चंडीगढ़: आचार्य देवव्रत ने सदन में कहा कि प्राकृतिक खेती केवल कृषि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा हुआ है। उन्होंने सभी विधायकों का आभार व्यक्त किया कि इस विषय को दलगत राजनीति से ऊपर उठाकर सदन में रखा गया।
राज्यपाल ने चेतावनी दी कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता घट रही है, जल स्रोत दूषित हो रहे हैं और कैंसर, हृदय रोग तथा किडनी फेलियर जैसी बीमारियों में वृद्धि हो रही है। उन्होंने प्राकृतिक खेती को इसका समाधान बताया, जिसमें देशी गाय आधारित, कम लागत वाली और पर्यावरण के अनुकूल तकनीक का उपयोग होता है।
उन्होंने बताया कि गुजरात में 8 लाख से अधिक किसान प्राकृतिक खेती अपना चुके हैं और इससे उनकी आय बढ़ी है। इस पद्धति में गोबर, गोमूत्र, गुड़ और बेसन जैसे साधारण तत्वों से सूक्ष्म जीवाणुओं की वृद्धि कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जाती है।
विधायकों की सहभागिता
सदन में विधायकों ने उत्पादन, लागत, प्रशिक्षण और बाजार से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे। आचार्य देवव्रत ने अपने अनुभव और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर विस्तृत उत्तर दिए। विधायकों ने अपने क्षेत्रों में प्राकृतिक खेती को अपनाने के अनुभव साझा किए।
राज्यपाल ने सभी जनप्रतिनिधियों से आह्वान किया कि वे अपने क्षेत्रों में किसानों को प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम के माध्यम से प्राकृतिक खेती के प्रति प्रेरित करें।
मुख्य निष्कर्ष:
प्राकृतिक खेती मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण और किसान की आय के लिए आवश्यक है।
रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग गंभीर खतरा पैदा कर रहा है।
हरियाणा सरकार और आचार्य देवव्रत के प्रयास से प्रदेश में प्राकृतिक खेती का मॉडल तेजी से फैल रहा है।
बजट 2026-27 में इसे और प्रोत्साहित करने के लिए कई आर्थिक और प्रशिक्षण पहल की गई हैं।
हरियाणा के किसान अब कम लागत, पर्यावरण-हितैषी और लाभकारी प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं, जिससे आने वाले वर्षों में राज्य में स्वास्थ्य और कृषि दोनों में सुधार की उम्मीद है।











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