April 10, 2026 5:18 pm

April 10, 2026 5:18 pm

अनुकूल दिनचर्या व भोजन से बेहतर स्वास्थ्य; शिशिर ऋतु में आयुर्वेदिक जीवन-शैली का महत्व

डॉ. विजय गर्ग
मकर संक्रांति से आरम्भ होने वाली शिशिर ऋतु में शरीर में कफ का संचय होने लगता है और जठराग्नि प्रबल हो जाती है। इस कारण भूख अधिक लगती है और शरीर को अतिरिक्त पोषण की आवश्यकता होती है। वास्तव में शिशिर ऋतु आदान-काल का प्रवेश-द्वार है, जो शरीर से विशेष सावधानी, संतुलन और पोषण की अपेक्षा करता है। यदि इन दिनों आयुर्वेदिक ऋतुचर्या के सिद्धान्तों के अनुसार जीवन-व्यवहार अपनाया जाए, तो न केवल मौसमी रोगों से रक्षा होती है, बल्कि बल और प्रतिरोधक क्षमता भी सुदृढ़ होती है।

ऋतुचक्र और शिशिर ऋतु का महत्व
भारतवर्ष को ऋतुओं का देश कहा गया है। यहाँ षड्ऋतु-चक्र निरन्तर चलता रहता है—एक ऋतु के पश्चात दूसरी ऋतु का आगमन होता है। हेमंत ऋतु के बाद शिशिर ऋतु आती है, जो मकर संक्रांति से प्रारम्भ होकर आदान-काल की शुरुआत को सूचित करती है।
आयुर्वेद के अनुसार वर्ष को दो प्रमुख कालों—आदान-काल और विसर्ग-काल—में विभाजित किया गया है। आदान-काल वह समय है, जब सूर्य उत्तरायण होकर अपनी तीव्र, रूक्ष और शोषक किरणों के माध्यम से पृथ्वी तथा समस्त प्राणियों से क्रमशः बल, स्निग्धता और सौम्यता का हरण करता है। शिशिर ऋतु इस आदान-काल की प्रथम ऋतु होने के कारण शरीर और मन पर गहरा प्रभाव डालती है।

ठंड में सूर्य-स्नान का स्वास्थ्य लाभ
शिशिर ऋतु में दिन छोटे और रातें लम्बी हो जाती हैं। ग्रीष्म ऋतु में जो सूर्य-ताप असहनीय प्रतीत होता है, वही ताप इस ऋतु में सुखद और हितकारी लगता है। ठंडे वातावरण में सूर्य-किरणें शरीर को ऊष्मा प्रदान कर स्वास्थ्य के लिए लाभकारी सिद्ध होती हैं।
पर्वतीय क्षेत्रों में इस काल में हिमपात होता है और जीवन अत्यन्त दुरूह हो जाता है। निरन्तर ठंड, शीतलहर और तीव्र पवन के कारण लोग अधिकतर घरों में ही रहते हैं। ऐसे में शरीर को गर्म रखना, आग तापना और ऊनी वस्त्रों का प्रयोग स्वास्थ्य-संरक्षण के लिए आवश्यक हो जाता है।

कफ संचय और जठराग्नि की प्रबलता
आयुर्वेदिक दृष्टि से शिशिर ऋतु में बाह्य वातावरण में शीत और रुक्षता की प्रधानता रहती है। इसके प्रभाव से शरीर में कफ का संचय होता है, जबकि आन्तरिक ऊष्मा को बनाए रखने के लिए जठराग्नि प्रबल हो जाती है। इसी कारण इस ऋतु में भूख अधिक लगती है।
यदि इस समय पर्याप्त और उपयुक्त आहार न मिले, तो बलक्षय, संधिशूल, त्वचा की रुक्षता, कास, श्वास और प्रतिश्याय जैसे विकार उत्पन्न हो सकते हैं।

स्निग्ध और बलवर्धक आहार की आवश्यकता
शास्त्रों में कहा गया है कि आदान-काल में प्रतिदिन शरीर के गुण—बल, ओज और स्निग्धता—का हरण होता है। अतः इस काल में आहार के माध्यम से इन गुणों की पूर्ति अत्यन्त आवश्यक है।
शिशिर ऋतु में गुरु, स्निग्ध, उष्ण और बलवर्धक आहार विशेष रूप से हितकारी माना गया है। तिल, घृत, दुग्ध, पुराना गुड़, मूंगफली तथा अन्न-दालों से बने सुपाच्य भोजन वात-कफ को संतुलित रखते हैं और शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं। इसके विपरीत अत्यधिक रूक्ष, शीतल और अल्प आहार इस ऋतु में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।

हल्का व्यायाम और नियमित दिनचर्या
विहार की दृष्टि से शिशिर ऋतु में शीत से संरक्षण अत्यन्त आवश्यक है। उष्ण वस्त्रों का प्रयोग, नियमित तैलाभ्यंग, हल्का व्यायाम और समय पर निद्रा शरीर को ऋतुजन्य विकारों से सुरक्षित रखते हैं।
प्रातःकालीन सूर्य-किरणों का सेवन विशेष रूप से लाभकारी माना गया है, क्योंकि यह प्राण-शक्ति को जाग्रत करता है, प्रतिरक्षा-तंत्र को सुदृढ़ बनाता है और मानसिक स्फूर्ति प्रदान करता है।

मानसिक स्वास्थ्य और सकारात्मकता
शिशिर ऋतु का प्रभाव केवल शरीर पर ही नहीं, बल्कि मन पर भी पड़ता है। लम्बी रातें और सीमित प्रकाश कभी-कभी आलस्य, उदासी और निष्क्रियता को बढ़ा सकते हैं। ऐसे में सकारात्मक दिनचर्या, संतुलित आहार-विहार और सूर्य-प्रकाश का नियमित सेवन मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है।

प्रकृति के साथ सामंजस्य ही स्वास्थ्य का आधार
शिशिर ऋतु केवल ठंड का मौसम नहीं, बल्कि आदान-काल का प्रवेश-द्वार है, जो हमें संयम, संरक्षण और प्रकृति के साथ सामंजस्य का संदेश देता है। यदि इस काल में आयुर्वेदिक ऋतुचर्या के अनुसार जीवन-शैली अपनाई जाए, तो न केवल मौसमी रोगों से बचाव होता है, बल्कि बल, ओज, प्रतिरोधक क्षमता और दीर्घायु की प्राप्ति भी सुनिश्चित होती है।
निस्संदेह, शिशिर ऋतु स्वास्थ्य-संरक्षण और शरीर-संवर्धन का एक महत्वपूर्ण अवसर है, जिसे समझना और आत्मसात करना आज के समय में अत्यन्त आवश्यक है।
— डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्रिंसिपल, मलोट (पंजाब)

BabuGiri Hindi
Author: BabuGiri Hindi

बाबूगिरी हिंदी

virender chahal

Our Visitor

2 9 4 6 1 3
Total Users : 294613
Total views : 498425

शहर चुनें