अपील भी तुम,दलील भी तुम,गवाह भी तुम,वकील भी तुम
जिसे भी चाहो हराम कह दो,जिसे भी चाहो हलाल कर दो
ऐसा लगता है कि हरियाणा विजिलेंस ब्यूरो-एसीबी अब उस उच्च अवस्था को प्राप्त कर चुका है कि जहां कई मामलों में उनका रवैया ऐसा है कि पहले बंदा चक्क लो..बाद में देखेंगे कि उसके सर इल्जाम क्या धरना है? जाहिर है कि इस स्थिति में सबसे पहले सोफ्ट टारगेट को ही बलि का बकरा बनाया जाता है। शायद इसी हालत के लिए ये मुहावरा सृजन किया गया होगा कि गरीब की जोरू सबकी भाभी होती है। क्यों गरीब की जोरू को किसी की मां, बहन या बेटी नहीं कहा जाता? इस सारे हालात की उदाहरण सहित व्याख्या करने की कोशिश करते हैं। पिछले दिनों आईडीएफसी घोटाले के प्रकाश में आने के बाद हरियाणा सरकार ने इसकी जांच विजिलेंस वालों को दे दी। विजिलेंस वाले इस तरह के मामलों को हाथों हाथ लपकने के लिए तत्पर ही रहा करते हैं। उन्होंने झट से पोजीशन ले ली। कई सरकारी बाबूओं की भी धरकपड़ कर दी। इस से पहले की विजिलेंस वाले सेवा,सुरक्षा,सहयोग और समर्पण की भावना से अपने नागरिकों का कल्याण करने की दिशा में और आगे बढ पाते सरकार ने मामले की जांच सीबीआई को सौंप कर इनके अरमानों पर पानी फेर दिया। जब तक ये मामला सीबीआई के हाथ में आया कई लोग जेल की सलाखों के भीतर पहुंचाए जा चुके थे। रोचक बात ये है कि विजिलेंस वालों के हत्थे चढे इन्हीं में से एक सरकारी बाबू को तो सीबीआई वालों ने अब कह दिया कि हम ने सारी पड़ताल कर ली है और आपका इस मामले में कोई कसूर नहीं है। इस बंदे को जमानत भी मिल चुकी है। इसकी प्रबल संभावना है कि इस बंदे को अदालत से राहत मिल जाए और ये बेकसूर घोषित कर दिए जाए। ये तो हरियाणा विजिलेंस के काम करने का एक उदाहरण मात्र है। हो सकता है कि आने वाले समय में ऐसा कई लोगों के साथ हो जाए और उनको जांच एजेंसी या कोर्ट की क्लीन चिट मिल जाए। अब बड़ा सवाल ये है कि क्या विजिलेंस-एसीबी वालों को किसी को भी गिरफ्तार करने में प्रोपर एप्लीकेशन आफ मांइड नहीं करना चाहिए।? किसी ने किसी के बारे में कुछ आरोप लगा दिया और उन्होंने उसे झट से पकड़ कर जेल में डाल दिया। क्या पहले ये पड़ताल नहीं करनी चाहिए कि हम जिसको गिरफ्तार कर रहे हैं, उसको क्यों गिरफ्तार कर रहे हैं? खुद से ही ये सवाल पूछ लेना चाहिए कि क्या इस आरोपी की गिरफ्तार करना निहायत ही जरूरी है? क्या बिना गिरफ्तार किए जांच नहीं की जा सकती? अगर जरूरी हो तो गिरफ्तारी हो,लेकिन इसे आखिरी विकल्प के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अब समय आ गया है कि हरियाणा सरकार को इस मामले में दखल देना चाहिए और किसी आरोपी की गिरफ्तारी के बारे में एक ठोस नीति-दिशा निर्देश जारी करने चाहिए चाहिए कि किसी आरोपी की कब गिरफ्तारी की जाएगी? क्यों की जाएगी? जब तक गिरफ्तारी को टाला जा सके इसे टाला जाना चाहिए। किसी को गिरफ्तारी करना विजिलेंस वालों के लिए मंूछों को ताव देने का विषय नहीं होना चाहिए। वो इसलिए कि हमारी जेलों में करीब 70 फीसदी लोग तो अंडर ट्रायल है। हमारी जेलों में क्षमता से कई गुना कैदी रह रहे हैं। विजिलेंस वाले तो किसी को किसी के कहने सुनने से गिरफ्तार करके अपनी पीठ थपथपा रहे होते हैं,लेकिन वो शायद ये रत्ती भर भी नहीं सोचते कि जिस व्यक्ति-आरोपी को वो गिरफ्तार कर रहे हैं, उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा पर क्या असर पड़ता है?