June 5, 2026 5:24 am

June 5, 2026 5:24 am

आफ द रिकार्ड–यशवीर कादियान

तुम हंसो तो दिन निकले, चुप रहो तो रातें हैं,

किस का गम,कहां का गम,सब फिजूल बातें हैं

हरियाणा के लोग जहां भी होते हैं अपना जलवा बिखेर ही देते हैं। आखिरकार कर्नाटक में सीएम का मसला निपट ही गया। यंू तो करीब तीन बरस पहले ही ये तय हुआ था कि सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार ढाई ढाई बरस के लिए सीएम होंगे। मगर एक बार सीएम बनने के बाद इस मायावी कुर्सी को आसानी से कौन छोड़ पाता है?  ढाई बरस गुजर गए, लेकिन सिद्धारमैया टस से मस नहीं हुए। ना ही ऐसी उम्मीद थी कि वे भविष्य में सीएम पद से इस्तीफा देंगे। ऐसे में कर्नाटक के कांग्रेस प्रभारी महासचिव रणदीप सुरजेवाला को मैदान में उतरना पड़ा।

वही रणदीप.. अपने हरियाणा आले। रणदीप ने कई दफा सिद्धारमैया से बात कर उनसे पार्टी हाईकमान का फैसला मानने के लिए मनाया। इस काम में रणदीप को करीब छह महीने लगे। काफी ना नुकर करने के बाद- अब तीन बरस आद आखिरकार सिद्धारमैया मान गए और उन्होंने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया। रणदीप ने ये भी सुनिश्चित करवाया कि कांग्रेस विधायक दल की मीटिंग में सिद्धारमैया ने ही भावी सीएम डीके शिवकुमार का नाम प्रस्तावित किया। इस बाबत राज्यपाल को जानकारी देने के लिए सिद्धारमैया को भी डीके शिवकुमार के साथ विशेष तौर पर भेजा गया ताकि पार्टी और जनता में ये संदेश जा सके कि दोनों एकजुट हैं। सब ठीक ठाक है। रणदीप ने भावी सीएम शिवकुमार को विशेष तौर पर ये हिदायत दे रखी है कि ऐसा कोई काम नहीं करना जिससे कि सिद्धारमैया के ईगो को ठेस लगे। चारवाह समुदाय से ताल्लुक रखने वाले सिद्धारमैया के नाम सबसे लंबी अवधि तक कर्नाटक का सीएम रहने का रिकार्ड है। वो इस से पहले वर्ष 2013-2018 तक भी कर्नाटक के सीएम रह चुके हैं। वो दो दफा कर्नाटक के डिप्टी सीएम भी रह चुके हैं। रणदीप ने सिद्धारमैया से एक प्रैस कांफ्रेस कर ये पार्टी सुप्रीमो राहुल गांधी का भी धन्यवाद करवाया। यंू तो कांग्रेस हाईकमान डीके शिवकुमार को सीएम के तौर पर फ्री हैंड देने के लिए सिद्धारमैया को राज्यसभा में भेजने का भी आफर दिया था,लेकिन इसे उन्होंने ये कहते हुए स्वीकार नहीं किया कि वे प्रदेश में ही रह कर लोगों की सेवा करने को इच्छुक हैं। इसके बाद से रणदीप ने सिद्धारमैया कोे मनाने-पटाने में जुटे हैं। उनको कोई न कोई पद पाने के लिए मनाने में लेंगे ताकि उनके आत्म सम्मान पर कोई आंच न आएं। 3 जून को डीके शिवकुमार कर्नाटक के नए सीएम की शपथ लेने जा रहे हैं।

रणदीप ने ये भी सुनिश्चित किया कि शपथ ग्रहण में ज्यादा तामझाम ना हो। इसके लिए भी उन्होंने भावी सीएम शिवकुमार को पहले से ही निर्देश दे दिए हैं। कुल मिला कर इस जटिल विषय को सिरे लगाने के लिए कांग्रेस हाईकमान के हाथ पैर फूले हुए थे उसे एक कुशल शिल्पकार रणदीप ने अपनी कुशलता से निपटा दिया। ये मामला बाहर से जितना सरल दिखता है उतना है नहीं। ये वक्त ही साबित करेगा इस फैसले से कांग्रेस को कितना फायदा हुआ है। एक अच्छे वकील और पार्टी प्रवक्त्ता रहे रणदीप मनेजमैंट के शानदार खिलाड़ी भी हैं वो इस कर्नाटक एपिसोड ने फिर से साबित कर दिया।

