चंडीगढ़ में मकान वायलेशन के हजारों मामले लंबित, लोगों को राहत का इंतजार; 3 एसडीएम के पास पहुंच रहे बिल्डिंग ब्रांच के केस
5,000 से अधिक बिल्डिंग वायलेशन नोटिस लंबित होने का दावा, कई मामले एसडीएम कोर्ट में अटके; कार्रवाई और राहत के बीच पिस रहे मकान मालिक
रमेश गोयत
चंडीगढ़, 8 अगस्त। चंडीगढ़ यूटी में मकानों और व्यावसायिक संपत्तियों से जुड़े बिल्डिंग वायलेशन के मामलों का लंबित होना आम लोगों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बनता जा रहा है। शहर में मकान बनाने, उनमें बदलाव करने, अतिरिक्त निर्माण, नक्शे से अलग निर्माण अथवा भवन नियमों से संबंधित मामलों में नोटिस जारी होने के बाद बड़ी संख्या में मामले आगे की कार्रवाई के लिए संबंधित अधिकारियों और एसडीएम अदालतों तक पहुंचते हैं। लेकिन इन मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने से मकान मालिकों को लगातार अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है।
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, जनवरी 2026 तक चंडीगढ़ में 5,000 से अधिक बिल्डिंग वायलेशन नोटिस लंबित बताए गए थे। इससे पहले दिसंबर 2025 में एस्टेट ऑफिस के पास 5,343 लंबित मामलों का आंकड़ा सामने आया था। इनमें से 19 दिसंबर 2025 तक करीब 1,170 मामलों का निपटारा किए जाने की जानकारी दी गई थी।
वहीं अक्टूबर 2025 में प्रशासन की ओर से 6,000 से अधिक नोटिस लंबित होने की बात सामने आई थी। उस समय यह भी बताया गया था कि बड़ी संख्या में मामले एसडीएम कोर्ट में लंबित हैं।
तीन एसडीएम के पास पहुंच रहे बिल्डिंग ब्रांच के मामले
चंडीगढ़ में बिल्डिंग वायलेशन से संबंधित मामलों की प्रक्रिया कई स्तरों से गुजरती है। बिल्डिंग ब्रांच द्वारा निरीक्षण, नोटिस और संबंधित कार्रवाई के बाद मामले आगे बढ़ते हैं। जिन मामलों में कानूनी या प्रशासनिक सुनवाई की आवश्यकता होती है, वे संबंधित एसडीएम के समक्ष पहुंच सकते हैं।
यही वजह है कि शहर में तीन एसडीएम के स्तर पर लंबित मामलों का बोझ आम नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है।
हालांकि, उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी में इस समय यह स्पष्ट आंकड़ा सामने नहीं आया है कि तीनों एसडीएम के पास अलग-अलग कितने बिल्डिंग वायलेशन केस लंबित हैं। इसलिए 5,000 से अधिक का आंकड़ा पूरे बैकलॉग का संदर्भ देता है, लेकिन इसे तीनों एसडीएम के बीच बराबर बांटकर देखना सही नहीं होगा।
नोटिस मिलते ही परिवार की बढ़ जाती है चिंता
बिल्डिंग वायलेशन का नोटिस केवल कागज का एक टुकड़ा नहीं होता। किसी मकान मालिक के लिए यह उसकी वर्षों की मेहनत और जीवनभर की बचत से जुड़ा मामला होता है।
कई परिवारों ने अपनी कमाई से मकान बनाया होता है। किसी ने मकान का एक हिस्सा किराये पर दिया होता है, किसी ने बच्चों की पढ़ाई या शादी के लिए संपत्ति पर निर्भरता रखी होती है। ऐसे में जब भवन से संबंधित कोई वायलेशन सामने आती है तो परिवार के सामने कई सवाल खड़े हो जाते हैं।
क्या मकान टूटेगा? जुर्माना कितना लगेगा? निर्माण को नियमित कराया जा सकता है या नहीं? मामला कितने समय चलेगा? सुनवाई कब होगी?
इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं मिलने पर लोगों की परेशानी और बढ़ जाती है।
वर्षों तक मामला लंबित रहने से संपत्ति का उपयोग भी प्रभावित
लंबित मामलों का एक बड़ा असर संपत्ति के इस्तेमाल और उसके लेन-देन पर पड़ सकता है। किसी व्यक्ति को मकान बेचना हो, बैंक से लोन लेना हो या संपत्ति से संबंधित कोई अन्य वित्तीय निर्णय लेना हो, तो लंबित वायलेशन का मामला परेशानी पैदा कर सकता है।
कई मामलों में मकान मालिक यह भी चाहते हैं कि यदि निर्माण नियमों के अनुरूप नहीं है तो प्रशासन उन्हें नियमितीकरण, कंपाउंडिंग या अन्य उपलब्ध कानूनी विकल्प के बारे में स्पष्ट रास्ता बताए।
लेकिन यदि मामला लंबे समय तक सुनवाई के इंतजार में रहता है तो न तो व्यक्ति अपनी संपत्ति को लेकर निश्चित निर्णय ले पाता है और न ही उसे यह पता चलता है कि अंतिम कार्रवाई क्या होगी।
एक तरफ कार्रवाई, दूसरी तरफ लंबित मामलों का पहाड़
चंडीगढ़ में समय-समय पर बिल्डिंग वायलेशन और प्रॉपर्टी मिसयूज के खिलाफ कार्रवाई होती रही है। प्रशासन और संबंधित विभाग नियमों का उल्लंघन रोकने के लिए नोटिस जारी करते हैं।
लेकिन जनता का सवाल यह है कि यदि हजारों मामले पहले से लंबित हैं तो पुराने मामलों के निपटारे की गति कितनी है?
