डॉ. विजय गर्ग
भोर का आकाश सदियों से पक्षियों के गीतों से गूंजता आया है। चहचहाहट, स्वर और लय केवल मधुर ध्वनियाँ नहीं, बल्कि प्रकृति की जीवनदायिनी भाषा हैं, जो पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का संकेत देती हैं। लेकिन आज यह प्राकृतिक संगीत यातायात, निर्माण कार्य, लाउडस्पीकरों, कारखानों और शहरी जीवन की निरंतर गड़गड़ाहट में दबता जा रहा है। ध्वनि प्रदूषण—जो दिखता नहीं और अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है—चुपचाप पक्षियों को गंभीर संकट में डाल रहा है।
खतरे में पड़ी पक्षियों की भाषा
पक्षी ध्वनि पर अत्यधिक निर्भर होते हैं। उनके गीत केवल संगीत नहीं, बल्कि जीवन रक्षा के साधन हैं। इन्हीं के माध्यम से वे साथी आकर्षित करते हैं, शिकारियों के प्रति चेतावनी देते हैं, अपने क्षेत्र की रक्षा करते हैं और सामाजिक संबंध बनाए रखते हैं। जब पृष्ठभूमि का शोर बढ़ जाता है, तो पक्षियों को अपनी आवाज़ का स्वर, तीव्रता या समय बदलना पड़ता है। कुछ प्रजातियाँ ज़ोर से गाने लगती हैं, तो कुछ ऊँची आवृत्तियों का सहारा लेती हैं। इन बदलावों में अधिक ऊर्जा खर्च होती है, संचार कम प्रभावी हो जाता है और तनाव बढ़ता है।
प्रजनन और भोजन में बाधा
ध्वनि प्रदूषण का सीधा असर पक्षियों की प्रजनन सफलता पर पड़ता है। शोध बताते हैं कि व्यस्त सड़कों या हवाई अड्डों के पास रहने वाले पक्षी कम अंडे देते हैं और कई चूजे जीवित नहीं रह पाते। माता-पिता शोर के कारण अपने बच्चों की भोजन-मांग की आवाज़ नहीं सुन पाते, जिससे उन्हें पर्याप्त आहार नहीं मिल पाता। इसके अलावा, शोरगुल वाले इलाकों में पक्षियों के लिए शिकारियों की आहट सुनना भी कठिन हो जाता है, जिससे वे भोजन खोजते या घोंसला बनाते समय अधिक असुरक्षित रहते हैं।
तनाव जो जीवन को छोटा कर देता है
लगातार शोर पक्षियों के लिए एक निरंतर अलार्म की तरह काम करता है। इससे उनके शरीर में तनाव हार्मोन बढ़ जाते हैं, प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर पड़ती है और जीवन प्रत्याशा घट जाती है। भले ही किसी क्षेत्र में भोजन और आश्रय उपलब्ध हों, लेकिन निरंतर शोर उसे रहने लायक नहीं छोड़ता। नतीजतन, कई प्रजातियाँ ऐसे आवासों को छोड़ देती हैं, जिससे स्थानीय जैव विविधता में गिरावट आती है।
शहर: ध्वनि का जाल
शहरी वातावरण पक्षियों के लिए विशेष रूप से कठोर है। कुछ अनुकूलनशील प्रजातियाँ—जैसे कबूतर या कौवे—किसी तरह जीवित रह जाती हैं, लेकिन कई संवेदनशील प्रजातियाँ धीरे-धीरे गायब हो जाती हैं। हरित क्षेत्र अपनी विविधता खो देते हैं और शहर पक्षियों की आवाज़ों से खाली होते जाते हैं, जबकि मानव-निर्मित शोर लगातार बढ़ता रहता है। यह क्षति केवल पारिस्थितिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी है, क्योंकि इससे मनुष्य का प्रकृति से दैनिक संपर्क कम हो जाता है, जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।
यह हमारे लिए क्यों मायने रखता है
पक्षी पर्यावरणीय स्वास्थ्य के संवेदनशील सूचक होते हैं। जब वे संकट में होते हैं, तो यह गहरे पारिस्थितिक असंतुलन का संकेत देता है। पक्षी कीट नियंत्रण, परागण और बीज प्रसार में अहम भूमिका निभाते हैं। उनकी संख्या में गिरावट कृषि, वनों और संपूर्ण खाद्य श्रृंखला को प्रभावित करती है—और अंततः मानव जीवन को भी।
शोर कम करना: समय की आवश्यकता
ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करना असंभव नहीं है। सुविचारित शहरी नियोजन, लाउडस्पीकरों और अनावश्यक हॉर्न पर सख्त नियम, शांत सड़क सतहों का उपयोग तथा आर्द्रभूमि और जंगलों के आसपास मौन क्षेत्रों की सुरक्षा जैसे उपाय कारगर हो सकते हैं। व्यक्तिगत स्तर पर भी छोटे कदम—संगीत की आवाज़ कम रखना, शांत घंटों का सम्मान करना और हरित बफर क्षेत्रों का संरक्षण—पक्षियों को बचाने में मदद कर सकते हैं।
सुनने का आह्वान
पक्षियों की खामोशी एक चेतावनी है, जिसे हम अब भी सुन सकते हैं। शांत वातावरण की बहाली का अर्थ मानव प्रगति को रोकना नहीं, बल्कि उसे अन्य जीवों की आवश्यकताओं के साथ संतुलित करना है। जब हम शोर कम करते हैं, तो हम केवल पक्षियों के गीत नहीं बचाते—हम अपने लिए भी एक स्वस्थ, संतुलित और सामंजस्यपूर्ण दुनिया का निर्माण करते हैं।
— डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य | शैक्षिक स्तंभकार | प्रख्यात शिक्षाविद
स्ट्रीट कौर चंद, एमएचआर, मलोट, पंजाब – 152107











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