उसके परिवार पर इसका क्या असर पड़ता है? बाद में चाहे वो आरोपी कोर्ट से छूट ही क्यों न जाए-चाहे उसको बेकसूर साबित क्यों न कर दिया जाए,लेकिन जेल जाने के दौरान उस ने जो कष्ट उठाए हैं उसकी भरपाई कौन करेगा? इस तरह के हालात में सरकार को कई दफा पीड़ित पक्ष को मुआवाजा देने पर भी विवश होना पड़ता है,लेकिन हम सब जानते हैं कि चाहे कितना ही धन दे दिया जाए,पीड़ित की धूमिल हुई प्रतिष्ठा और जो कष्ठ उसने जेल में रहने के दौरान उठाए हैं, उनकी भरपाई किसी भी सूरत में नहीं हो सकती।
अगर कोई कसूरवार है तो उसे जल्द मिले सजा
हमारा यहां किसी करप्ट आदमी की वकालत करना हरगिज नहीं है। जिस किसी ने अगर कोई गुनाह किया है तो उसे हर कीमत पर सजा मिलनी ही चाहिए, बल्कि जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी मिलनी चाहिए। हमारा तो सवाल ये है कि अगर किसी ने गुनाह नहीं किया तो फिर वो क्यों कष्ट उठाए? वो क्यों बिना बात जेल में रहे? यंू तो कई आईएएस व एचसीएस अधिकारियों के किस्से है,लेकिन यहां चंद उदाहरणों की चर्चा करते हैं। एक एचसीएस अधिकारी अमरेंद्र मिन्हास, जिनके पास सक्रेटरी आरटीए का दायित्व था, विजिलेंस वालों ने करप्शन के आरोपों में उठा लिया। जेल भेज दिया। सिर्फ इसलिए कि किसी ने किसी को और फिर किसी ने उनके बारे में ये आरोप लगा दिए कि उन्होंने अमरेंद्र को रिश्वत दी है। हम सब जानते हैं कि बहुत दफा तो पुलिस वाले इस तरह के बयान जबरदस्ती ही दिलवाते और लिखवाते हैं ताकि वो अपने किसी खास टारगेट को उठा सकें। इन थोथे और फर्जी बयानों के आधार पर अमरेंद्र को कई दिन जेल में रहना पड़ा। बाद में उनकी जमानत हो गई और उनको कोर्ट से भी क्लीन चिट मिल गई। यहां तक की तत्कालीन मुख्य सचिव संजीव कौशल की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने भी इस मामले में विजिलेंस वालों की भूमिका को गलत ठहराते हुए उनकी कार्यशैली की भर्त्सना की थी। और भी कई एचसीएस अफसरों के खिलाफ विजिलेंस वालों ने केस बनाए। कईयों को जेल के अंदर भी दिया। इनमें से ज्यादातर के खिलाफ अभी तक अदालत में आरोप साबित नहीं हो पाए हैं।
ये तो हुई एचसीएस की बात। अब कुछ आईएएस का किस्सा ले लें। धमेंद्र और जयवीर आर्य को हरियाणा विजिलेंस के इस्टाइल के चलते जेल में रहना पड़ा। किसी ने किसी को और किसी ने फिर उन पर रिश्वतखोरी के आरोप जड़ दिए। फिर ये हुआ कि हरियाणा सरकार ने ही अपनी एजेंसी विजिलेंस को इन अफसरों के खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं दी। सरकार ने विजिलेंस वालों की अर्जी ठुकरा दी। जयवीर आर्य तो ससम्मान रिटायर हो गए और धर्मेंद्र अब कृषि विपणन बोर्ड के सीए के महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत हैं। क्या विजिलेंस वाले इनके जेल में रहने के दिनों की किसी तरह से अब भरपाई कर सकते हैं? इस हालात पर कहा जा सकता है कि..
