नई दिल्ली/वॉशिंगटन: वैश्विक व्यापार में पिछले 48 घंटे बेहद उथल-पुथल भरे रहे। शुक्रवार को Supreme Court of the United States ने पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा लगाए गए व्यापक आयात शुल्क (टैरिफ) को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि राष्ट्रपति ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है।
फैसले के तुरंत बाद ट्रंप ने पलटवार करते हुए एक अलग कानूनी प्रावधान के तहत सभी देशों पर पहले 10% और फिर कुछ ही घंटों में इसे बढ़ाकर 15% अतिरिक्त शुल्क लगाने की घोषणा कर दी।
भारत पर पहले से कितना शुल्क?
अगस्त में अमेरिका ने भारत पर 25% “पारस्परिक शुल्क” (Reciprocal Tariff) लगाया था।
इसके बाद रूस से कच्चा तेल खरीदने पर अतिरिक्त 25% दंडात्मक शुल्क लगाया गया, जिससे कुल प्रभावी शुल्क 50% तक पहुंच गया।
इस महीने की शुरुआत में दोनों देशों के बीच एक अंतरिम व्यापार समझौते पर सहमति बनी, जिसके तहत वॉशिंगटन ने कुल शुल्क घटाकर 18% करने पर सहमति जताई।
दंडात्मक 25% शुल्क हटाया जा चुका है, जबकि मूल 25% शुल्क लागू रहा।
अब नई घोषणा के बाद भारतीय वस्तुओं पर 10% की जगह 15% अतिरिक्त शुल्क लागू होगा, जो मौजूदा आयात शुल्क के ऊपर जोड़ा जाएगा।
भारत पर संभावित असर
1️⃣ निर्यात पर दबाव
अमेरिका भारत का बड़ा निर्यात बाजार है। टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग सामान, फार्मास्यूटिकल्स, ऑटो पार्ट्स और आईटी सेवाओं पर असर पड़ सकता है। अतिरिक्त 5% बढ़ोतरी से भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में महंगे हो सकते हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा घटेगी।
2️⃣ एमएसएमई सेक्टर प्रभावित
छोटे और मझोले निर्यातकों (MSME) के लिए मार्जिन पहले से ही कम हैं। शुल्क बढ़ने से उनके ऑर्डर कम हो सकते हैं या उन्हें कीमत घटाकर नुकसान उठाना पड़ सकता है।
3️⃣ रुपए और शेयर बाजार पर असर
व्यापारिक अनिश्चितता से विदेशी निवेश प्रभावित हो सकता है। इससे रुपया कमजोर हो सकता है और निर्यात आधारित कंपनियों के शेयरों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
4️⃣ कूटनीतिक दबाव
भारत और अमेरिका के बीच जारी व्यापार वार्ता पर दबाव बढ़ेगा। नई 15% दर से दोनों देशों के बीच अस्थायी समझौते की शर्तें बदल सकती हैं।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ज्यादा राजनीतिक दबाव की रणनीति हो सकता है। यदि दोनों देशों के बीच बातचीत सफल रहती है तो शुल्क में राहत मिल सकती है। फिलहाल भारतीय निर्यातकों को लागत कम करने और नए बाजार तलाशने की रणनीति पर काम करना होगा।
अमरीका की टैरिफ नीति में अचानक बदलाव से भारत के निर्यात और व्यापार संतुलन पर अल्पकालिक दबाव बन सकता है, लेकिन दीर्घकाल में कूटनीतिक वार्ता और वैकल्पिक बाजारों से स्थिति संभल सकती है।











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