August 28, 2026 9:47 am

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दिखावे का रोग: एक आधुनिक महामारी

डॉ. विजय गर्ग (सेवानिवृत्त प्रिंसिपल, मलोट, पंजाब)
आज का समाज एक ऐसी बीमारी से ग्रस्त होता जा रहा है, जो न शरीर में दिखाई देती है और न ही किसी मेडिकल रिपोर्ट में पकड़ी जाती है—पर इसका असर बेहद घातक है। यह है दिखावे का रोग। यह धीरे-धीरे इंसान के मन, रिश्तों और जीवन मूल्यों को खोखला कर देता है। आधुनिक जीवनशैली, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और सोशल मीडिया ने इस रोग को महामारी का रूप दे दिया है।
दिखावे का अर्थ है—वह बनने की कोशिश करना, जो हम वास्तव में नहीं हैं। महंगे कपड़े, बड़ी गाड़ियाँ, सोशल मीडिया पर “परफेक्ट लाइफ” की तस्वीरें, उधार लेकर पूरे किए गए शौक और हैसियत से बढ़कर किया गया खर्च—ये सभी इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। व्यक्ति अपनी वास्तविक पहचान से असंतुष्ट होकर दूसरों को प्रभावित करने में अपनी ऊर्जा और संसाधन झोंक देता है।
सोशल मीडिया और ‘परफेक्ट लाइफ’ का भ्रम
आज हमारी जिंदगी का बड़ा हिस्सा मोबाइल स्क्रीन पर सिमट गया है। भोजन का स्वाद लेने से पहले उसकी तस्वीर ली जाती है ताकि दुनिया को दिखाया जा सके कि हम कितना “लक्ज़री” जीवन जी रहे हैं। लाइक, शेयर और कमेंट्स की भूख ने हमें आत्म-प्रदर्शन का गुलाम बना दिया है।
सोशल मीडिया पर दिखने वाली ज़िंदगी असल नहीं होती, वह केवल संपादित क्षणों का संग्रह होती है। फिर भी लोग इन्हीं तस्वीरों से अपनी साधारण और वास्तविक जिंदगी की तुलना करने लगते हैं और खुद को “कम” समझने लगते हैं—कम सफल, कम खुश, कम स्टाइलिश।
प्रदर्शन की अर्थव्यवस्था
दिखावे ने उपभोग की एक नई संस्कृति को जन्म दिया है, जहाँ लोग
उन चीज़ों को खरीद रहे हैं जिनकी उन्हें ज़रूरत नहीं,
उन पैसों से जो उनके पास नहीं (लोन या क्रेडिट कार्ड),
सिर्फ उन लोगों को प्रभावित करने के लिए जिन्हें वे पसंद भी नहीं करते।
हर साल नया मोबाइल लेना जरूरत नहीं, बल्कि स्टेटस सिंबल बन चुका है। शादियाँ अब संस्कार नहीं, बल्कि प्रदर्शन बन गई हैं, जहाँ लोग वर्षों की कमाई एक दिन के दिखावे में उड़ा देते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रहार
यह दिखावटी जीवनशैली केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहती। यह मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी गहरा आघात करती है।
तुलना का ज़हर व्यक्ति को भीतर से कमजोर कर देता है।
अकेलापन बढ़ता है, क्योंकि चमकने की दौड़ में हम अपनों से सच्चा जुड़ाव खो बैठते हैं।
तनाव और चिंता लगातार बनी रहती है—हमेशा “अप-टू-डेट” और “परफेक्ट” दिखने का दबाव चैन से जीने नहीं देता।
लोग मुस्कुराती तस्वीरों के पीछे कर्ज़, चिंता और टूटे रिश्ते छिपाए रहते हैं।
संतोष का अंत, आनंद का अंत
दिखावे का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह संतोष को खत्म कर देता है। और जहाँ संतोष नहीं, वहाँ आनंद भी नहीं टिकता। इंसान “होने” से ज़्यादा “दिखने” में उलझ जाता है। धीरे-धीरे सादगी, ईमानदारी और मूल्य पीछे छूट जाते हैं, और उनकी जगह ब्रांड, लाइक्स और वाहवाही ले लेती है।
इलाज: खुद से ईमानदारी
इस रोग का इलाज कठिन नहीं, बस खुद से ईमानदारी चाहिए।
अपनी सीमाओं को स्वीकार करना,
ज़रूरत और चाहत में फर्क समझना,
और यह जानना कि सच्ची खुशी बाहरी चमक में नहीं, बल्कि भीतर की शांति में है।
सादगी कोई कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मविश्वास की पहचान है।
समाज तभी स्वस्थ होगा, जब हम दिखावे से बाहर निकलकर वास्तविकता को अपनाएँगे।
जो हैं, वही रहना—आज के समय में यही सबसे बड़ा साहस है।

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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