मोहन की विदाई
मोहनलाल कौशिक की हरियाणा भाजपा अध्यक्ष पद से विदाई हो ही गई है। हालांकि उनके कार्यकाल में करीब एक बरस का समय अभी बाकी था,लेकिन पार्टी ने उनको हटा कर डा.अर्चना गुप्ता को अध्यक्ष पद का दायित्व सौंप दिया है। डा.अर्चना गुप्ता हरियाणा भाजपा की दूसरी महिला अध्यक्ष हैं। इस से पहले कमला वर्मा इस पद पर रह चुकी हैं। पंडित मोहनलाल कौशिक की अध्यक्ष पद से विदाई के अलग अलग कारण बताए जा रहे हैं। चर्चा है कि केंद्रीय मंत्री और पूर्व सीएम मनोहरलाल खटटर उन से नाराज थे। एक अन्य केंद्रीय राज्य मंत्री कृष्णपाल गुर्जर भी मोहनलाल की कार्यशैली से खुश नहीं थे। फरीदाबाद नगर निगम के चुनावों में टिकट वितरण के मामले में मोहनलाल की भूमिका से गुर्जर प्रसन्न नहीं थे। बताया जाता है कि गुर्जर ने भी शीर्ष स्तर पर मोहनलाल की शिकायत की थी। मोहनलाल के कुछ नजदीकी लोगों ने एक आईएएस अधिकारी के खिलाफ तथाकथित हनीटैÑप-सीडी कांड का मामला उड़ा रक्खा था। इस से ये आईएएस भी इन से खार खाए हुए थे। उन्होंने भी इनके कई चेले चपटों के प्रोपर्टी के सौदे में अनियमितताओं अच्छा खासा डोजियर तैयार कर रखा था। एक के बाद एक कई कारण ऐसे बनते चले गए कि मोहनलाल को अध्यक्ष पद से जाना पड़ा। मोहनलाल संगठन को धार देने की बजाय मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के आसपास ही अधिक मंडराते रहते थे। हो सकता है कि आने वाले समय में उनको सरकार में किसी पद पर लगाने-बिठाने का झुनझुना थमा दिया जाए। उनके कुछ समर्थक इसी प्रयास में लगे हैं कि किसी तरह से मोहनलाल को सरकारी कोठी और गाड़ी का सुख प्राप्त हो जाए।

सराहनीय औद्योगिक नीति
हरियाणा की नई औद्योगिक नीति की सर्वत्र सराहना हो रही है। यंू तो इस में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और उद्योग मंत्री राव नरबीर सिंह की भूमिका है,लेकिन इसके प्रमुख शिल्पकारों में से एक उद्योग विभाग के प्रशासकीय सचिव अमित अग्रवाल भी हैं। इस नीति की तैयारियां बजट सत्र से पहले से ही शुरू हो गई थी, जहां सीएम ने अलग अलग स्थानों पर उद्योगपतियों के साथ कई मीटिंग कर उनके सुझाव सुने। बाद में उद्योग विभाग ने उन उद्योगपतियों को आइडेंटिफाई किया जो वाकई में हरियाणा में निवेश के लिए लालयित हैं।

इन चिन्हित किए उद्योगपतियों से पूछा गया कि वो हरियाणा में कौन कौन सी नीतियों में, क्या बदलाव चाहते हैं? यानी कि टारगेट और फोकस एक दम साफ था। उद्योगपतियों की भीड़ से संवाद करने की बजाय जो लोग हरियाणा में रोकड़ा लगाने के लिए लालायित थे सिर्फ उन से बात की गई कि आप चाहते क्या हो? जो जो संभव था वो सुधार किए गए। पड़ौसी राज्यों और अन्य राज्यों की भी नीतियों का अध्ययन किया गया। औद्योगिक नीति की चर्चा तो पहले की दो कैबिनेट मीटिंग में भी हुई लेकिन ये सिरे तीसरी कैबिनेट मीटिंग में चढी। इसके लिए एडवांस में पूरी तैयारी की गई। कई मंत्रियों को इस दफा पहले से प्रैजेंटेशन देकर बताया गया कि इस नीति के क्या क्या खास पहलू हैं। तीसरी कैबिनेट मीटिंग में करीब पांच आवर अमित अग्रवाल ने प्रजेंटैशन दिया और इस नीति के बारे में विस्तार से ब्रीफ किया। अमित अग्रवाल, उद्योग निदेशक यश गर्ग और उनकी टीम की मेहनत रंग लाई। जो कुछ कसर रह गई हैं उनको भी उद्योग विभाग जल्द ही पूरा करने जा रहा है। इसी नीति में कुछ और सुधार-संशोधन करने जा रहा है। मेहनत कहीं भी की जाए वो वहीं दिखती है। इसीलिए तो हमने पिछले कालम में इसी जगह पर लिखा भी था कि मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की शताब्दी ट्रेन यात्रा के दौरान उनको पंजाब के कई उद्यमियों ने मिल इस औद्योगिक नीति पर चर्चा की। इस की सराहना की। ये भी कहा कि अब तो पंजाब के निवेशक हरियाणा में निवेश करने के लिए लालायित हैं। अमित अग्रवाल के इस नायाब अंदाज पर कहा जा सकता है..
तुम हुस्न की खुद इक दुनिया हो, शायद तुम्हें मालूम नहीं
महफिल में तुम्हारे आने से हर चीज पे नूर आ जाता है

