एक रात एक बात लिखूंगा
खुद को दाग और तुझे साफ लिखूंगा,
हकीकत में तू कभी मिलेगा नहीं
इसलिए किताब में पूरी मुलाकात लिखंूगा
इन-गलिश में कहा जाता है कि काउंट यूअर ब्लेसिंग्स। यानी की आप अपनी खुशियों की कदर करें। आप की जिंदगी में जो खुशियां हैं, उसके लिए ईश्वर का शुक्रगुजार रहें। हमारे यहां फिजा में इतनी खुशियां यहां वहां बिखरी हुई हैं,लेकिन हम इसकी कदर नहीं करते। इंसानी फितरत है कि जो चीज उसको मिल जाती है, वो उसका मूल्य नहीं समझता और जो मिलती नहीं है, उसके लिए मारा मारा घूमता रहता है। कई लोग ये कहते रहते हैं कि कि हरियाणा सरकार को हमारी फिक्र नहीं है। हमारे एमएलए और मिनिस्टर हमारी सुनवाई नहीं करते। विपक्ष वाले विधानसभा में हमारे मुददे नहीं उठाते। जबकि ऐसा कहना या सोचना पाप है। जितनी विधानसभा के सदस्यों कोे हमारी चिंता है इतनी तो एक मां अपने नवजात बच्चे की भी शायद ना करती हो। सरकार को हम सबकी इत्ती चिंता है..इत्ती चिंता है कि आप पूछिए मत.. मैं आप के बिना बूझे ही बात दंूगा। क्योंकि जब से सदन में मैंने विधायकों.. क्या रूलिंग और क्या ओपीजीशन को हमारी चिंता करते हुए देखा है तभी से.. कभी से मेरा हृदय भाव विभोर हो रखा है। तभी से मेरा लोकतंत्र में आस्था गहरी से और गहरी होती जा रही है। तब से मैं आत्म ग्लानि में डूबा हुआ हंू कि ये हमारे लिए कित्ता करते हैं..कित्ता सोचते हैं..रात दिन लगे रहते हैं और हम हैं कि इनको इनका डयू ही नहीं देते। क्रेडिट नहीं देते। कभी इन से संतुष्ट ही नहीं होते। कभी इनको ये तसल्ली नहीं देते कि प्रधान जी, आप हमारे लिए इत्ता मत किया करें। आप अपने लिए भी कुछ तो सोचा करें। आप ने म्हारे बारे में सोच सोच कर अपना ये क्या हाल-हुलिया बना लिया है। सूख कर कांटा हुए जा रहे हैं। जैसे कि बीेते सोमवार को ही लें.. हरियाणा विधानसभा में चर्चा अपने चरम पर पहुंची हुई थी। इस चर्चा को देखने के लिए स्कूल के बालक बालिकाएं भी पहुंचे हुए थे। स्पीकर दीर्घा में भी लोग उपस्थित थे। मीडिया,अधिकारी और सब दीर्घाओं में जिस किसी ने भी ये नजारा देखा वो अभिभूत हो गया। सबकी श्रद्धा से आंखें नम हुई जा रही थी। किसी किसी की आंखों से से अश्रुधारा अविरल बही जा रही थी। तो चर्चा हो रही थी कि.. पिछले दिनों सदन में एक शब्द का प्रयोग हुआ था-गुंडागर्दी। अब सदन के सामने ये गंभीर सवाल ये था कि क्या ये शब्द सदन की कार्यवाही से निकाला जाए या इसका जलवा बदस्तूर कायम रहे या फिर इस शब्द को कार्यवाही से हटा कर इस से मिलते जुलते भाव वाले किसी अन्य शब्द को यहां सदन की कार्यवाही में शामिल होने का अवसर प्रदान किया जाए। दसों दिशाओं से लोग टकटकी लगाए देख रहे थे और ये सोच रहे थे कि आखिर अब होगा तो होगा क्या? जैसे कि क्रिकेट के मैच में जब अंपायर आउट-नोट आउट की दुविधा में हो तो वो थर्ड अंपायर की मदद ले लेता। थर्ड अंपायर जब तक अपना फैसला नहीं देता लोग स्क्रीन पर टकटकी लगाए देखते रहते हैँ कि आखिर क्या निर्णय अवतरित होने वाला है। जो जो भी उस दिन हरियाणा विधानसभा के सदन में उपस्थित थे वो खुद को यकीनन भाग्यशाली मान रहे होगें कि वो इस बड़े घटनाक्रम का साक्षात साक्षी बनने जा रहे हैं। अगर किसी ने इस इतनी बड़ी इतिहासिक घटना को यंू ही साधारण सा मुददा मान लिया तो मेरी नजर में वो इंसान नहीं है। उसको ज्ञान नहीं है। उसको अहसास नहीं