July 13, 2026 5:06 am

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हरियाणवी लघुकथा का प्रथम प्रतिनिधि संकलन : ‘म्हारी माट्टी, म्हारे आखर’

म्हारी माट्टी, म्हारे आखर’ पहली बार देश-विदेश में सक्रिय 33 हरियाणवी लघुकथाकारों की रचनात्मक चेतना को एक ही कृति में समेटने वाला महत्त्वपूर्ण संकलन है। 99 लघुकथाओं से सुसज्जित यह पुस्तक हरियाणा की लोकसंस्कृति, जनजीवन, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक यथार्थ का सजीव दस्तावेज़ बनकर सामने आती है। युवा प्रेरणास्रोत श्री मनुमुक्त ‘मानव’, आईपीएस की स्मृति को समर्पित यह कृति डॉ. रामनिवास ‘मानव’ के मार्गदर्शन में डॉ. प्रियंका सौरभ द्वारा संकलित, डॉ. सत्यवान सौरभ द्वारा संपादित तथा सुरेंद्र बांसल द्वारा आकर्षक आवरण-सज्जा के साथ वर्ष 2026 में प्रकाशित हुई है। 121 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य ₹275 है। हरियाणवी भाषा और लोकसाहित्य के अध्येताओं तथा साहित्य-प्रेमियों के लिए यह निस्संदेह एक संग्रहणीय कृति है।
— डॉ. विजय गर्ग
हर भाषा की वास्तविक शक्ति उसकी माटी में निहित होती है और उसी माटी से जन्म लेते हैं उसके आखर। ‘म्हारी माट्टी, म्हारे आखर’ उसी सोंधी सुगंध को अपने भीतर समेटे एक ऐसा लघुकथा-संकलन है, जो केवल हरियाणवी बोली की जीवंतता का परिचय ही नहीं कराता, बल्कि समकालीन हिंदी साहित्य की सर्वाधिक प्रभावशाली विधाओं में से एक—लघुकथा—को हरियाणवी अभिव्यक्ति के साथ सशक्त स्वर भी प्रदान करता है।
यह संकलन डॉ. सत्यवान सौरभ के संपादन और डॉ. प्रियंका सौरभ के संकलन में तैयार हुआ है, जिसमें 33 लघुकथाकारों की कुल 99 लघुकथाएँ शामिल हैं। यह संख्या केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि हरियाणवी लघुकथा के विकसित होते स्वरूप का सशक्त संकेत है। लंबे समय तक हरियाणवी साहित्य मुख्यतः लोकगीतों, रागनियों और किस्सागोई तक सीमित रहा, किंतु यह संकलन प्रमाणित करता है कि अब यह बोली आधुनिक साहित्यिक विधाओं में भी अपनी सुदृढ़ उपस्थिति दर्ज करा रही है।
लघुकथा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी संक्षिप्तता है, किंतु इस संकलन को पढ़ते हुए अनुभव होता है कि यहाँ शब्द कम हैं, पर प्रभाव अत्यंत गहरा है। प्रत्येक रचना किसी एक घटना, भावना अथवा सामाजिक स्थिति को केंद्र में रखकर लिखी गई है, जो पाठक को तुरंत अपने साथ जोड़ लेती है। ये कहानियाँ केवल पढ़ी नहीं जातीं, बल्कि महसूस भी की जाती हैं—और यही इस संकलन की सबसे बड़ी सफलता है।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति इसकी विषय-विविधता है। इसमें जीवन के अनेक रंग दिखाई देते हैं—रिश्तों की मिठास, समाज की कटु सच्चाइयाँ, ग्रामीण जीवन की सहजता और बदलते समय की जटिलताएँ। ‘तड़कै की माँ’ में मातृत्व की संवेदना झलकती है, ‘इज्जत की परिभासा’ सामाजिक मानदंडों पर प्रश्न उठाती है, ‘बहू बिहार की’ सामाजिक पूर्वाग्रहों को उजागर करती है, जबकि ‘माटी की सोंध’ और ‘घूंघट अर घड़ी’ जैसी रचनाएँ हरियाणा की सांस्कृतिक जड़ों से गहरे जुड़ाव का सजीव चित्र प्रस्तुत करती हैं।
हरियाणवी भाषा की सादगी और उसका सीधा-सरल स्वभाव इन लघुकथाओं को और अधिक प्रभावशाली बनाता है। यहाँ भाषा में कोई बनावट या कृत्रिमता नहीं, बल्कि सहज प्रवाह है, जो सीधे पाठक के मन तक पहुँचता है। यह संकलन इस धारणा को पुष्ट करता है कि साहित्य की गहराई भाषा की जटिलता में नहीं, बल्कि उसकी संवेदनशीलता में निहित होती है।
