मेहनत पंचकूला के नेताओं की, लेकिन टिकट चंडीगढ़ के नेताओं को !
बाबूगिरी ब्यूरो
पंचकूला। नगर निगम चुनावों की आहट के साथ ही पंचकूला की सियासत में अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आने लगी है। स्थानीय नेताओं में इस बात को लेकर गहरा रोष है कि वर्षों से जमीनी स्तर पर काम करने के बावजूद चुनावी टिकट के समय “बाहरी दखल” बढ़ जाता है। खासतौर पर चंडीगढ़ यूटी से जुड़े नेताओं की सक्रियता ने स्थानीय राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है।
स्थानीय बनाम बाहरी नेताओं की जंग तेज
पंचकूला के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक ही चर्चा है—“मेहनत पंचकूला के नेताओं की, लेकिन टिकट चंडीगढ़ के नेताओं को।” आरोप है कि पिछले कई चुनावों में चंडीगढ़ के नेता न केवल अपने शहर की राजनीति तक सीमित नहीं रहे, बल्कि पंचकूला में भी सक्रिय होकर यहां के चुनावी समीकरण प्रभावित करने लगे हैं।
स्थानीय नेताओं का कहना है कि वे पूरे साल जनता के बीच रहकर उनकी समस्याओं का समाधान करते हैं, लेकिन जैसे ही चुनाव नजदीक आते हैं, बाहरी नेता अचानक सक्रिय होकर टिकट की दौड़ में शामिल हो जाते हैं।
मेयर और पार्षद टिकट पर बढ़ी दावेदारी
सूत्रों के मुताबिक, इस बार नगर निगम पंचकूला चुनाव को लेकर प्रतिस्पर्धा और भी तीखी हो गई है। चंडीगढ़ के कई पार्षद और राजनीतिक चेहरे पंचकूला में मेयर और पार्षद पद के लिए दावेदारी ठोक रहे हैं। बताया जा रहा है कि कुछ नेताओं ने तो पंचकूला में स्थायी पता दिखाने के लिए मकान तक ले लिए हैं, ताकि वे स्थानीय होने का दावा मजबूत कर सकें।
राजनीतिक सूत्र बताते हैं कि कई नेता अपने बायोडाटा के साथ हरियाणा के वरिष्ठ नेताओं के चक्कर काट रहे हैं और टिकट के लिए जोर-आजमाइश कर रहे हैं।
स्थानीय नेताओं में बढ़ता असंतोष
पंचकूला के कई वरिष्ठ और जमीनी नेता इस स्थिति से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे वर्षों से पार्टी संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं, लेकिन अंतिम समय में “पैराशूट उम्मीदवारों” को प्राथमिकता दी जाती है।
एक स्थानीय नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,
“हम पूरे साल जनता के बीच रहते हैं, उनकी समस्याएं उठाते हैं, लेकिन चुनाव आते ही बाहर के लोग आकर टिकट ले जाते हैं। इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है।”
राजनीतिक दलों के सामने चुनौती
यह मुद्दा अब सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए चुनौती बनता जा रहा है। यदि टिकट वितरण में स्थानीय नेताओं की अनदेखी होती है, तो पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ सकता है, जिसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि नगर निगम चुनावों में स्थानीय मुद्दे और स्थानीय चेहरों की अहमियत ज्यादा होती है। ऐसे में बाहरी उम्मीदवारों को टिकट देना पार्टी के लिए जोखिम भरा कदम साबित हो सकता है।
जनता क्या सोचती है?
पंचकूला के मतदाता भी इस मुद्दे पर बंटे नजर आ रहे हैं। कुछ लोग अनुभवी और प्रभावशाली चेहरों को मौका देने के पक्ष में हैं, चाहे वे कहीं से भी हों, जबकि बड़ी संख्या में लोग स्थानीय नेताओं को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे हैं।
आगे क्या?
नगर निगम चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, टिकट वितरण को लेकर यह विवाद और गहराने की संभावना है। अब देखना यह होगा कि राजनीतिक दल स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी को कैसे संभालते हैं और क्या टिकट वितरण में “स्थानीय बनाम बाहरी” का संतुलन बना पाते हैं या नहीं।
पंचकूला की सियासत में आने वाले दिनों में घमासान और तेज होने वाला है, जहां टिकट की दौड़ ही सबसे बड़ा मुद्दा बनती जा रही है।










Total Users : 292793
Total views : 495661