ट्रिब्यूनल के आदेश के बावजूद यूटी इंजीनियरिंग विभाग ने नहीं किया भुगतान, अधिवक्ता एडवोकेट मेनका गुप्ता के जरिए अवमानना याचिका दायर
बाबूगिरी ब्यूरो
चंडीगढ़। यूटी इंजीनियरिंग विभाग में कार्यरत एक लेबर कर्मी को 20 वर्षों की सेवा के बाद भी ग्रुप-डी के न्यूनतम वेतन का लाभ न मिलना अब बड़ा कानूनी विवाद बन गया है। ट्रिब्यूनल के स्पष्ट आदेशों की अनदेखी किए जाने पर यह मामला अब अवमानना (Contempt of Court) तक पहुंच चुका है, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, संबंधित कर्मी राम पिछले लगभग दो दशकों से विभाग में कार्यरत है। लंबे समय तक निरंतर सेवाएं देने के बावजूद उसे ग्रुप-डी कर्मचारियों के बराबर वेतन और सुविधाएं नहीं मिल रही थीं। अपने अधिकारों की मांग को लेकर उसने न्यायालय में याचिका दायर की थी।
ट्रिब्यूनल ने दिए थे स्पष्ट निर्देश
मामले की सुनवाई के बाद ट्रिब्यूनल ने 3 फरवरी 2025 को आदेश पारित करते हुए विभाग को निर्देश दिया था कि याचिकाकर्ता को 20 वर्ष की सेवा पूर्ण होने पर ग्रुप-डी का न्यूनतम वेतन दिया जाए। साथ ही, बकाया राशि (एरियर) 8 सप्ताह के भीतर अदा करने के निर्देश भी दिए गए थे।
पुनर्विचार याचिका भी हुई खारिज
ट्रिब्यूनल के आदेश के बाद विभाग ने इसके खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की, लेकिन न्यायालय ने उसे खारिज कर दिया। इसके साथ ही विभाग द्वारा देरी के लिए मांगी गई माफी को भी स्वीकार नहीं किया गया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि अदालत आदेशों के अनुपालन को लेकर सख्त रुख अपना रही है।
अब अवमानना याचिका लंबित
आदेश के बावजूद जब विभाग ने भुगतान नहीं किया, तो याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता एडवोकेट मेनका गुप्ता के माध्यम से अवमानना याचिका दायर की गई। यह याचिका वर्तमान में न्यायालय में लंबित है और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही जारी है।
प्रशासनिक जवाबदेही पर उठे सवाल
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायालय के आदेशों का पालन न करना गंभीर मामला होता है और इसमें संबंधित अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जा सकता है। यह मामला दर्शाता है कि लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारियों को भी अपने अधिकारों के लिए अदालत का सहारा लेना पड़ रहा है।
अब सभी की नजरें अदालत की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि आदेशों की अवहेलना करने वाले अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होती है और क्या कर्मचारी को उसका हक मिल पाता है।











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