May 23, 2026 5:50 pm

May 23, 2026 5:50 pm

चंडीगढ़ के 22 गांव: विकास के वादों से हकीकत तक, क्या गांव वालों के साथ हुआ बड़ा धोखा?

चंडीगढ़ के ग्रामीणों व किसानों को याद आई पंचायती राज व्यवस्था

भैंस बेच के घोड़ी ली, दूध पीणो गए, लीद चकणी पई!

रमेश गोयत
चंडीगढ़,20 मई। “अगर चंडीगढ़ के 22 गांवों का कोई विकास ही नहीं करना था और किसानों को कोई वास्तविक लाभ नहीं देना था, तो पंचायती राज व्यवस्था ही रहने देते।”
इन दिनों चंडीगढ़ के ग्रामीण इलाकों में यह चर्चा तेजी से सुनाई दे रही है। गांवों के बुजुर्गों से लेकर युवा तक एक ही सवाल उठा रहे हैं कि जब गांवों को नगर निगम में शामिल करने के समय बड़े-बड़े सपने दिखाए गए थे, तो आज उन वादों का क्या हुआ?

गांवों में एक पुरानी कहावत अक्सर सुनाई दे रही है—
“भैंस बेच के घोड़ी ली, दूध पीणो गए, लीद चकणी पई।”
यानी जो व्यवस्था पहले थी, वह भले साधारण थी लेकिन लोगों के काम आती थी। नई व्यवस्था अपनाने के बाद स्थिति पहले से भी खराब हो गई। ग्रामीणों का कहना है कि चंडीगढ़ के गांवों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है।

पंचायती राज से नगर निगम तक का सफर

वरिष्ठ भाजपा नेता व निदेशक सहकारी बैक चंडीगढ़ सतेंद्र पाल संधू ने कहा कि चंडीगढ़ के 22 गांवों को वर्षों पहले नगर निगम के दायरे में शामिल किया गया था। उस समय प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व द्वारा दावा किया गया था कि गांवों का तेजी से शहरी विकास होगा। बेहतर सड़कें, सीवरेज, पानी की सुविधा, आधुनिक स्ट्रीट लाइट, स्वास्थ्य सेवाएं, पार्क, सामुदायिक केंद्र और रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे।

ग्रामीणों को यह भी भरोसा दिलाया गया था कि उनकी जमीनों के दाम बढ़ेंगे, युवाओं को रोजगार मिलेगा और गांवों की तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी। लेकिन अब ग्रामीणों का आरोप है कि नगर निगम में शामिल होने के बाद उनकी समस्याएं कम होने के बजाय और बढ़ गईं।

गांवों की पहचान धीरे-धीरे खत्म होने का आरोप
वरिष्ठ भाजपा नेता व निदेशक सहकारी बैक चंडीगढ़ सतेंद्र पाल संधू व ग्रामीणों का कहना है कि पहले पंचायती राज व्यवस्था में गांवों की अपनी पहचान थी। गांव का सरपंच सीधे लोगों की समस्याएं सुनता था और छोटे-मोटे कार्य जल्दी हो जाते थे। गांवों के विकास के लिए अलग फंड आते थे और पंचायतें स्थानीय जरूरतों के अनुसार फैसले लेती थीं।
लेकिन नगर निगम व्यवस्था आने के बाद गांवों की प्रशासनिक स्वतंत्रता खत्म हो गई। अब हर छोटे काम के लिए निगम कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। कई बार फाइलें महीनों तक अटकी रहती हैं और लोगों की समस्याओं का समाधान समय पर नहीं हो पाता।
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि पहले गांवों में आपसी भागीदारी से विकास कार्य होते थे, लेकिन अब निर्णय शहर के हिसाब से लिए जाते हैं जबकि गांवों की जरूरतें अलग हैं।

किसानों की सबसे बड़ी चिंता — जमीन और मुआवजा
ग्रामीणों और किसानों का सबसे बड़ा दर्द जमीनों को लेकर है। उनका कहना है कि गांवों को शहरी क्षेत्र में शामिल तो कर लिया गया, लेकिन किसानों को वैसा लाभ नहीं मिला जैसा अन्य राज्यों के शहरी विस्तार वाले क्षेत्रों में देखने को मिलता है।
कई किसानों का आरोप है कि उनकी कृषि भूमि पर विकास योजनाएं बनीं, लेकिन बदले में उन्हें पर्याप्त मुआवजा या पुनर्वास नहीं मिला। खेती धीरे-धीरे खत्म होती गई और युवाओं के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया।
गांवों के लोगों का कहना है कि पहले खेती से परिवार चलता था, लेकिन अब खेती की जमीन कम हो रही है और वैकल्पिक रोजगार की कोई मजबूत व्यवस्था भी नहीं है। परिणामस्वरूप ग्रामीण परिवार आर्थिक दबाव झेल रहे हैं।

