुष्यंत कुमार ने शायद कभी ऐसे ही माहौल में लिखा होगा कि..
हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज यह दीवार,परदों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
सोरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग,लेकिन आग जलनी चाहिए














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