सस्ता कमरा… महंगा पड़ सकता है सौदा
चंडीगढ़ प्रशासन को हादसे का इंतजार
रमेश गोयत
चंडीगढ़,5 जून। चंडीगढ़ में ग्रामीण एरिया में सस्ते होटल व सेक्टरों में कोचिंग सेंटरों का अवैध कारोबार जोरो पर है। इस तरफ चंडीगढ़ प्रशासन, फायर विभाग व पुलिस का कोई भी ध्यान नही है। सेक्टर 34 में सबसे ज्यादा कोचिंग सेंटर खुले है। जिनमे फायर सेफ़्टी की तरफ कोई ध्यान नही है। अधिकतर पर तो फायर की एनओसी भी नही है। इसी प्रकार चंडीगढ़ के ग्रामीण एरिया में खुले अवैध होटलों का है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार यह होटल मोटी मंथली के दम पर चल रहे है। जहाँ से सभी सम्बंधित विभागो को मंथली जा रही है। एक दिन भी मन्थली लेट होने पर होटल बंद करवा दिया जाता है। सभी को इस बात का भी ज्ञान है कि इन अवैध होटलों में क्या चल रहा है। देश की राजधानी दिल्ली में हाल ही में हुए होटल अग्निकांड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार क्यों करता है। दिल्ली में आग लगने की घटना में कई लोगों की जान चली गई और कई परिवार हमेशा के लिए उजड़ गए। जांच में सामने आया कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी, संकरे रास्ते, अपर्याप्त निकासी व्यवस्था और अग्निशमन उपकरणों की कमी ने हादसे को और भयावह बना दिया।
दिल्ली का यह हादसा केवल राजधानी तक सीमित नहीं है। इसकी गूंज अब चंडीगढ़ और ट्राइसिटी क्षेत्र तक सुनाई दे रही है, जहां बड़ी संख्या में अवैध होटल, गेस्ट हाउस और कोचिंग सेंटर सुरक्षा नियमों को ताक पर रखकर संचालित हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई तो यहां भी किसी दिन दिल्ली जैसा बड़ा हादसा हो सकता है।
रिहायशी इलाकों में चल रहे होटल
चंडीगढ़ के बुड़ैल, दड़ुआ, किशनगढ़ और कजेहड़ी जैसे इलाकों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान बड़ी संख्या में छोटे-बड़े होटल और गेस्ट हाउस खुल गए हैं। इनमें से अधिकांश रिहायशी क्षेत्रों में बने हुए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई इमारतें बिना स्वीकृत नक्शे और भवन नियमों का पालन किए खड़ी कर दी गईं।
इन होटलों का निर्माण 75 से 100 गज के छोटे प्लॉटों पर किया गया है। कई भवनों में 10 से 20 कमरों तक की व्यवस्था है, लेकिन सुरक्षा सुविधाएं लगभग नदारद हैं। कम कीमत पर कमरे उपलब्ध होने के कारण बाहर से आने वाले विद्यार्थी, नौकरीपेशा लोग और पर्यटक इनका उपयोग करते हैं, लेकिन उन्हें यह अंदाजा नहीं होता कि वे किस तरह के जोखिम के बीच रात गुजार रहे हैं।
संकरी सीढ़ियां और बंद रास्ते
जमीनी स्तर पर देखने पर स्थिति और चिंताजनक नजर आती है। कजेहड़ी और बुड़ैल के कई होटलों में सीढ़ियां इतनी संकरी हैं कि आपात स्थिति में दो व्यक्ति एक साथ नीचे नहीं उतर सकते। कई इमारतों में केवल एक ही प्रवेश और निकास मार्ग है।
यदि आग जैसी घटना हो जाए तो धुआं पूरे भवन में तेजी से फैल सकता है और अंदर फंसे लोगों के लिए बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा। भवन निर्माण विशेषज्ञों के अनुसार बहुमंजिला इमारतों में वैकल्पिक निकासी मार्ग, चौड़े कॉरिडोर और फायर एग्जिट अनिवार्य होते हैं, लेकिन अधिकांश छोटे होटलों में इन नियमों का पालन नहीं किया गया।
अग्निशमन यंत्र केवल दिखावे के लिए
कई होटलों में अग्निशमन यंत्र या तो मौजूद नहीं हैं या उनकी वैधता अवधि समाप्त हो चुकी है। कुछ स्थानों पर फायर एक्सटिंग्विशर केवल औपचारिकता के तौर पर टंगे हुए दिखाई देते हैं।
अग्निशमन विशेषज्ञों का कहना है कि आग लगने के शुरुआती मिनट सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। यदि उस समय प्रशिक्षित स्टाफ और कार्यशील उपकरण मौजूद हों तो बड़े हादसे को रोका जा सकता है। लेकिन जहां उपकरण ही निष्क्रिय हों, वहां स्थिति नियंत्रण से बाहर होने में देर नहीं लगती।
भवन उपनियमों की खुली अवहेलना
जानकारों के अनुसार भवन निर्माण उपनियमों के तहत होटल, गेस्ट हाउस और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए अलग-अलग सुरक्षा मानक निर्धारित हैं। पार्किंग, फायर सेफ्टी, निकासी मार्ग, विद्युत सुरक्षा और संरचनात्मक मजबूती जैसी शर्तें अनिवार्य होती हैं।