पैंट की पिछली जेब में पर्स ना रखें-खुल्लर
मुख्यमंत्री के मुख्य प्रधान सचिव राजेश खुल्लर का सोशल मीडिया पर प्रचारित प्रसारित अवतरित हो रहा एक ताजातरीन इंटरव्यू इन दिनों चर्चा में है। इसमें खुल्लर ने कहा कि हमारी सरकार ने लोगों की मुश्किलों को आसान करने के लिए कई पोर्टल बनाए। इस से उनको अपने कामों के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर नहीं काटने पड़ते। वो जहां चाहें वहां से अपना काम करवा सकते हैं। वो कहते हैं कि काश ये भी हो पाता कि इन पोर्टल-कम्प्यूटर पर एक बटन सहानुभूति का भी होता कि सारी आवश्यक सूचनाएं दर्ज करने के बाद एक क्लिक सहानुभूति पर भी कर दिया जाता और सामने वाले की पीड़ा-तकलीफ को बेदर्द सरकारी सिस्टम समझ लेता। आत्मसात कर लेता। खुल्लर ने कहा कि हम चाहे जितनी तरक्की कर लें,लेकिन किसी दूसरे की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझना और उस को पीड़ित के हिसाब से राहत देने की सोच जब तक किसी अधिकारी की नहीं होगी तब तक ये तरक्की बेमानी है। उनसे ये भी पूछा गया कि वो 21 बरस के राजेश खुल्लर को क्या सलाह देना चाहेंगे? इस का खुल्लर ने ये रोचक जवाब दिया — अपने बटुए-पर्स को पैंट की पिछली जेब में ना रक्खें। वाकई ऐसा करने से कई तरह की शारीरिक,मानसिक और आर्थिक परेशानियों से बचा जा सकता है। एक दफा मैं भी इसका भुक्तभोगी रहा हंू। तब से मैंने पर्स को पैंट की पिछली जेब में रखना बंद कर दिया। हुआ यंू कि 21जनवरी,1993 को भारत और इंग्लैंड के बीच चंडीगढ के सेक्टर-16 क्रिकेट स्टेडियम में वन डे मैच खेला गया। इसे देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ी और इस भीड़ का हिस्सा मैं भी था। इस भीड़ का फायदा उठाते हुए किसी जेबकतरे ने मेरा पर्स निकाल लिया। उन दिनों मैं भी पर्स पैंट की पिछली जेब में रखता था। पर्स में धन तो नहीं था,लेकिन ड्राइविंग लाईसैंस, आईकार्ड व अन्य जरूरी डोक्यूमेंटस थे। मेरा पर्स निकाल कर जेबकतरे को भारी भरकम निराशा हुई और यहां तक भी हुआ कि उसका दिल पसीज गया। फिर ये हुआ कि दो दिन बाद मुझे वो पर्स मेरे मकान से सटे पार्क में पड़ा मिल गया। संभवत: जेबकतरे को लगा कि माल तो इसमें कुछ है नहीं ये कागज मेरे किसी काम के नहीं तो वो मेरे आईकार्ड में लिखे पते को पढ कर मेरे मकान के पास ही ये पर्स छोड़ गया। गजब ये हुआ कि दो दिन बाद टहलते हुए मेरी नजर इस पर पड़ गई और ये मुझे वापस मिल भी गया। पर्स वापस मिलने की खुशी को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। इस से ये भी साबित हुआ कि इंसानियत जिंदा है। उस जेबकतरे का भी शुक्रिया जो मेरे मकान से सटे पार्क के पास इस आस में पहुंचा कि ये पर्स मुझ तक पहुंच जाएगा। ईश्वर ने हम दोनों के दुख को महसूस किया और हम दोनों के साथ इंसाफ किया। जेबकतरे का मुझ तक पहुंचने का ये प्रयास बेकार नहीं गया। उसके बाद मैंने ये संकल्प लिया कि मैं पर्स को पैंट की पिछली जेब या किसी भी ऐसी जगह पर नहीं रखूगां जहां से इस पर आसानी से हाथ साफ किया जा सके।