हालाँकि, इस पुस्तक का एक पक्ष ऐसा भी है जो ध्यान आकर्षित करता है—भाषाई एकरूपता का अभाव। चूँकि इसमें अनेक लेखकों की रचनाएँ संकलित हैं, इसलिए हरियाणवी के विविध रूप सामने आते हैं। कहीं भाषा शुद्ध लोकधर्मी है तो कहीं हिंदी का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। यह विविधता एक ओर संकलन को व्यापक बनाती है, वहीं दूसरी ओर एक समान भाषिक प्रवाह की कमी भी महसूस होती है। फिर भी, इसे कमी के बजाय हरियाणवी भाषा के विकासशील स्वरूप की स्वाभाविक स्थिति के रूप में देखा जाना चाहिए।
इस संकलन की अनेक रचनाएँ सामाजिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार करती हैं। ‘दोगला’, ‘कागजी समाज सेवा’, ‘लीडर’ और ‘भीड़ अर नेता’ जैसी लघुकथाएँ समाज में व्याप्त पाखंड, दिखावे और खोखले नेतृत्व पर प्रभावी कटाक्ष करती हैं। वहीं ‘बेटी का मान’, ‘शेरनी माँ’ तथा ‘लुगाइयां के हक’ जैसी रचनाएँ स्त्री के संघर्ष, आत्मसम्मान और बदलती सामाजिक भूमिका को अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती हैं। इन कहानियों की विशेषता यह है कि ये बिना अनावश्यक भावुकता के सीधे यथार्थ को सामने रखती हैं।
इस पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इसमें नए और अनुभवी—दोनों प्रकार के रचनाकारों को स्थान दिया गया है। इससे न केवल साहित्यिक संतुलन बना है, बल्कि नई प्रतिभाओं को भी अपनी अभिव्यक्ति का अवसर मिला है। किसी भी भाषा के विकास के लिए नई पीढ़ी के रचनाकारों का उभरना अत्यंत आवश्यक होता है और यह संकलन उस दिशा में एक सार्थक प्रयास है।
डॉ. रामनिवास ‘मानव’ की प्रस्तावना इस संकलन को वैचारिक आधार प्रदान करती है। उन्होंने हरियाणवी लघुकथा की वर्तमान स्थिति, उसकी चुनौतियों और संभावनाओं को जिस स्पष्टता से प्रस्तुत किया है, वह पाठक को इस विधा की गंभीरता का बोध कराती है। वहीं सुरेंद्र बांसल का आलेख ‘रचनात्मक उद्यम नै साधुवाद’ इस प्रयास की सराहना करते हुए इसे एक सकारात्मक साहित्यिक पहल के रूप में स्थापित करता है।
यदि समग्र दृष्टि से मूल्यांकन किया जाए तो ‘म्हारी माट्टी, म्हारे आखर’ केवल एक लघुकथा-संकलन नहीं, बल्कि हरियाणवी साहित्य की विकास-यात्रा का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। यह उस साहित्यिक रिक्तता को भरने का सार्थक प्रयास है, जहाँ हरियाणवी लघुकथा का कोई व्यापक और प्रतिनिधि संकलन अब तक उपलब्ध नहीं था। यह कृति वर्तमान रचनाशीलता का दस्तावेज़ होने के साथ-साथ भविष्य के साहित्यिक विमर्शों के लिए भी आधारभूमि तैयार करती है।
निस्संदेह, यह पुस्तक अपने उद्देश्य की दृष्टि से पूर्णतः सफल है। यह पाठकों का केवल मनोरंजन नहीं करती, बल्कि उन्हें सामाजिक यथार्थ पर विचार करने, मानवीय मूल्यों को समझने और अपनी लोकभाषा की साहित्यिक क्षमता को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करती है। हरियाणवी भाषा और लोकसाहित्य के अध्येताओं, शोधार्थियों, रचनाकारों तथा सामान्य पाठकों—सभी के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण और संग्रहणीय कृति है।
‘म्हारी माट्टी, म्हारे आखर’ अपनी माटी की सोंधी महक, लोकजीवन की आत्मीयता और समकालीन संवेदनाओं के साथ हरियाणवी लघुकथा को नई पहचान, नई ऊर्जा और नई दिशा प्रदान करने वाला उल्लेखनीय साहित्यिक उपक्रम है। आने वाले समय में यह संकलन हरियाणवी लघुकथा के इतिहास में एक मील का पत्थर सिद्ध होगा।

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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