लोगों का कहना है कि केवल नए नोटिस जारी करने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। पहले से लंबित मामलों के निपटारे के लिए भी विशेष व्यवस्था जरूरी है।
छोटे बदलाव और गंभीर उल्लंघन—क्या सबके लिए एक जैसा सिस्टम?
मकान मालिकों के बीच एक और बड़ी चिंता यह है कि सभी प्रकार की वायलेशन को एक ही नजरिए से देखा जाए या नहीं।
कहीं किसी मकान में मामूली बदलाव हुआ है तो कहीं बड़े स्तर पर निर्माण किया गया है। ऐसे में लोगों की मांग है कि मामलों को गंभीरता के आधार पर वर्गीकृत किया जाए और मामूली अथवा नियमित किए जा सकने वाले मामलों के लिए सरल प्रक्रिया बनाई जाए।
वहीं गंभीर और जानबूझकर किए गए उल्लंघनों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
इससे अधिकारियों का समय भी बचेगा और गंभीर मामलों पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकेगा।
लोगों को सबसे ज्यादा जरूरत है स्पष्ट समयसीमा की
आम नागरिकों की सबसे बड़ी मांग यह है कि वायलेशन केस की प्रक्रिया के लिए स्पष्ट टाइमलाइन तय हो।
यदि किसी व्यक्ति को नोटिस जारी किया गया है तो उसे यह पता होना चाहिए कि:
सुनवाई कब होगी?
अगली तारीख क्यों दी गई?
फैसला कितने समय में होने की उम्मीद है?
कंपाउंडिंग या रेगुलराइजेशन का विकल्प उपलब्ध है या नहीं?
जुर्माना कितना बन सकता है?
आदेश के खिलाफ अपील का रास्ता क्या है?
जब ये जानकारी स्पष्ट और आसानी से उपलब्ध होगी तो लोगों को बार-बार कार्यालयों और अदालतों के चक्कर लगाने से राहत मिल सकती है।
डिजिटल ट्रैकिंग से कम हो सकती है परेशानी
चंडीगढ़ प्रशासन यदि बिल्डिंग वायलेशन मामलों के लिए ऑनलाइन केस ट्रैकिंग सिस्टम को प्रभावी रूप से लागू करे तो लोगों की बड़ी समस्या हल हो सकती है।
मकान मालिक अपने केस का स्टेटस ऑनलाइन देख सकें—नोटिस कब जारी हुआ, सुनवाई कब हुई, अगली तारीख क्या है, कौन-सा दस्तावेज लंबित है और आदेश क्या हुआ—तो पारदर्शिता बढ़ेगी।
इससे कार्यालयों में अनावश्यक भीड़ भी कम होगी और अधिकारियों पर भी काम का दबाव घट सकता है।
5,000 से ज्यादा मामले—सरकार के लिए भी चुनौती
5,000 से अधिक लंबित नोटिस का आंकड़ा केवल मकान मालिकों की समस्या नहीं है। यह प्रशासनिक व्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चुनौती है।
यदि नए मामले लगातार जुड़ते रहे और पुराने मामलों के निपटारे की गति धीमी रही तो बैकलॉग और बढ़ सकता है। इसलिए जरूरी है कि प्रशासन पुराने मामलों के लिए विशेष ड्राइव या समयबद्ध निपटारा अभियान चलाने पर विचार करे।
तीनों एसडीएम स्तर पर लंबित मामलों का अलग-अलग डेटा सार्वजनिक किया जाना भी पारदर्शिता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
लोगों की मांग—गलती हो तो समाधान मिले, लेकिन वर्षों तक लटकाया न जाए मामला
चंडीगढ़ के मकान मालिकों की समस्या का मूल सवाल यही है कि नियमों का पालन भी हो और आम आदमी को न्याय भी समय पर मिले।
लोग यह नहीं चाहते कि नियमों की अनदेखी की जाए। उनकी मांग यह है कि यदि कोई निर्माण नियमों के विरुद्ध है तो उसकी जांच और कार्रवाई निर्धारित प्रक्रिया के तहत हो, लेकिन मामला वर्षों तक लंबित न रहे।
एक तरफ प्रशासन शहर में नियमों के पालन पर जोर दे और दूसरी तरफ हजारों पुराने मामलों का निपटारा न हो, तो इससे आम नागरिक के मन में व्यवस्था को लेकर असमंजस पैदा होता है।
अब जरूरत है स्पष्ट आंकड़ों और समयबद्ध कार्रवाई की
उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों के आधार पर चंडीगढ़ में 5,000 से अधिक बिल्डिंग वायलेशन नोटिस/मामले लंबित होने का संदर्भ सामने आता है। दिसंबर 2025 में 5,343 लंबित मामलों का आंकड़ा सामने आया था, जबकि अक्टूबर 2025 में 6,000 से अधिक नोटिस लंबित होने की जानकारी दी गई थी।
हालांकि, तीनों एसडीएम के पास वर्तमान में अलग-अलग कितने मामले लंबित हैं, इसका ताजा आधिकारिक ब्रेकअप सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
ऐसे में प्रशासन से अपेक्षा है कि वह एसडीएम वाईज लंबित मामलों का आंकड़ा, मामलों की उम्र, निपटाए गए मामलों की संख्या और आगे की कार्रवाई की समयसीमा सार्वजनिक करे।
क्योंकि मामला केवल फाइलों का नहीं है—इन फाइलों के पीछे हजारों परिवारों के मकान, निवेश, भविष्य और वर्षों से चली आ रही चिंता जुड़ी हुई है।
जनता का सवाल सीधा है—नियमों का पालन जरूरी है, लेकिन क्या न्याय और राहत के लिए इंतजार की भी कोई समयसीमा नहीं होनी चाहिए?













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