निगम पर प्रशासन की कार्रवाई, शो-कॉज नोटिस के बाद हाउस में पहुंची एक साल पुरानी चिट्ठी;
कांग्रेस पार्षद ने निगम पर पत्र छिपाने का लगाया आरोप
बाबूगिरी हिंदी न्यूज़
चंडीगढ़,20 अगस्त। नगर निगम हाउस के उस फैसले को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें शहरवासियों को फ्री पार्किंग और 20 लीटर तक मुफ्त पानी देने का फैसला किया गया था। प्रशासन ने नगर निगम के इस फैसले को नियमों के विपरीत बताते हुए इसे रद्द करने की कार्रवाई की है। प्रशासन की ओर से नगर निगम को भेजे गए पत्र में कानून विभाग की राय का हवाला देते हुए सरकार को निगम के निर्णय को रद्द करने के लिए सक्षम बताया गया है।
अब इस पूरे मामले में एक नया मोड़ तब आया, जब प्रशासन की ओर से नगर निगम को भेजी गई चिट्ठी को लेकर हाउस में सवाल उठे। आरोप है कि यह पत्र करीब एक साल से नगर निगम के स्तर पर रखा रहा, लेकिन इसे नगर निगम हाउस के सामने नहीं लाया गया। कांग्रेस के एक पार्षद इस पत्र की प्रति लेकर हाउस की बैठक में पहुंचे और निगम अधिकारियों से जवाब मांगा।

प्रशासन ने भेजा था स्पष्ट पत्र
सामने आए चंडीगढ़ प्रशासन के लोकल गवर्नमेंट एंड अर्बन डेवलपमेंट ब्रांच के पत्र में नगर निगम की 333वीं और 336वीं बैठक में लिए गए फैसलों का उल्लेख है। पत्र में कहा गया है कि मामले को कानून विभाग के पास राय के लिए भेजा गया था।
कानून विभाग की राय के आधार पर प्रशासन ने कहा कि नगर निगम द्वारा लिया गया फैसला बायलॉज के खिलाफ है। पत्र में आगे कहा गया है कि सरकार नगर निगम के निर्णय को रद्द करने के लिए सक्षम है। साथ ही, तत्काल आदेश आवश्यक समझे जाने पर नगर निगम अधिनियम की धारा 423 के तहत शो-कॉज नोटिस दिए बिना भी कार्रवाई किए जाने का उल्लेख किया गया है।
एक साल तक हाउस के सामने क्यों नहीं आया पत्र?
मामले का सबसे गंभीर पहलू अब यह बन गया है कि प्रशासन का यह पत्र नगर निगम को मिलने के बावजूद इसे हाउस के सदस्यों के सामने क्यों नहीं रखा गया।
कांग्रेस पार्षद द्वारा हाउस में पत्र लेकर पहुंचने के बाद यह सवाल उठाया गया कि जब प्रशासन ने निगम के फैसले को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी तो पार्षदों को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई?
पार्षद का आरोप है कि पत्र को करीब एक साल तक छिपाकर रखा गया और निगम हाउस को इसकी जानकारी नहीं दी गई। इस आरोप के बाद निगम अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
227 करोड़ के फैसले पर अब बढ़ा विवाद
फ्री पार्किंग और फ्री पानी की योजना को लेकर करीब 227 करोड़ रुपये के वित्तीय प्रभाव का मुद्दा भी सामने आया है। निगम हाउस में इस फैसले को लेकर पहले ही राजनीतिक बहस होती रही है। अब प्रशासन द्वारा इसे नियमों के विपरीत बताकर रद्द किए जाने और पुराने पत्र को हाउस के सामने लाए जाने से विवाद और गहरा गया है।
हाउस में उठ सकते हैं कई सवाल
इस मामले में अब निगम हाउस में अधिकारियों से कई सवालों के जवाब मांगे जाने की संभावना है—
प्रशासन का पत्र नगर निगम को किस तारीख को प्राप्त हुआ?
पत्र मिलने के बाद इसे हाउस के सामने क्यों नहीं रखा गया?
पत्र को किस अधिकारी/शाखा के पास रखा गया?
कानून विभाग की राय की जानकारी पार्षदों को क्यों नहीं दी गई?
प्रशासन के आदेश के बावजूद निगम के फैसले पर आगे क्या कार्रवाई की गई?
227 करोड़ रुपये के वित्तीय प्रभाव वाले फैसले की जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
क्या पत्र को हाउस से छिपाने के मामले में किसी अधिकारी की जवाबदेही तय होगी?
अब इस पूरे मामले में नगर निगम प्रशासन की सफाई बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। खास तौर पर यह स्पष्ट करना होगा कि प्रशासन की चिट्ठी निगम को कब मिली और उसे हाउस के एजेंडे अथवा सदन के संज्ञान में क्यों नहीं लाया गया।
गुरप्रीत सिंह गबी ने कहा कि यह केवल फ्री पानी और पार्किंग का मामला नहीं है, बल्कि नगर निगम हाउस से महत्वपूर्ण सरकारी पत्राचार छिपाए जाने का भी गंभीर विषय है। इसकी पूरी जांच होनी चाहिए और जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।















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