April 9, 2026 1:17 pm

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संस्था निर्माता से जीवन मार्गदर्शक तक: डॉ. विजय गर्ग की प्रेरक यात्रा

— डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत में शिक्षा का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। आज स्कूलों और कॉलेजों की गुणवत्ता का मूल्यांकन अक्सर परीक्षा परिणामों, प्रतिशतों और रैंकिंग के आधार पर किया जाता है। लेकिन इस चमक-दमक के बीच एक अहम सवाल पीछे छूट जाता है—क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल अच्छे अंक और नौकरी दिलाना है, या फिर एक बेहतर इंसान तैयार करना भी है? इसी सवाल का सशक्त उत्तर हैं डॉ. विजय गर्ग, जिनका जीवन शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है।
डॉ. विजय गर्ग केवल एक प्रशासक या प्रिंसिपल नहीं रहे, बल्कि वे एक ऐसे शिक्षाविद हैं जिन्होंने शिक्षा को जीवन निर्माण का माध्यम माना। लगभग चार दशकों तक उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों का नेतृत्व किया, लेकिन उनकी पहचान किसी पद से नहीं, बल्कि उनके विचारों और कार्यशैली से बनी। उनके व्यक्तित्व में शिक्षक की सरलता, चिंतक की गहराई और मार्गदर्शक की संवेदनशीलता का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य उत्तर देना नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने की क्षमता विकसित करना है। यही कारण रहा कि उनके विद्यार्थी केवल परीक्षाओं में सफल नहीं हुए, बल्कि जीवन की जटिल परिस्थितियों का सामना करने के लिए भी तैयार हुए। वे हर छात्र में एक संभावना देखते थे और उसे निखारने का प्रयास करते थे।


साधारण परिवेश में पले-बढ़े डॉ. गर्ग ने सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी शिक्षा पूरी लगन से हासिल की और डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। लेकिन उन्होंने कभी अपनी उपलब्धियों को अहंकार का आधार नहीं बनाया। उनके लिए सीखना एक सतत प्रक्रिया थी और वे जीवनभर विद्यार्थी बने रहने के पक्षधर थे।
जब उन्होंने प्रिंसिपल के रूप में कार्यभार संभाला, तो उनकी सोच साफ थी—संस्था का प्रमुख सबसे पहले एक समर्पित शिक्षार्थी होना चाहिए। वे रोज़ाना सबसे पहले विद्यालय पहुँचते और देर तक वहीं रहते। उनके लिए यह केवल नौकरी नहीं, बल्कि एक साधना थी। वे विद्यालय के हर पहलू से जुड़े रहते—चाहे वह छात्रों की समस्याएँ हों या शिक्षकों की चुनौतियाँ।
उनकी प्रशासनिक शैली में आदेश नहीं, संवाद था। उन्होंने शिक्षकों को सहयोगी माना और छात्रों को केवल रोल नंबर नहीं, बल्कि एक संपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में देखा। उनके लिए संस्था की सफलता का पैमाना परीक्षा परिणाम नहीं, बल्कि छात्रों का चरित्र और सोच थी।
डॉ. गर्ग की सबसे बड़ी विशेषता उनका अपने विद्यार्थियों से गहरा जुड़ाव था। वे वर्षों बाद भी अपने छात्रों को नाम से पहचान लेते थे, जो उनके संबंधों की गहराई को दर्शाता है। वे अक्सर ऐसे छात्रों की मदद करते थे जो किसी कारणवश पीछे रह जाते थे—कभी मार्गदर्शन देकर, तो कभी अवसर प्रदान कर।
सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने स्वयं को सक्रिय रखा। उन्होंने लेखन के माध्यम से शिक्षा और समाज से जुड़े मुद्दों पर अपने विचार साझा करने शुरू किए। उनके लेखों में अनुभव की गहराई और समाधान की स्पष्ट दिशा दिखाई देती है। वे केवल समस्याओं की चर्चा नहीं करते, बल्कि उनके व्यावहारिक समाधान भी सुझाते हैं।
आज उनके विद्यार्थी विभिन्न क्षेत्रों में सफल हैं—कोई डॉक्टर है, कोई इंजीनियर, कोई शिक्षक या प्रशासनिक अधिकारी। लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उनके छात्र संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बने।
उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक शिक्षक की असली विरासत उसके छात्रों के चरित्र और मूल्यों में दिखाई देती है। डॉ. विजय गर्ग ने केवल करियर नहीं बनाए, बल्कि जीवन गढ़े हैं।
आज जब शिक्षा प्रतिस्पर्धा और परिणामों तक सीमित होती जा रही है, तब डॉ. विजय गर्ग जैसे व्यक्तित्व हमें याद दिलाते हैं कि शिक्षा का असली उद्देश्य क्या है। वे यह सिखाते हैं कि एक शिक्षक केवल पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि समाज का निर्माता होता है।
उनकी यह “शांत क्रांति” आज भी जारी है—हर उस विद्यार्थी में, जिसने उनसे कुछ सीखा, और हर उस विचार में, जिसे उन्होंने जन्म दिया।
(डॉ. प्रियंका सौरभ)
पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार
उब्बा भवन, आर्यनगर
हिसार (हरियाणा) – 125005

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Author: BabuGiri Hindi

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