नन्हा साइकिल सवार
मेरी छोटी साइकिल आई,
टुन-टुन करती घंटी लाई,
साथ खड़ा मेरा एक यार,
कहता—चलो बढ़ाएँ रफ़्तार।
टुन-टुन करती घंटी बोले,
“चलो घूमें खुला मैदान”,
धीरे-धीरे पैडल घूमें,
हवा करे उसका सम्मान।
लाल कुर्ते में नन्हा राजा,
आँखों में सपनों की धार,
कभी रुके तो टोकरी देखे,
कभी चल दे फिर तैयार।
साथ खड़ा उसका साथी प्यारा,
मुस्काकर देता पुकार—
“चल जल्दी से दौड़ लगाएँ,
देखें कौन बने सरदार!”
हँसी-खुशी में खेलते बच्चे,
धूप भी लगती जैसे प्यार,
ऐसे ही बीते बचपन सारा,
साइकिल, दोस्ती और संसार।
— डॉ. प्रियंका सौरभ













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