बुनियादी सुविधाओं पर भी सवाल
नगर निगम में शामिल होने के वर्षों बाद भी कई गांवों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर असंतोष बना हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि कई जगहों पर टूटी सड़कें, खराब सीवरेज व्यवस्था, जलभराव, स्ट्रीट लाइट की कमी और सफाई व्यवस्था की समस्याएं अब भी मौजूद हैं।
बरसात के दिनों में कई गांवों में पानी भर जाता है। सीवरेज जाम होने की शिकायतें आम हैं। कुछ गांवों में पार्कों और सामुदायिक भवनों की हालत भी खराब बताई जाती है।
लोगों का कहना है कि शहर के सेक्टरों की तुलना में गांवों को बराबर सुविधाएं नहीं मिल रहीं। टैक्स और नियम शहर जैसे लागू हो गए, लेकिन सुविधाएं गांवों को अब भी अधूरी मिल रही हैं।

युवाओं में बढ़ रही नाराजगी
गांवों के युवाओं में भी असंतोष बढ़ता दिखाई दे रहा है। उनका कहना है कि नगर निगम में शामिल होने के समय रोजगार और कौशल विकास के बड़े दावे किए गए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर बहुत कम काम हुआ।
युवाओं का कहना है कि गांवों में खेल सुविधाएं, लाइब्रेरी, प्रशिक्षण केंद्र और रोजगार मार्गदर्शन जैसी व्यवस्थाएं बेहद सीमित हैं। कई युवा निजी नौकरियों या छोटे-मोटे कामों के लिए दूसरे शहरों की ओर जाने को मजबूर हैं।
कुछ युवाओं का यह भी कहना है कि गांवों की पारंपरिक सामाजिक संरचना कमजोर हुई है, लेकिन आधुनिक शहरी सुविधाओं का लाभ भी पूरी तरह नहीं मिला।

राजनीतिक मुद्दा बनते गांव
चंडीगढ़ के गांवों की समस्याएं अब राजनीतिक मुद्दा भी बनती जा रही हैं। विभिन्न सामाजिक संगठनों और ग्रामीण प्रतिनिधियों द्वारा समय-समय पर प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन किए जाते रहे हैं।
ग्रामीणों की मांग है कि गांवों के विकास के लिए अलग नीति बनाई जाए। पंचायत जैसी स्थानीय भागीदारी की व्यवस्था फिर से मजबूत की जाए ताकि गांवों के लोग अपने विकास से जुड़े फैसलों में भागीदारी कर सकें।
कुछ लोग यह भी मांग कर रहे हैं कि गांवों के लिए अलग विकास बोर्ड बनाया जाए, जो केवल ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं और योजनाओं पर काम करे।

“स्मार्ट सिटी” में गांव खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे
चंडीगढ़ को देश के सबसे योजनाबद्ध और आधुनिक शहरों में गिना जाता है। स्मार्ट सिटी परियोजनाओं और शहरी विकास के बड़े दावे भी किए जाते हैं। लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि शहर की चमक के बीच गांवों की समस्याएं दब गई हैं।
उनका आरोप है कि सेक्टरों के विकास पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है जबकि गांवों को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। ग्रामीण चाहते हैं कि विकास का लाभ समान रूप से गांवों तक भी पहुंचे।

ग्रामीणों की मुख्य मांगें
ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों द्वारा प्रमुख रूप से ये मांगें उठाई जा रही हैं—
गांवों के लिए विशेष विकास नीति बनाई जाए
किसानों और जमीन मालिकों के हितों की सुरक्षा हो
गांवों में मूलभूत सुविधाओं को प्राथमिकता दी जाए
युवाओं के लिए रोजगार और कौशल विकास योजनाएं शुरू हों
स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाई जाए
लंबित विकास कार्यों को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाए

सवाल अब भी कायम
आज चंडीगढ़ के गांवों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नगर निगम में शामिल होने का फैसला वास्तव में गांवों के हित में था? ग्रामीणों का कहना है कि अगर उन्हें न तो पर्याप्त विकास मिला और न ही आर्थिक-सामाजिक लाभ, तो फिर पुरानी पंचायती व्यवस्था ही बेहतर थी।

