— डॉ. विजय गर्ग
आज के दौर में ‘हर्बल’, ‘नेचुरल’ और ‘आयुर्वेदिक’ जैसे शब्द भरोसे की गारंटी बनते जा रहे हैं। किसी भी उत्पाद पर यह शब्द लिखे हों, तो हम मान लेते हैं कि वह पूरी तरह सुरक्षित होगा, उसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होगा और वह हर बीमारी में कारगर साबित होगा। लेकिन यह धारणा न सिर्फ अधूरी है, बल्कि कई बार खतरनाक भी साबित हो सकती है। सच्चाई यह है कि जड़ी-बूटियां हर मर्ज की दवा नहीं होतीं और उनसे सौ फीसदी लाभ की उम्मीद करना सही नहीं है।
यह मान लेना कि किसी हर्बल दवा ने अगर किसी एक व्यक्ति को फायदा पहुंचाया है, तो वही दवा हर किसी पर उसी तरह असर करेगी—एक बड़ी भूल है। जैसे एलोपैथी की दवाएं हर व्यक्ति पर एक जैसा प्रभाव नहीं डालतीं, वैसे ही हर्बल दवाएं भी हर किसी के लिए समान रूप से प्रभावी नहीं होतीं। शरीर की बनावट, बीमारी की अवस्था, उम्र और अन्य दवाओं के साथ उनका तालमेल—ये सभी बातें असर को तय करती हैं।
‘हर्बल’ का मतलब हमेशा सुरक्षित नहीं
यह समझना जरूरी है कि प्रकृति में हर चीज सुरक्षित नहीं होती। धतूरा, आक जैसे कई पौधे प्राकृतिक हैं और औषधीय गुण भी रखते हैं, लेकिन इनके दुष्प्रभाव भी जगजाहिर हैं। इसी तरह कई जड़ी-बूटियां यदि गलत मात्रा में ली जाएं, अशुद्ध हों या गलत व्यक्ति को दी जाएं, तो फायदे के बजाय नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए आंख मूंदकर यह मान लेना कि हर्बल दवाओं का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता, एक गलतफहमी है।
कई लोग यह सोचकर हर्बल दवाओं का सहारा लेते हैं कि “अगर फायदा नहीं भी हुआ, तो नुकसान तो नहीं होगा।” जबकि सच्चाई यह है कि हर्बल दवाएं भी नुकसान पहुंचा सकती हैं और उनसे साइड इफेक्ट होना संभव है। इसलिए इनका इस्तेमाल भी विशेषज्ञ की सलाह से ही करना चाहिए।
चमत्कार मानने की भूल
समस्या तब और बढ़ जाती है, जब जड़ी-बूटियों को चमत्कार या जादुई इलाज मान लिया जाता है। कई बार एलोपैथी में तुरंत राहत न मिलने पर लोग यह सोचकर हर्बल उपचार की ओर मुड़ जाते हैं कि इसमें नुकसान नहीं होगा और देर-सबेर फायदा जरूर होगा। यह धारणा अक्सर आक्रामक मार्केटिंग का नतीजा होती है।
कई कंपनियां यह दावा करती हैं कि उनकी हर्बल दवाएं सौ फीसदी नेचुरल हैं, पूरी तरह सुरक्षित हैं और हर बीमारी का पक्का इलाज हैं। लेकिन ऐसे दावे वैज्ञानिक कसौटी पर खरे नहीं उतरते। यह केवल प्रचार का फंडा होता है। किसी भी जड़ी-बूटी से सौ फीसदी लाभ की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं है।
हर रोग का एक ही इलाज नहीं
कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं, जिनमें हर्बल दवाएं केवल सहायक भूमिका निभा सकती हैं, मुख्य इलाज नहीं बन सकतीं। हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, ब्रेन हेमरेज जैसी गंभीर स्थितियों में अस्पताल, सर्जरी और निरंतर मेडिकल मॉनिटरिंग ही जीवन रक्षक होती है। इसी तरह टाइफाइड, टीबी और गंभीर संक्रमणों का इलाज भी हर्बल दवाओं से संभव नहीं है।
जब लोग जड़ी-बूटियों पर हर बीमारी का बोझ डाल देते हैं और उनसे चमत्कार की उम्मीद करते हैं, तो नतीजा अक्सर निराशा होता है। इससे कुछ लोगों के मन में यह गलत धारणा भी बन जाती है कि हर्बल चिकित्सा पूरी तरह बेकार है, जबकि सच्चाई यह नहीं है।
भरोसे और जोखिम की एक सीमा
न तो जड़ी-बूटियों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना ठीक है और न ही उन्हें पूरी तरह खारिज करना। डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, कैंसर जैसी बीमारियों का इलाज जड़ी-बूटियों के पास नहीं है। हां, वे जीवनशैली सुधारने, पाचन ठीक करने, नींद बेहतर बनाने और इम्यून सिस्टम को सपोर्ट करने में मदद कर सकती हैं।
लेकिन जिन बीमारियों में जीवन और मृत्यु का सवाल जुड़ा हो, वहां केवल जड़ी-बूटियों पर भरोसा करना एक बड़ा जोखिम है। इस सच्चाई को समझना जरूरी है।
मनमाने इस्तेमाल को कहें ‘ना’
हर्बल दवाओं के इस्तेमाल में भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण, शुद्धता और सही डोज का ध्यान रखना जरूरी है। यह सोच लेना कि “यह तो कैमिकल नहीं है, जितनी मर्जी खा लो”—गलत है। जड़ी-बूटियों का भी मानकीकरण होता है और उनके प्रभावी होने के लिए उनका शुद्ध होना उतना ही जरूरी है।
बरतें ये जरूरी सावधानियां
किसी भी हर्बल दवा के इस्तेमाल से पहले सही डायग्नोसिस कराएं।
बाजार में लिखे “नो साइड इफेक्ट” जैसे दावों पर आंख बंद करके भरोसा न करें।
गर्भावस्था, किडनी, लिवर की बीमारी या हार्ट स्ट्रोक की स्थिति में बिना डॉक्टर की सलाह कोई हर्बल दवा न लें।
एक साथ कई हर्बल दवाएं लेना नुकसानदायक हो सकता है।
ब्लड थिनर, शुगर और बीपी की दवाओं के साथ हर्बल दवाओं को मिलाने से बचें।
यदि दो हफ्तों में कोई लाभ न दिखे, तो डॉक्टर से जरूर मिलें और महीनों तक बिना असर के इलाज न कराते रहें।
जड़ी-बूटियां चिकित्सा का एक महत्वपूर्ण और उपयोगी हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें हर बीमारी का चमत्कारिक समाधान मान लेना सही नहीं है। संतुलित सोच, सही सलाह और वैज्ञानिक समझ के साथ ही हर्बल उपचार का लाभ उठाया जा सकता है।
— डॉ. विजय गर्ग
(सेवानिवृत्त प्रिंसिपल, मलोट)











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