चंडीगढ़ | 28 जनवरी 2026: हांसी में एक होटल की सीवर लाइन की सफाई के दौरान दो निर्दोष व्यक्तियों की दर्दनाक मौत के मामले में हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने पुलिस जांच पर कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने जांच को गंभीर रूप से पक्षपातपूर्ण, संदिग्ध और वास्तविक दोषियों को कानून के कठोर प्रावधानों से बचाने की कोशिश करार दिया है।
आयोग ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जांच की दिशा और रिकॉर्ड पर प्रस्तुत दस्तावेज यह दर्शाते हैं कि जिम्मेदारों को बचाने के लिए जानबूझकर और सुनियोजित प्रयास किए गए। अध्यक्ष जस्टिस ललित बत्रा तथा सदस्य कुलदीप जैन और दीप भाटिया की पूर्ण पीठ ने पुलिस द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि होटल के तथाकथित सहायक प्रबंधक का बिना तिथि का नियुक्ति पत्र संदेह पैदा करता है। आयोग के अनुसार यह दस्तावेज घटना के बाद जल्दबाजी में तैयार किया गया प्रतीत होता है, ताकि होटल मालिक की जवाबदेही से बचा जा सके। इसे आयोग ने कानून और नैतिकता—दोनों के साथ खिलवाड़ बताया।
आयोग ने 13 नवंबर 2025 को उप जिला अटॉर्नी द्वारा दी गई उस कानूनी राय पर भी गंभीर आपत्ति जताई, जिसके तहत अपराध को धारा 105 बीएनएस से धारा 106 बीएनएस में परिवर्तित कर उसका स्वरूप हल्का किया गया। आयोग ने कहा कि बिना ठोस कारण दी गई यह राय स्वयं गंभीर सवाल खड़े करती है और इससे पुलिस जांच एजेंसी की दुर्भावनापूर्ण मंशा झलकती है।
हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने साफ कहा कि यह मामला केवल जांच में लापरवाही का नहीं, बल्कि संस्थागत स्तर पर जवाबदेही से बचने की कोशिश का प्रतीक है। आयोग ने दो टूक कहा कि ऐसे गंभीर मामलों में दिखावटी और आधी-अधूरी जांच स्वीकार्य नहीं है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए आयोग ने पुलिस अधीक्षक, हांसी को निर्देश दिए हैं कि पूरे प्रकरण की पुनः समीक्षा कर अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पूर्व विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। साथ ही अगली सुनवाई पर एसपी को व्यक्तिगत रूप से आयोग के समक्ष उपस्थित होने के आदेश दिए गए हैं। प्रारंभिक जांच करने वाले उप पुलिस अधीक्षक और विवादित कानूनी राय देने वाले उप जिला अटॉर्नी को भी आयोग ने तलब किया है।
इसके अतिरिक्त नगर परिषद/ग्राम पंचायत और होटल प्रबंधन द्वारा अब तक रिपोर्ट न देने को आयोग ने घोर लापरवाही करार देते हुए सख्त चेतावनी दी है कि आदेशों की अवहेलना को गंभीरता से लिया जाएगा।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि मृतकों के परिजनों को ₹30-30 लाख रुपये का मुआवजा देना न्याय की पूर्ति नहीं है। वास्तविक न्याय तभी होगा जब दोषियों को कानून के कटघरे में लाया जाएगा। आयोग ने दोहराया कि मानव जीवन की कीमत कागजी औपचारिकताओं से नहीं चुकाई जा सकती।
इस मामले की अगली सुनवाई 18 फरवरी 2026 को निर्धारित की गई है।











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