June 5, 2026 4:32 am

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हरियाली के नाम पर छलावा: पेड़ काटने की खुली छूट या पर्यावरण संरक्षण?

— आर. के. गर्ग, लेखक की कलम से
देश और दुनिया में विकास की दौड़ लगातार तेज होती जा रही है। शहरों का विस्तार हो रहा है, नई सड़कें बनाई जा रही हैं, फ्लाईओवर खड़े हो रहे हैं, मेट्रो परियोजनाएं बढ़ रही हैं और आधुनिक इमारतों का जाल फैलता जा रहा है। सरकारें और प्रशासन इन परियोजनाओं को विकास का प्रतीक बताकर जनता के सामने प्रस्तुत करते हैं। लेकिन इसी विकास की चमक के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी छिपी हुई है—हरियाली का लगातार समाप्त होना।
आज लगभग हर बड़े निर्माण कार्य के साथ एक सामान्य तर्क सुनाई देता है—“अगर एक पेड़ काटा जाएगा तो बदले में पांच पेड़ लगाए जाएंगे।” यह वाक्य अब सरकारी फाइलों, परियोजनाओं और प्रेस विज्ञप्तियों का स्थायी हिस्सा बन चुका है। पहली नजर में यह तर्क संतुलित और पर्यावरण हितैषी लगता है, लेकिन यदि इसकी गहराई में जाएं तो कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वास्तव में काटे गए पेड़ों की भरपाई हो रही है? यदि हो रही है तो उसका प्रमाण क्या है? लगाए गए पौधे कहां हैं? कितने जीवित हैं? और उनकी देखभाल कौन कर रहा है?
परिपक्व वृक्ष केवल पेड़ नहीं, जीवन का आधार हैं
आज आवश्यकता इस बात को समझने की है कि दशकों पुराने पेड़ केवल लकड़ी का ढांचा नहीं होते। वे पूरे पर्यावरण तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। एक परिपक्व वृक्ष अपने जीवनकाल में लाखों रुपये के बराबर पर्यावरणीय सेवाएं देता है। वह केवल ऑक्सीजन ही नहीं देता, बल्कि वातावरण को ठंडा रखता है, भूजल संरक्षण में मदद करता है, धूल और प्रदूषण को रोकता है और असंख्य पक्षियों व जीवों का घर होता है।
गर्मी के दिनों में एक बड़ा पेड़ जिस प्रकार आसपास के तापमान को नियंत्रित करता है, उसका विकल्प कोई एयर कंडीशनर नहीं बन सकता। पेड़ों की छाया केवल आराम नहीं देती, बल्कि शहरी तापमान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आज जब शहरों में “हीट आइलैंड इफेक्ट” तेजी से बढ़ रहा है, तब बड़े वृक्षों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
इसके बावजूद विकास परियोजनाओं के नाम पर सबसे पहले पेड़ों पर ही आरी चलती है। सड़क चौड़ीकरण, भवन निर्माण, पार्किंग, बिजली लाइन, व्यावसायिक परिसर या सौंदर्यीकरण—हर परियोजना में पेड़ों को बाधा मान लिया जाता है।

क्या छोटा पौधा बड़े पेड़ की भरपाई कर सकता है?
सरकारी तर्क अक्सर यही होता है कि एक पेड़ काटने के बदले पांच या दस पौधे लगाए जाएंगे। लेकिन यह तर्क व्यवहारिक रूप से कितना सही है?
कल्पना कीजिए कि 40 या 50 वर्ष पुराना एक विशाल बरगद, पीपल, नीम या आम का पेड़ काट दिया जाए और उसकी जगह पांच छोटे पौधे लगा दिए जाएं। क्या वे पौधे अगले ही दिन वही ऑक्सीजन देंगे? क्या वे उतनी ही छाया देंगे? क्या उनमें पक्षी घोंसला बनाएंगे? क्या वे वातावरण को उसी स्तर तक ठंडा रख पाएंगे?
सच्चाई यह है कि एक छोटा पौधा परिपक्व वृक्ष बनने में 15 से 30 वर्ष तक का समय ले सकता है। कई पौधे तो शुरुआती वर्षों में ही सूख जाते हैं। ऐसे में केवल पौधों की संख्या गिन लेना पर्यावरण संरक्षण नहीं कहा जा सकता।
फलदार पेड़ों की बात करें तो उनका महत्व और अधिक है। एक फलदार वृक्ष केवल पर्यावरण ही नहीं, बल्कि समाज और जैव विविधता को भी लाभ देता है। वह मनुष्य, पक्षियों और अन्य जीवों के भोजन का स्रोत होता है। ऐसे वृक्षों को काटकर उनकी भरपाई केवल कागजों में संभव नहीं है।

