October 14, 2026 8:44 pm

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रूपनगर अदालत से दुष्कर्म और पॉक्सो मामले में आरोपी बरी, अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में नाकाम

पीड़िता के अलग-अलग बयानों में मिली असंगतियां, एफएसएल रिपोर्ट में भी डीएनए योगदान की पुष्टि नहीं; अदालत ने दिया संदेह का लाभ

बाबूगिरी न्यूज़
रूपनगर, 14 अक्टूबर। रूपनगर की सेशंस जज श्रीमती मनजोत कौर की अदालत ने दुष्कर्म और बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने संबंधी पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज मामले में आरोपी प्रशांत कुमार को बरी कर दिया है। अदालत ने मामले में पेश किए गए साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा। इसके बाद अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का आदेश सुनाया। अदालत का यह फैसला 13 अक्टूबर 2026 को आया।

11 नवंबर 2023 को दर्ज हुआ था मामला
प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह मामला 11 नवंबर 2023 को जिला रूपनगर के श्री आनंदपुर साहिब थाने में दर्ज किया गया था। आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 366, धारा 376(2)(n) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत कार्रवाई की गई थी। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत साक्ष्यों, पीड़िता के अलग-अलग बयानों, फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (एफएसएल) की रिपोर्ट और अन्य परिस्थितियों पर विचार किया।

पीड़िता के बयानों में असंगतियों पर अदालत ने किया विचार
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष पीड़िता के शुरुआती बयान, मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कराए गए बयान और अदालत में दिए गए बयान का परीक्षण किया गया। फैसले में इन बयानों के बीच महत्वपूर्ण असंगतियों का उल्लेख किया गया।
अदालत ने मामले से जुड़े अन्य साक्ष्यों के साथ इन असंगतियों का भी मूल्यांकन किया। आपराधिक मामलों में अभियोजन पक्ष के लिए आरोपों को संदेह से परे साबित करना आवश्यक होता है। प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर अदालत इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंची कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप निर्धारित कानूनी मानक के अनुरूप साबित हो गए हैं।

कैफे संचालक ने आरोपी के आने या कमरा किराये पर लेने की पुष्टि नहीं की
मामले में फूड हब कैफे से जुड़ा पहलू भी सुनवाई के दौरान सामने आया। फैसले के अनुसार, कैफे संचालक ने आरोपी के वहां आने अथवा कमरा किराये पर लेने की पुष्टि नहीं की। अदालत ने इस तथ्य को मामले में प्रस्तुत अन्य साक्ष्यों के साथ परखा।
इसके अतिरिक्त, फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी की रिपोर्ट में पीड़िता के उपलब्ध नमूनों में आरोपी के डीएनए योगदान की पुष्टि नहीं हुई। अदालत ने इस रिपोर्ट सहित मामले के अन्य साक्ष्यों का समग्र रूप से मूल्यांकन किया।

एफआईआर दर्ज कराने में देरी भी रही विचार का विषय
अदालत ने मामले में प्राथमिकी दर्ज कराने में हुई देरी पर भी विचार किया। फैसले के अनुसार, इस देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं किया गया था। अदालत ने पीड़िता के बयानों में असंगतियों, कैफे संचालक की गवाही, एफएसएल रिपोर्ट और प्राथमिकी दर्ज कराने में देरी सहित विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अभियोजन पक्ष के मामले का मूल्यांकन किया।

बचाव पक्ष की दलीलों के बाद बरी करने का आदेश
आरोपी प्रशांत कुमार की ओर से एडवोकेट कुनाल चौधरी और एडवोकेट मेनका गुप्ता ने अदालत में बचाव पक्ष की पैरवी की। सुनवाई के दौरान उपलब्ध साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा।
इसी आधार पर अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का आदेश पारित किया।
अदालत के फैसले का मुख्य आधार यह रहा कि अभियोजन पक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया।

 

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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