एक इंस्पेक्टर, एक सब-इंस्पेक्टर सहित दो दर्जन कमांडो की तैनाती से उठे सवाल
रिटायरमेंट के बाद भी “वीआईपी सुरक्षा”—किसके लिए, क्यों और कब तक?
चंडीगढ़/हरियाणा। हरियाणा पुलिस के एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी को लेकर इन दिनों महकमे के भीतर ही चर्चाओं का बाजार गर्म है। आधिकारिक तौर पर भले ही सब कुछ “नियमों के तहत” बताया जा रहा हो, लेकिन अंदरखाने सवाल उठ रहे हैं कि क्या रिटायरमेंट के बाद भी इतनी भारी सुरक्षा वाजिब है, या फिर यह व्यवस्था “प्रभाव” और “प्रोटोकॉल” की आड़ में जारी है।
सूत्रों के मुताबिक, संबंधित रिटायर्ड अधिकारी के पास अभी भी सुरक्षा का बड़ा काफिला मौजूद है। इसमें एक इंस्पेक्टर, एक सब-इंस्पेक्टर सहित करीब दो दर्जन कमांडो शामिल बताए जा रहे हैं। इतना ही नहीं, एक पीसीआर वाहन समेत कई गाड़ियां उनके साथ आगे-पीछे चलती देखी जा सकती हैं।
चर्चा यह भी है कि उनके निजी आवास पर भी पुलिसकर्मियों की तैनाती जारी है, जो आमतौर पर केवल उच्च खतरे की श्रेणी वाले व्यक्तियों के लिए ही देखने को मिलती है।
“कई बार उठ चुका है मुद्दा”
पुलिस विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में स्वीकार किया कि इस सुरक्षा व्यवस्था को लेकर विभाग के भीतर कई बार चर्चा हो चुकी है। अधिकारी ने कहा,
“मामला कई बार डिस्कस हो चुका है… लेकिन कुछ परिस्थितियां ऐसी हैं कि फिलहाल हम मजबूर हैं।”
हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि ये “परिस्थितियां” क्या हैं—क्या यह वास्तविक सुरक्षा खतरा है, या फिर कोई प्रशासनिक/राजनीतिक दबाव।
नियम क्या कहते हैं?
सामान्यतः किसी भी वीआईपी या पूर्व अधिकारी को सुरक्षा “थ्रेट परसेप्शन” यानी संभावित खतरे के आकलन के आधार पर दी जाती है। यह आकलन समय-समय पर समीक्षा के बाद घटाया या बढ़ाया जाता है।
रिटायरमेंट के बाद यदि खतरे का स्तर कम पाया जाता है, तो सुरक्षा में कटौती या समाप्ति सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है।
सवाल जो उठ रहे हैं
क्या संबंधित अधिकारी को वास्तव में इतना उच्च स्तर का खतरा है?
अगर है, तो क्या उसका कोई आधिकारिक दस्तावेजी आधार है?
अगर नहीं, तो इतने बड़े पुलिस बल की तैनाती क्या संसाधनों का दुरुपयोग नहीं?
पुलिस महकमे के अंदर ही कुछ अधिकारी यह मानते हैं कि इस तरह की तैनाती से आम कानून-व्यवस्था के काम प्रभावित होते हैं, क्योंकि बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी एक व्यक्ति की सुरक्षा में लगे रहते हैं।
“स्टेटस सिंबल” बनती सुरक्षा?
विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में वीआईपी सुरक्षा कई बार जरूरत से ज्यादा “स्टेटस सिंबल” के रूप में भी देखी जाने लगी है। इससे पुलिस बल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और वास्तविक जरूरत वाले मामलों में संसाधनों की कमी महसूस हो सकती है।
यह मामला भले ही आधिकारिक तौर पर शांत दिखाई दे, लेकिन अंदरखाने उठ रहे सवाल एक बड़ी बहस की ओर इशारा करते हैं—क्या सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह पेशेवर मानकों पर आधारित है, या इसमें प्रभाव और परंपरा का भी असर है?
जब तक इस तरह के मामलों में पारदर्शिता नहीं बढ़ेगी, तब तक “ऑफ द रिकॉर्ड” चर्चाएं इसी तरह सुर्खियों में आती रहेंगी।











Total Users : 290987
Total views : 493106