प्रतिपूरक वृक्षारोपण या कागजी हरियाली?
आज सबसे अधिक चिंता “कम्पेन्सेटरी प्लांटेशन” यानी प्रतिपूरक वृक्षारोपण की व्यवस्था को लेकर है। कागजों में हजारों पौधे लगाए जाते हैं, बजट खर्च होते हैं, फोटो खिंचवाई जाती हैं, लेकिन कुछ महीनों बाद अधिकांश पौधे गायब मिलते हैं।
शहरों में अक्सर देखा जाता है कि पौधे लगाने के बाद उनकी कोई देखभाल नहीं होती। न नियमित पानी दिया जाता है, न सुरक्षा के इंतजाम होते हैं और न ही निगरानी की व्यवस्था। परिणामस्वरूप कुछ ही समय में पौधे सूख जाते हैं।
दुर्भाग्य यह है कि इसके बावजूद सरकारी रिकॉर्ड में वृक्षारोपण “सफल” घोषित कर दिया जाता है। जनता को यह नहीं बताया जाता कि लगाए गए पौधों में से कितने जीवित हैं।
यदि वास्तव में पर्यावरण संरक्षण गंभीर मुद्दा है, तो हर वृक्षारोपण अभियान का सार्वजनिक ऑडिट होना चाहिए। कितने पौधे लगाए गए, कहां लगाए गए, उनकी प्रजाति क्या है, उनकी वर्तमान स्थिति क्या है—यह जानकारी सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध होनी चाहिए।

सचिवालय और शहरों में पेड़ों की कटाई पर उठते सवाल
हाल के वर्षों में कई शहरों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई देखने को मिली है। कई स्थानों पर रातों-रात पेड़ काट दिए गए। नागरिकों ने सवाल उठाए, सामाजिक संगठनों ने विरोध किया, लेकिन जवाब अधूरे ही रहे।
सवाल यह नहीं कि विकास कार्य क्यों हो रहे हैं। सवाल यह है कि क्या विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने का गंभीर प्रयास किया जा रहा है?
जब किसी इलाके में पेड़ काटे जाते हैं, तो वहां रहने वाले लोगों पर उसका सीधा प्रभाव पड़ता है। तापमान बढ़ता है, धूल और प्रदूषण बढ़ता है, पक्षियों की संख्या कम होती है और क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता समाप्त हो जाती है।
कई बार प्रशासन यह तर्क देता है कि “अनुमति लेकर” पेड़ काटे गए हैं। लेकिन क्या आम नागरिकों को यह जानकारी दी जाती है कि अनुमति किस आधार पर दी गई? क्या स्वतंत्र पर्यावरणीय अध्ययन हुआ? क्या विकल्पों पर विचार किया गया?
इन सवालों का जवाब लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को मिलना चाहिए।

पर्यावरण केवल सरकारी विषय नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी भी
आज पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी विभागों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
यदि किसी शहर की हरियाली समाप्त होगी तो उसका नुकसान केवल सरकार को नहीं, बल्कि हर नागरिक को झेलना पड़ेगा। बढ़ती गर्मी, प्रदूषण, जल संकट और स्वास्थ्य समस्याएं सीधे लोगों के जीवन को प्रभावित करेंगी।
आज बच्चों को स्कूलों में पर्यावरण पढ़ाया जाता है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर हम उन्हें कैसी दुनिया दे रहे हैं? यदि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा और हरियाली नहीं मिलेगी, तो विकास का क्या अर्थ रह जाएगा?