गांवों में गूंज रही कहावत —
“भैंस बेच के घोड़ी ली, दूध पीणो गए, लीद चकणी पई”
— केवल एक व्यंग्य नहीं, बल्कि ग्रामीणों की उस पीड़ा को दर्शाती है जिसमें उन्हें लगता है कि विकास के नाम पर उनकी पुरानी व्यवस्था तो खत्म कर दी गई, लेकिन बदले में उन्हें वह सुविधाएं नहीं मिलीं जिनका सपना दिखाया गया था।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि ग्रामीणों की इन शिकायतों को कितनी गंभीरता से लेते हैं और क्या चंडीगढ़ के गांवों को वास्तव में वह विकास मिल पाएगा जिसका वादा वर्षों पहले किया गया था।

मध्य मार्ग पर बना पंचायत भवन आज बना यूटी गेस्ट हाउस
चंडीगढ़ के ग्रामीणों के बीच सेक्टर-18 स्थित पुराना पंचायत भवन एक बार फिर चर्चा का विषय बना हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि पंचायती राज व्यवस्था खत्म होने के बाद गांवों से उनकी कई पुरानी सुविधाएं भी छिन गईं, जिनमें यह पंचायत भवन भी शामिल है।
मध्य मार्ग पर स्थित यह भवन कभी पंचायती राज विभाग के अधीन पंचायत भवन के रूप में कार्य करता था। गांवों से आने वाले किसान, पंच, सरपंच और ग्रामीण यहां ठहरते थे तथा अपने प्रशासनिक और सामाजिक कार्यों के लिए इसका उपयोग करते थे। यह भवन ग्रामीणों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था।
लेकिन समय के साथ पंचायत व्यवस्था समाप्त होने और गांवों के नगर निगम दायरे में आने के बाद इस भवन का स्वरूप बदल गया। अब यह भवन “यूटी गेस्ट हाउस-2” के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले यह भवन गांवों और किसानों की पहचान से जुड़ा हुआ था, लेकिन अब उनका इससे कोई संबंध नहीं रह गया। कई बुजुर्ग ग्रामीण बताते हैं कि जब भी वे सेक्टर-18 से गुजरते हैं तो उन्हें पुराने दिनों की याद आ जाती है, जब पंचायत भवन गांवों की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र हुआ करता था।
ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत व्यवस्था खत्म होने के बाद केवल प्रशासनिक ढांचा ही नहीं बदला, बल्कि गांवों की सामाजिक पहचान और सुविधाएं भी धीरे-धीरे खत्म होती चली गईं। अब लोगों को पंचायत भवन जैसी व्यवस्थाओं की कमी भी महसूस होने लगी है।

आज गांवों की स्थिति देखकर लोगों में भारी निराशा
वरिष्ठ भाजपा नेता व निदेशक सहकारी बैक चंडीगढ़ सतेंद्र पाल संधू ने कहा कि चंडीगढ़ के 22 गांवों को नगर निगम में शामिल करते समय ग्रामीणों और किसानों को बड़े स्तर पर विकास, आधुनिक सुविधाओं और आर्थिक मजबूती के सपने दिखाए गए थे, लेकिन आज गांवों की स्थिति देखकर लोगों में भारी निराशा है। उन्होंने कहा कि पंचायती राज व्यवस्था में गांवों की अपनी पहचान, भागीदारी और निर्णय लेने की ताकत थी, लेकिन अब गांवों के लोग खुद को प्रशासनिक व्यवस्था में उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
संधू ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सीवरेज, टूटी सड़कें, जलभराव, सफाई और स्ट्रीट लाइट जैसी मूलभूत समस्याएं बनी हुई हैं। किसानों को उनकी जमीनों के बदले अपेक्षित लाभ नहीं मिला और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी नहीं बढ़ पाए। उन्होंने कहा कि गांवों के लोग आज यह महसूस कर रहे हैं कि “भैंस बेच के घोड़ी ली, दूध पीणो गए, लीद चकणी पई” वाली कहावत उनके हालात पर पूरी तरह फिट बैठती है।
उन्होंने प्रशासन से मांग की कि गांवों के लिए अलग विकास नीति बनाई जाए, लंबित विकास कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाए और ग्रामीणों की भागीदारी सुनिश्चित कर गांवों की समस्याओं का स्थायी समाधान किया जाए।

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

virender chahal

Our Visitor

3 2 3 4 8 7
Total Users : 323487
Total views : 540167

शहर चुनें