April 5, 2026 2:23 pm

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ड्राइवर का बेटा, बारहवीं तक पढ़ा… ऑटो चलाया, ताने सहे — और फिर खड़ी कर दी 400 करोड़ की कैब कंपनी

हालात अगर सपनों के आड़े आ जाएँ, तो भी मंज़िल छोड़ी नहीं जाती।

दिल्ली। बिहार के एक छोटे-से कस्बे से निकली यह कहानी उसी जिद, संघर्ष और दूरदर्शिता की है, जिसने एक ड्राइवर के बेटे को देश का चर्चित उद्यमी बना दिया।

गरीबी में जन्म, संघर्ष में परवरिश
बिहार के सहरसा जिले के बनगांव गांव में जन्मे दिलखुश कुमार ने बचपन से ही अभाव देखे। पिता बस चालक थे, आमदनी सीमित थी और परिवार की ज़िम्मेदारियाँ भारी। हालात ऐसे बने कि दिलखुश को बारहवीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
घर चलाने के लिए उन्होंने सब्ज़ियां बेचीं, छोटे-मोटे काम किए और ऑटो-रिक्शा तक चलाया। एक बार सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी के इंटरव्यू में गए, लेकिन “योग्य नहीं” कहकर लौटा दिए गए। समाज के ताने भी मिले—
ड्राइवर का बेटा है, तो ड्राइवर ही बनेगा।”
लेकिन यही ताने उनके भीतर कुछ अलग करने की आग बन गए।

ऑटो चलाते-चलाते जन्मा आइडिया
ऑटो चलाते हुए दिलखुश ने आम लोगों की रोज़मर्रा की परेशानियाँ नज़दीक से देखीं—
शहरों के बीच भरोसेमंद टैक्सी नहीं
मनमाना किराया
सुरक्षा की कमी
समय पर गाड़ी न मिलना
यहीं से एक सवाल जन्मा—
अगर छोटे शहरों के लिए एक भरोसेमंद, सस्ती और सुरक्षित टैक्सी सेवा हो, तो?

सेकेंड हैंड कार से स्टार्टअप तक
बीमारी के चलते ऑटो छोड़कर घर लौटे, फिर पिता से कार चलाना सीखा। पटना में टैक्सी ड्राइवर की नौकरी की और यात्रियों की ज़रूरतों को गहराई से समझा।
2016 में साथियों के साथ आर्या-गो नाम से शुरुआत की, जिसमें 350 से ज्यादा गाड़ियाँ जुड़ीं।
लेकिन असली पहचान मिली जुलाई 2022 में, जब दिलखुश ने सिर्फ एक सेकेंड हैंड नैनो कार से रोडबेज की नींव रखी।

दिल्ली में संघर्ष, बिहार में पहचान
बेहतर मौके की तलाश में वे दिल्ली पहुँचे, लेकिन वहां भी भरोसा नहीं मिला। ट्रैफिक नियमों का बहाना बनाकर काम से मना कर दिया गया। गुजारे के लिए फिर ऑटो चलाना पड़ा।
हार नहीं मानी। बिहार लौटकर उन्होंने अपने सपने को ज़मीन पर उतारा।

मोबाइल ऐप और ‘यात्रा गारंटी’
रोडबेज ने अपना मोबाइल ऐप लॉन्च किया, जिसने बिहार के कई शहरों को आपस में जोड़ दिया।
कंपनी की सबसे बड़ी खासियत बनी— ‘यात्रा गारंटी’
अगर ड्राइवर की देरी से यात्री की फ्लाइट छूट जाए, तो उसकी जिम्मेदारी कंपनी उठाती है।
आज रोडबेज सुरक्षित, किफायती और भरोसेमंद टैक्सी सेवा का नाम बन चुका है।

400 करोड़ का सफर
एक छोटी सोच, निजी संघर्ष और ज़मीनी अनुभव से शुरू हुई यह यात्रा आज करीब 400 करोड़ रुपये के कारोबार तक पहुँच चुकी है और हज़ारों लोगों को रोज़गार दे रही है।

शार्क टैंक इंडिया से मिली पहचान
दिलखुश कुमार तब देशभर में चर्चा में आए जब वे शार्क टैंक इंडिया में नजर आए।
यहां रितेश अग्रवाल और नमिता थापर जैसे निवेशकों ने उनके विज़न पर भरोसा जताया और निवेश किया।
यह सिर्फ निवेश नहीं था, बल्कि उस सोच की जीत थी, जो जमीन से निकली थी।

आगे का सपना
दिलखुश कुमार का अगला लक्ष्य रोडबेज को बिहार से आगे देश के दूसरे राज्यों तक ले जाना है—
ताकि छोटे शहरों के लोग भी वही सुविधा पाएं, जो बड़े शहरों में मिलती है।

युवाओं के लिए सीख
हालात नहीं, हौसले मंज़िल तय करते हैं
संघर्ष जितना बड़ा, सफलता उतनी चमकदार
डिग्री नहीं, दृढ़ निश्चय असली पहचान है
जो समस्या को करीब से समझता है, वही सच्चा समाधान देता है
यह कहानी नहीं, एक संदेश है—
अगर इरादे मजबूत हों, तो ऑटो से भी अरबों का सफर तय किया जा सकता है।

BabuGiri Hindi
Author: BabuGiri Hindi

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