समाधान क्या हो सकता है?
समस्या केवल पेड़ काटने की नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी की भी है। इसलिए कुछ ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है—
1. सार्वजनिक सूचना अनिवार्य हो
किसी भी पेड़ को काटने से पहले उसकी जानकारी सार्वजनिक की जाए। नागरिकों को बताया जाए कि पेड़ क्यों काटा जा रहा है और क्या उसके विकल्प संभव हैं।
2. स्वतंत्र पर्यावरणीय मूल्यांकन
किसी भी बड़ी परियोजना से पहले स्वतंत्र विशेषज्ञों द्वारा पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन अनिवार्य होना चाहिए।
3. सर्वाइवल ऑडिट लागू हो
सिर्फ पौधे लगाने से काम नहीं चलेगा। कम से कम पांच वर्षों तक उनकी निगरानी हो और यह सार्वजनिक रूप से बताया जाए कि कितने पौधे जीवित हैं।
4. स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता
विदेशी सजावटी पौधों की बजाय स्थानीय और पर्यावरण के अनुकूल प्रजातियों को लगाया जाए।
5. नागरिक भागीदारी बढ़े
स्थानीय निवासी, सामाजिक संगठन और पर्यावरण कार्यकर्ताओं को निगरानी प्रक्रिया में शामिल किया जाए।
6. बड़े पेड़ों के संरक्षण की नीति बने
जहां संभव हो, परियोजनाओं का डिजाइन इस प्रकार बनाया जाए कि पुराने पेड़ों को बचाया जा सके।
केवल फोटो नहीं, वास्तविक संरक्षण चाहिए
आज वृक्षारोपण अभियान कई बार केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं। मंत्री, अधिकारी और नेता पौधे लगाकर फोटो खिंचवाते हैं, समाचार प्रकाशित होते हैं और कुछ दिनों बाद पौधे सूख जाते हैं।
पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल प्रचार नहीं है। यह एक दीर्घकालिक जिम्मेदारी है, जिसके लिए ईमानदार प्रयास आवश्यक हैं।
यदि वास्तव में सरकारें और प्रशासन पर्यावरण को लेकर गंभीर हैं, तो उन्हें केवल पौधे लगाने की संख्या बताने की बजाय उनकी जीवित स्थिति और दीर्घकालिक संरक्षण पर ध्यान देना होगा।

विकास बनाम पर्यावरण नहीं, विकास के साथ पर्यावरण
यह कहना गलत होगा कि विकास रुक जाना चाहिए। सड़कें, अस्पताल, स्कूल और सार्वजनिक सुविधाएं आवश्यक हैं। लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जो प्रकृति को पूरी तरह नष्ट न करे।
दुनिया के कई देशों में “ग्रीन डेवलपमेंट” मॉडल अपनाया जा रहा है, जहां निर्माण कार्यों के साथ पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी जाती है। भारत में भी अब इस सोच को मजबूत करने की आवश्यकता है।
यदि आज बड़े वृक्षों को बचाने के लिए गंभीर कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में शहर कंक्रीट के जंगल बन जाएंगे। वहां न स्वच्छ हवा होगी, न प्राकृतिक छाया और न ही जैव विविधता।

एक के बदले पांच पेड़” का नारा तभी सार्थक होगा जब वह जमीन पर वास्तविकता के रूप में दिखाई दे। केवल कागजों में वृक्षारोपण दिखाकर पर्यावरण संरक्षण का दावा करना आत्मछल के समान है।
आज जरूरत इस बात की है कि हरियाली को केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि जीवित वास्तविकता के रूप में देखा जाए। एक परिपक्व वृक्ष की कीमत समझी जाए और विकास योजनाओं में पर्यावरण को बाधा नहीं, बल्कि जीवन का आधार माना जाए।
वरना वह दिन दूर नहीं जब शहरों में पेड़ों की जगह केवल सीमेंट और कंक्रीट दिखाई देंगे, और आने वाली पीढ़ियां किताबों में पढ़ेंगी कि कभी शहरों में घने पेड़ हुआ करते थे।

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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