हवाएं माफी मांग भी ले तो क्या
टूटी हुई टहनी तो टूटी ही रहती है
बेकसूर बस ड्राइवर को ही फंसा दिया था पुलिस ने
शत्रुजीत कपूर जब हरियाणा विजिलेंस के मुखिया थे तब उनके जमाने में एक सरकारी प्रैस नोट में ये दावा किया गया था कि विजिलेंस वालों का कनवीकशन रेट 33 फीसदी है। यानी अगर 100 लोगों के खिलाफ विजिलेंस वाले मुकदमे बनाते हैं, उनमें से 67 को तो अदालत से क्लीन चिट मिल जाती है। हरियाणा के उल्ट दिल्ली और राजस्थान में कनवीकशन रेट 50 फीसदी है। ये नहीं होना चाहिए कि पुलिस वालों के हाथ में अगर पावर है तो वो पावर की सनक और हनक में कुछ भी कर डालें। उनकी भी एक जवाबदेही होनी चाहिए। उन से सरकार को समय समय पर जवाब मांगना चाहिए। उनको किसी भी सूरत में निरंकुश नहीं बनने दिया जाना चाहिए। चाहे कोई कितना ही बड़ा पुलिस वाला हो, उसके दिल और दिमाग में हमेशा सरकार और अपनी अंतरात्मा का ये खौफ होना चाहिए कि अगर उस ने किसी बेकसूर को टांग दिया तो फिर सरकार उसे भी टांग देगी। अगर सरकार ने बख्श भी दिया तो कुदरत के कहर से वो कतई नहीं बच पाएगा। कुछ बरस पहले गुरूग्राम में क्या हुआ था? वहां के एक प्रसिद्ध रेयान इंटरनैशनल स्कूल में एक बच्चे के कत्ल के मामले में हरियाणा पुलिस वालों ने एक बस ड्राइवर को ही बलि का बकरा बना दिया। बाद में ये केस सीबीआई को गया तो ये पाया गया कि कत्ल बस ड्राइवर ने नहीं, बल्कि स्कूल के ही एक छात्र ने किया था। अब अगर ये केस सीबीआई को सुर्पुद नहीं किया जाता तो हो सकता है कि उस बेकसूर ड्राइवर को उम्र भर जेल में रहना पड़ता। अभी हाल ही में दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज रिलीज हुई है। ये फिल्म सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर उपलब्ध है। पुलिस वालों को तो ये जरूर ही देखनी चाहिए और इस से सीखना भी चाहिए। इस फिल्म में आतंकवाद के दौर में पंजाब पुलिस की जुल्म और ज्यादतियों को दिखाया गया है। ऐसा कहा जाता है कि फिल्म में जो कुछ दिखाया गया है वो सच के काफी करीब है। मेरा ये मानना है कि अगर इस फिल्म में दिखाया गया दस फीसदी भी सच है तो फिर एक नागरिक के तौर पर हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। इस में ये भी दिखाया गया है जिन पुलिस वालों ने ज्यादतियां की उनका बाद में क्या हश्र हुआ। किसी को आत्महत्या करनी पड़ी, तो किसी की नौकरी चली गई, तो किसी को जेल की सजा हो गई। जैसा कि हमारे धार्मिक ग्रंथों में कहा भी जाता है कि भगवान के घर जान देनी है। अपने कर्मो का फल हमें इसी जन्म में भुगतना पड़ेगा। ऐसा न हो कि जब हमारे कर्म हम से मिलने आएं-हिसाब चुकता करने आएं तो हम डरें कि पता नहीं हमारे साथ ईश्वर क्या हश्र करेगा,बल्कि हमें खुद पर गर्व होना चाहिए कि जब कभी भी हमारा हमारे कर्मो के साथ आमना सामना होगा तो जो होगा वो अच्छा होगा। उम्मीद से बढ कर होगा। यंू तो हर किसी को इस का हरदम-हरपल ख्याल रखना ही चाहिए,लेकिन हरियाणा पुलिस वालों को इस मसले पर खास तौर पर.. खास तौर पर सोचने,समझने और आत्म मंथन करने की जरूरत है कि वो सत्ता के नशे में,पावर की सनक में ऐसा कोई काम ना करें कि उनको लेणे के देणे पड़ जाएं। जब वक्त हिसाब करता है तो फिर किसी दलील,वकील और गवाह की जरूरत नहीं पड़ा करती। अगर वो ये समझते हैं कि वो हरदम पावर में रहेंगे,जो चाहे वो करेंगे तो उन को हबीब जालिब का ये शेर पेश है..
तुम से पहले वो जो एक शख्स यहां तख्त नशीं था
उस को भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था












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