है। उसको विषय की गंभीरता का भान नहीं है। वो भले ही कुछ भी हो सकता है,लेकिन वो शिक्षावान तो कतई नहीं है। जब एक तरफ सारा सदन इस पर चर्चा कर रहा है और कोई कोई शख्स वहां ऐसा भी है जो इस विषय को हल्के में लेने की गुस्ताखी कर रहा है। जब सदन में ये ऐलान किया गया कि आज पहले ये तय होगा कि ये गुंडागर्दी शब्द हटे तो फिर इसकी जगह किस लाया जाए। ऐसे मौके पर अपना ज्ञान देने को आतुर कुछ विधायकों को देख कर मुझे हमेशा से ये लगता है कि अगर चीनी दार्शनिकक कन्फयूशियस आज जिंदा होते तो वो कुछ कुछ इन्हीं जैसे से ही होते। अचानक से सदस्यों के यहां काफी मोटी मोटी किताब प्रकट हो गई। किताब ऐसी थी अगर उसे किसी तखड़ी में कुछ सामान तोलने के लिए बाजू वाले पलड़े में रख दिया जाए तो फिर पांच किलो के बाट की जरूरत नहीं पड़ेगी। किताब में रफरैंस के लिए कई पन्नों पर रंग बिरंगी पर्चियां भी लगी थी। एक विधायक ने इस विषय को इतनी गंभीरता से एक्सप्लेन किया कि खुद इस विषय को भी अहसास नहीं था कि वो इतना गंभीर कैसे हो गया है। सदन में संसदीय परंपराओं,नियमों,कायदे कानून,प्रक्रियाओं का हवाला दिया गया। किस्म किस्म के लोगों ने भांति भांति के तर्क दिए। इधर से सत्ता पक्ष वाले बोले रहे थे और उधर से विपक्ष वाले एक के बाद एक तीर छोड़ रहे थे। इतनी सार्थक बहस सुन कर गुंडागर्दी शब्द एक कोने में पंूछ दबा कर बैठ गया। उसे समझ आ गई कि आज दाल नहीं गलेगी। अब तो उसको इस महान सदन की कार्यवाही से निकाला ही जाएगा। उसे निकलना ही होगा। उसे जाना ही पड़ेगा। आखिर रहता भी कैसे..उसको कभी बचाने वाले,उसको बांचने वाले,उसका जाप करने वाले, उसके पैरोकार तो आज उसके खिलाफ हो चले थे। आज तो वो एकदम चक्रव्यूह में फंस गया था। बिल्कुल भीगी बिल्ली सा बैठा था। सब तरफ से सब तरह की बातें कही गई। आखिर में ये निर्णय सुनाया गया कि गुंडागर्दी की जगह अब उत्पात शब्द लिखा जाएगा। देखिए… किसी की किस्मत कैसे संवरती है। अब उत्पात को ये खबर ही नहीं उसकी जिंदगी संवरने वाली है। उसे विधानसभा की प्रतिष्ठित कार्यवाही में जगह मिलने वाली है। वो कहीं किसी जगह थक हार कर सिर पर हाथ रख कर सोया हुआ है। इस हालात से.. अपने फ्यूचर से बेखबर..बेफिक्र। कुछ कुछ ऐसे ही जैसे कि हम फिल्म में जुम्मा गाने की शुरूआत में अमिताभ बच्चन सफेद कमीज, काली पैंट,लाल अंगोछा गले में लिए,पैर पर पैर रख, मुंह में बीड़ी लिए सुस्ताते से दिख रहे हैं। जैसे ही उत्पाद को ये खबर दी गई कि उसकी किस्मत संवरने वाले। उसे विधानसभा की कार्यवाही में शामिल किया जा रजा है। वो ये सम्मान पाकर अभिभूत हो गया। होना ही था। वो झट से चार्ज हो गया। खट से खड़ा हुआ और गुंडागर्दी को लात मार कर उसकी जगह जा बैठा। उत्पात ने गुंडागर्दी के किस अंग प्रत्यंग पर लात दी होगी ये कल्पना करने के लिए आप स्वतंत्र हैं। सौ बात की एक बात ये है कि आप कभी हमारे जनप्रतिनिधियों को यूं भी अतिरिक्त इज्जत दे लिया करें कि ये हमारे लिए क्या क्या नहीं करते। ताजा ताजा एक उदाहरण विस्तार से दे तो दिया। अब तो आप को इनकी कर्त्तव्यपरायणता, कर्त्तव्यनिष्ठा और कर्त्तव्यबोध पर शक नहीं होना चाहिए। फिर भी अगर आप को संशय है तो इन बेचारों से ये दूर भी नहीं होना। जो लोग इन जनप्रतिनिधियों की मेहनत का मुआवजा देने में कोताही करते हैं तो ये विरोधियों को तो ये यही कह सकते हैं कि..