इसके बावजूद ट्राइसिटी के कई क्षेत्रों में ऐसे निर्माण दिखाई देते हैं जो किसी भी मानक पर खरे नहीं उतरते। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि कई भवनों को पहले रिहायशी मकान के रूप में मंजूरी मिली और बाद में उन्हें होटल या गेस्ट हाउस में बदल दिया गया।
केवल होटल ही नहीं, कोचिंग सेंटर भी खतरे में
सुरक्षा मानकों की अनदेखी का मामला केवल होटलों तक सीमित नहीं है। चंडीगढ़ के लगभग हर सेक्टर में बड़ी संख्या में कोचिंग सेंटर संचालित हो रहे हैं। इनमें हजारों छात्र प्रतिदिन पढ़ाई के लिए पहुंचते हैं।
शिक्षा के बढ़ते कारोबार के बीच सुरक्षा व्यवस्था पीछे छूट गई है। कई कोचिंग सेंटर बहुमंजिला इमारतों में चल रहे हैं, जहां एक ही सीढ़ी से सैकड़ों विद्यार्थियों का आना-जाना होता है। आपातकालीन निकास द्वार, फायर अलार्म सिस्टम और निकासी योजना जैसी सुविधाएं अधिकांश स्थानों पर दिखाई नहीं देतीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी कोचिंग सेंटर में आग लग जाए या भगदड़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाए तो छात्रों को सुरक्षित बाहर निकालना बेहद कठिन हो सकता है।
फायर एनओसी पर भी सवाल
नियमों के अनुसार निर्धारित क्षमता और श्रेणी की इमारतों को अग्निशमन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र (फायर एनओसी) लेना आवश्यक होता है। इसके लिए भवन की सुरक्षा व्यवस्था का निरीक्षण किया जाता है।
हालांकि शहर में संचालित अनेक संस्थानों को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या वे वास्तव में सभी सुरक्षा मानकों का पालन कर रहे हैं। कई स्थानों पर एनओसी की स्थिति स्पष्ट नहीं है, जबकि कुछ भवनों में सुरक्षा उपकरणों की हालत देखकर ही नियमों के पालन पर संदेह पैदा हो जाता है।
हादसे के बाद ही क्यों जागता है सिस्टम?
भारत में अक्सर देखा गया है कि किसी बड़े हादसे के बाद प्रशासनिक सक्रियता बढ़ जाती है। जांच समितियां बनती हैं, नोटिस जारी होते हैं और अभियान चलाए जाते हैं। लेकिन समय बीतने के साथ मामला फिर ठंडे बस्ते में चला जाता है।
दिल्ली के होटल अग्निकांड के बाद भी यही सवाल उठ रहा है कि क्या चंडीगढ़ प्रशासन, नगर निगम और अग्निशमन विभाग शहर के संवेदनशील क्षेत्रों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट कराएंगे या फिर किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जाएगा।
विशेषज्ञों की मांग
शहरी नियोजन और अग्नि सुरक्षा विशेषज्ञों ने कई सुझाव दिए हैं। उनके अनुसार सभी होटलों, गेस्ट हाउसों और कोचिंग सेंटरों का विशेष निरीक्षण अभियान चलाया जाना चाहिए। जिन संस्थानों के पास आवश्यक अनुमति और सुरक्षा प्रमाण पत्र नहीं हैं, उनके खिलाफ तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए।
इसके अलावा हर भवन में नियमित फायर ड्रिल, कार्यशील अग्निशमन उपकरण, आपातकालीन निकास मार्ग और प्रशिक्षित स्टाफ सुनिश्चित किया जाना चाहिए। छात्रों और यात्रियों को भी सुरक्षा मानकों के प्रति जागरूक करना जरूरी है।
हादसे का इंतजार नहीं, कार्रवाई का समय
दिल्ली का होटल अग्निकांड एक चेतावनी है। यह याद दिलाता है कि सुरक्षा नियम कागजों के लिए नहीं, बल्कि लोगों की जान बचाने के लिए बनाए जाते हैं। चंडीगढ़ और ट्राइसिटी में तेजी से बढ़ रहे अवैध होटल, गेस्ट हाउस और कोचिंग सेंटर प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन चुके हैं।
सस्ते कमरे और कम किराये के लालच में लोग उन इमारतों में ठहर रहे हैं जहां किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता है। वहीं हजारों विद्यार्थी रोजाना ऐसे कोचिंग सेंटरों में पढ़ाई कर रहे हैं जहां आपातकालीन निकासी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन समय रहते सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा करेगा, या फिर किसी दर्दनाक हादसे के बाद कार्रवाई की औपचारिकता निभाई जाएगी। क्योंकि जब आग लगती है तो नियमों की फाइलें नहीं, बल्कि लोगों की जान दांव पर लगी होती है।













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