इसी प्रसंग से जुड़ा एक दूसरा किस्सा ये है कि वर्ष 2004 में सोनिया गांधी दो दिवसीय हरियाणा दौरे पर आई। मैं उस समय दैनिक भास्कर अखबार में चंडीगढ-राजधानी से हरियाणा की खबरें कवर करता था। सोनिया गांधी के इस महत्वपूर्ण दौरे कोे कवर करने के लिए अखबार के शीर्ष प्रबंधन ने मेरी डयूटी लगा दी गई। सोनिया गांधी के इस दौरे की एक खूबी ये रही कि दो दिन तक भजनलाल,भूपेंद्र हुडडा और बीरेंद्र सिंह एक ही गाड़ी में रहे। ये भजनलाल की मर्सडीज गाड़ी थी जिसकी पिछली सीट पर ये तीनों लोग मुश्किल से समा पाते थे। इस पर कांग्रेसी इनके मजे लेते हुए कहते थे कि ये सोनिया गांधी का ही प्रताप है कि मुख्यमंत्री के तीनों दावेदारों को उन्होेंनें एक सीट पर साथ साथ बैठने पर विवश कर दिया है। खैर मुददे पर वापस आते हैं। तो उस दौरे के पहले दिन सोनिया गांधी का लंच रिवाड़ी के धारूहेड़ा स्थित हरियाणा टूरिज्म के पर्यटक परिसर में था। पत्रकारों को वहां अंदर जाने की इजाजत नहीं थी। तब अंदर की खबर पता करने के लिए मुझे खूब ही चाव रहता था। मेरे साथ कांग्रेस के मीडिया का काम संभाल रहे केवल ढींगरा भी थे। पर्यटक परिसर के मुख्य गेट के आसपास काफी भीड़ थी। कांग्रेसी कार्यकर्त्ताओं में अंदर जाने के लिए धक्का मुक्की हो रही थी,लेकिन पुलिस किसी को फटकने नहीं दे रही थी। किसी तरह से इस भीड़ को धकियाते हुए,अपनी जगह बनाते हुए मैं जैसे ही मैं पर्यटक परिसर के गेट पर पहुंचा,पुलिस वालों ने मुझे अंदर आने से रोक लिया। तभी वहां अब स्वर्गीय हो चुके, तत्कालीन डीएसपी जगप्रवेश दहिया अचानक से प्रकट हो गए। वो मेरे पुराने मित्र थे। उन्होंने मुझे झट से अंदर आने का इशारा किया। पुलिस वालों को कहा कि इनको अंदर आने दो। मैंने उनको कहा कि मेरे साथ एक सज्जन केवल भी हैं इनको भी अंदर आने दो। उन्होंने कहा-आप दोनों आ जाओ। मैंने केवल जी को कहा कि आप अपना पर्स संभाल कर रखिए। भीड़ बहुत है। केवल ने कहा कि आप चिंता मत करें मेरा पर्स की तरफ ही ध्यान है। किसी तरह से हम पर्यटन परिसर के गेट के अंदर पहुंचे तो तब तक किसी जेबकतरे ने केवल की पैंट की पिछली जेब से उनका बटुआ उड़ा लिया था। इस वारदात के बाद तो मैं और ज्यादा चौकस हो गया और बटुआ कभी पैंट की पिछली जेब में भूलकर भी नहीं रखा। अब जब खुल्लर ने पर्स को पैंट की पिछली जेब में न रखने कीे सलाह दी तो इस मसले से जुड़ी बरसों पुरानी यादें ताजा हो गई। ये भी साबित हो गया कि दो बड़े लोग एक तरह से सोचते हैं। प्रख्यात शायर बशीर बद्र का हाल ही में निधन हो गया। उनकी लिखी कुछ पंक्तियां इस मौके पर प्रस्तुत हैं..

पत्थर के शहर में कच्चे मकान कौन रखता है
आज कल हवा के लिए रोशनदान कौन रखता है
अपनों की कलह से फुरसत मिले तो सुनें

आज कल पराई दीवार पर कान कौन रखता है

खुद ही पंख लगाकर उड़ा देते हैं चिड़ियों को
आज कल परिंदों में जान कौन रखता है
हर चीज मुहैया है मेरे शहर में किश्तों पर
आज कल हसरतों पर लगाम कौन रखता है
बहला कर छोड़ आते हैं वृद्धाश्रम में मां बाप को
आज कल अपने मकान में पुराना सामान कौन रखता है
सबको दिखता है दूसरों में इक बेईमान इंसान
खुद के भीतर मगर अब ईमान कौन रखता है
फिजूल की बातों पे सभी करते हैं वाह वाह
अच्छी बातों के लिए अब जुबान कौन रखता है

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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