अगर खिलाफ हैं होने दो,जान थोड़ी है,
ये सब धुआं हैं कोई आसमान थोड़ी है
मैं जानता हंू के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन,
हमारी तरह हथेली पर जान थोड़ी है
कृष्ण बेदी की कोशिश
हरियाणा में कई दिनों से सफाई कर्मचारियों की हड़ताल चल रही है। ऐसे में सवाल ये उत्पन्न होता है कि हमारे वो नेतागण अब कहां हैं जिनके लिए किसी स्थान की पहले सफाई कर फिर वहां कूड़े का प्रबंध किया जाता था। फिर वहां नेतागण अपने चेले चपटों के साथ झाड़ू लेकर प्रकट होते थे और ये दिखाते थे कि सफाई और सफाई अभियान को लेकर वो कितने गंभीर हैं। अब जबकि हरियाणा में कई शहरों में सफाई न होने की समस्या विकराल रूप धारण किए बैठी है तो वहां इन नेताओं को झाड़ू व अन्य सामान के साथ अवतरित होना चाहिए के नहीं? बहराल हरियाणा के सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री कृष्ण बेदी भरसक कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरह से ये हड़ताल खत्म हो जाए। उन्होंने चंडीगढ में भी कई मींिटंग की और कुरूक्षेत्र में भी। सोमवार को रात के 3 बजे तक भी उन्होंने चंडीगढ स्थित अपने सरकारी आवास पर सफाई कर्मचारियों के नेताओं से मीटिंग की। उनकी ठोडी पर हाथ लगा कर ये वास्ता दिया कि जिद ना करें। सरकार ने उनकी 13 में से 12 मांगें मान ली हैं। सिर्फ एक मांग ये कि दो बरस की नौकरी वालों को पक्का किया जाए,कानूनी दिक्कत की वजह से नहीं मानी जा रही। कृष्ण बेदी ने उनको ये भी विकल्प दिया कि सरकार 47 बरस या इस से अधिक आयु वाले सफाई कर्मचारियों को पक्का करने के लिए राजी है। एक दफा शुरूआत तो हो। एक दफा वो किश्ती में सवार तो हों। धीरे धीरे ही सही, उन सब को उनकी मंजिल तक पहुंचा दिया जाएग। अगर देश के किसी प्रदेश में ऐसी योजना-नियम-कानून हो कि जहां दो बरस की सेवा वालों को पक्का कर दिया है तो सफाई कर्मचारी नेतागण वो ला कर उन्हें दे दें। सरकार उस कानून की नकल मार कर इन को झट से उपकृत करने को राजी है। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2006 में उमा देवी बनाम कर्नाटक राज्य केस में ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा था कि दस बरस तक तदर्थ आधार पर काम करने वाले किसी कर्मचारी को स्थायी नौकरी का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता। इसलिए सरकार के हाथ कानून ने बांध रखे हैं। अगर सरकार ऐसा करने लग गई तो कल को तो फिर अन्य विभागों-एचकेआरएन वाले कर्मचारी भी ये मांग करने लग जाएंगे। उनका कौशल तो वैसे ही छलक-छलक और झलक झलक जा रहा है। ऐसे में सरकार करे भी तो क्या करे? बेदी ने इन सफाई कर्मचारियों को समझाया कि विपक्ष के हाथों में खेलने से बात नहीं बनेगी। अभी ना तो विधानसभा के चुनाव करीब हैं और ना लोकसभा के। सरकार पर यंू दबाव बनाने से बात नहीं बनेगी। अभी तो सरकार जो दे रही है वो लेने में समझदारी है। उपयुक्त्त मौके पर फिर से इन सफाई कर्मचारियों की सरकार के सामने पैरवी कर के उनको उनका हक दिलवाने की लड़ाई लड़ेगे,लेकिन अभी तो इस हड़ताल को खत्म करने में ही सबका हित है। देखना है कि सरकार कब और कैसे इस हड़ताल को खत्म करवा पाती है? कृष्ण बेदी की इन कोशिशों पर कहा जा सकता है कि..
लाख दलदल हो,पांव जमाए रखिए
हाथ खाली ही सही,ऊपर उठाए रखिए
कौन कहता है छलनी में पानी नहीं रूक सकता
बर्फ बनने तक हौसला बनाए रखिए
काम पर सैनी सरकार
आप को कुछ लोग हर जगह मिल जाएंगे जो कभी भी किसी सरकार को उसके काम का श्रेय ही नहीं देंगे। सरकार चाहे उनकी झोली में चांद तारे डाल दें,लेकिन उन्होंने नुक्त्ताचीनी ही करनी है। आप को तो मालूम ही है कि हरियाणा विधानसभा सदन की बैठकें रात तक भी चलती रहती है। जब भी सैशन आते हैं ऐसे अवसर अनायास अवतरित हो ही जाते हैं कि सदन की कार्यवाही रात के 9 बजे या उस के बाद तक भी चलती रहती है। यंू तो अभी मानूसन सत्र तीन दिन का ही था,लेकिन इन तीन दिनों में भी सोमवार को सदन की कार्यवाही रात तक चली। उसके बाद मुख्यमंत्री ने अगले दिन सदन की कार्यसूची में आने वाले मुददों पर ब्रीफिंग ली। ये मीटिंग भी लंबी चली। उसके बाद गैस्ट टीचर को पक्का करने के मुददे पर विधानसभा परिसर में ही वो देर रात तक मीटिंग करते रहे। इस मीटिंग में शिक्षा मंत्री महिपाल ढांडा भी उपस्थित थे।
उधर, सरकार के दूसरे होनहार मंत्री कृष्ण बेदी सफाई कर्मचारियों से रात के 3 बजे तक मान मुनहार गुहार करते रहे। आखिर सरकार के लोग इतनी रात भर काम क्यों करते हैं? क्या उनको हरियाणा के हित की खातिर समय पर नहीं सो जाना चाहिए? क्या इनके पास काम ज्यादा है या फिर ये ज्यादा काम किए बिना इनको चैन नहीं आता? ये तो खैर सोचना भी पाप होगा कि इनको काम करना नहीं आता। ऐस लगता है कि इनको ज्यादा काम करने की आदत है। देर रात तक इनको कभी से काम करने की आदत है। सच्चाई जो भी हो..लेकिन इतना ज्यादा काम करने से इनकी सेहत पर आंच आने की आशंका हो सकती है। ऐसे में काम को काम की तरह ही लेना चाहिए। अपने यहां तो एक राजनीतिक पार्टी के बारे में कहा भी जाता है कि इसके तीन ही काम..भोजन, चिंतन और विश्राम। ऐसे में सरकार को इतना ज्यादा काम कर के गलत परंपराएं स्थापित नहीं करनी चाहिए। बेहतर होगा कि सरकार एक दिन का सैशन बढा लेती। उस से भी अगर बात ना बनती तो एक दिन और आगे खिसका लेती। क्या फर्क पड़ना था? विधायकों का टीए डीए भी बढ जाता। काम का काम हो जाता। नाम का नाम हो जाता। विधानसभा के एक पूर्व स्पीकर फरमा रहे थे कि सरकार चाहे किसी भी दल की हो, उसे यही सिखाया और समझाया जाता है कि सैशन जितना छोटा होगा, उतना ही ठीक है। इस समस्या का हल एक ही है कि विधानसभा के नियमों में ये प्रावधान कर दिया जाए कि एम साल में कम से कम इतनी बैठकें तो होंगी ही। बैठकों की संख्या जब नियमों से तय हो जाएगी तो फिर इसे करना सबकी मजबूरी बन जाएगी। पड़ौसी प्रदेश में पंजाब में बहुत कम ही होता होगा कि जब सदन शाम 5 बजे के बाद भी जारी रहे और इधर म्हारे हरियाणा में ऐसा अक्सर होता है कि सदन शाम के 5 बजे के बाद भी चलता रहता है। समय पर सदन खत्म होगा तो पत्रकारों को भी सदन की कार्यवाही जनजन तक पहुंचाने में आसानी होगी। आखिर ये अपणे वाले नेतागण इतना काम क्यों..क्यों..क्यों..क्यों करते हैं? ये इतना लोड क्यों लेते हैं? एक चाटुकार पत्रकार के तौर पर मुझे सरकार के लोगों से पोलायटली ये पूछना ही होगा कि आप ऐसा क्या खाते हैं कि थकते नहीं हैं? हमेशा इतना एनर्जेटिक कैसे रहते हैं? ये राज नेशन वांट्स टू नो।















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