June 17, 2026 2:02 pm

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CHANDIGARH NEWS: सहकारिता विभाग पर उठे सवाल, रिकॉर्ड डिजिटाइजेशन में देरी और शिकायतों के निस्तारण को लेकर बढ़ी नाराजगी

आरसीएस व बैक की कमान में बदलाव की मांग

सामाजिक कार्यकर्ता नवजोत लेहल पिछले कई वर्षों से विभिन्न मंचों पर उठा रही आवाज, मगर सुनवाई नही!

रमेश गोयत
चंडीगढ़। देश के सबसे आधुनिक और योजनाबद्ध शहरों में गिने जाने वाले चंडीगढ़ में सहकारी समितियों के रिकॉर्ड आज भी बड़े पैमाने पर मैनुअल प्रणाली पर निर्भर हैं। शहर की विभिन्न हाउस बिल्डिंग कोऑपरेटिव सोसायटियों और सहकारी संस्थाओं से जुड़े लोगों का आरोप है कि रिकॉर्ड के डिजिटाइजेशन में वर्षों की देरी के कारण आम नागरिकों को अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं शिकायतों के निस्तारण में देरी और पारदर्शिता की कमी को लेकर भी विभाग सवालों के घेरे में है।

रिकॉर्ड अब भी फाइलों तक सीमित
जानकारी के अनुसार, रजिस्ट्रार कोऑपरेटिव सोसायटी (आरसीएस) कार्यालय के अधीन आने वाली अनेक सहकारी समितियों का रिकॉर्ड अब भी भौतिक फाइलों में सुरक्षित है। जबकि पड़ोसी राज्यों पंजाब और हरियाणा में सहकारी समितियों से संबंधित अधिकांश रिकॉर्ड डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराए जा चुके हैं।
सोसायटी सदस्यों का कहना है कि रिकॉर्ड ऑनलाइन उपलब्ध न होने के कारण नामांतरण, सदस्यता परिवर्तन, उत्तराधिकार, संपत्ति हस्तांतरण और अन्य मामलों में लोगों को बार-बार कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं। कई मामलों में संबंधित फाइलों के उपलब्ध न होने या रिकॉर्ड खोजने में समय लगने की बात कहकर आवेदनों को लंबे समय तक लंबित रखा जाता है।

“फाइल नहीं मिली” बनता है सबसे बड़ा कारण
कई फ्लैट मालिकों और सोसायटी सदस्यों का आरोप है कि विभागीय कार्यालय में अक्सर “फाइल ट्रेस नहीं हो रही” या “रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है” जैसे जवाब मिलते हैं। इससे वर्षों पुराने मामलों का समाधान और अधिक जटिल हो जाता है।
लोगों का कहना है कि डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध होने पर किसी भी संपत्ति या सदस्यता का पूरा इतिहास कुछ मिनटों में देखा जा सकता है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में एक साधारण मामले के निपटारे में भी महीनों या वर्षों का समय लग जाता है।

भ्रष्टाचार और पारदर्शिता पर भी सवाल
सहकारी क्षेत्र से जुड़े कई लोगों का आरोप है कि रिकॉर्ड प्रबंधन की पुरानी व्यवस्था और प्रक्रियाओं की जटिलता भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। उनका कहना है कि जब तक रिकॉर्ड पूरी तरह ऑनलाइन नहीं होंगे और फाइलों की निर्भरता खत्म नहीं होगी, तब तक पारदर्शिता सुनिश्चित करना मुश्किल होगा।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर नागरिकों में असंतोष लगातार बढ़ रहा है।

सुधारों की मांग को लेकर वर्षों से सक्रिय हैं नवजोत लेहल
सहकारिता क्षेत्र में पारदर्शिता और सुधार की मांग को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता नवजोत लेहल पिछले कई वर्षों से विभिन्न मंचों पर आवाज उठा रही हैं। उन्होंने कई मामलों में रिकॉर्ड डिजिटाइजेशन, शिकायतों के समयबद्ध निस्तारण और प्रशासनिक जवाबदेही की मांग की है।
बताया जाता है कि उन्होंने सहकारी समितियों से जुड़े अनेक मामलों में विभागीय अधिकारियों के समक्ष शिकायतें और सुझाव रखे हैं। हालांकि उनका आरोप है कि अधिकांश मामलों में केवल आश्वासन दिए जाते हैं, जबकि वास्तविक समाधान में काफी समय लग जाता है।

“तारीख पर तारीख” मिलने की शिकायत
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि कई मामलों में सुनवाई के लिए बार-बार तिथियां दी जाती हैं, लेकिन अंतिम निर्णय तक पहुंचने में लंबा समय लग जाता है। लोगों का आरोप है कि विभाग से जुड़े मामलों में समयबद्ध निर्णय व्यवस्था का अभाव दिखाई देता है।
आरसीएस कार्यालय को सहकारिता मामलों में सर्वोच्च अपीलीय प्राधिकरण माना जाता है। ऐसे में शिकायतकर्ताओं का मानना है कि यहां से मामलों का शीघ्र निपटारा होना चाहिए ताकि नागरिकों को राहत मिल सके।

प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर भी उठ रही मांग
सहकारी क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि पहले आरसीएस का प्रशासनिक नियंत्रण जिला उपायुक्त (डीसी) स्तर पर होने से निगरानी अपेक्षाकृत मजबूत रहती थी। उनका दावा है कि बाद में प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव के बाद विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर अधिक शिकायतें सामने आने लगीं।
हालांकि इस संबंध में प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है। फिर भी नागरिकों का एक वर्ग मांग कर रहा है कि विभाग की जवाबदेही और निगरानी मजबूत करने के लिए प्रशासनिक ढांचे की समीक्षा की जाए।

बैंकिंग और सहकारी संस्थाओं में भी निगरानी बढ़ाने की मांग
सूत्रों के अनुसार, सहकारी क्षेत्र से जुड़े कुछ पदों का अतिरिक्त प्रभार संभालने को लेकर भी अधिकारियों में रुचि कम देखी जा रही है। इसके पीछे कार्यभार और प्रशासनिक चुनौतियों को प्रमुख कारण बताया जा रहा है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
नागरिकों का कहना है कि सहकारी संस्थाओं और बैंकों से जुड़े मामलों में नियमित ऑडिट, डिजिटल रिकॉर्ड, ऑनलाइन ट्रैकिंग और जवाबदेही तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए।

डिजिटल रिकॉर्ड ही माना जा रहा समाधान
विशेषज्ञों का मानना है कि सहकारी समितियों के रिकॉर्ड का पूर्ण डिजिटाइजेशन, ऑनलाइन शिकायत पोर्टल, सुनवाई की डिजिटल ट्रैकिंग और आदेशों की सार्वजनिक उपलब्धता जैसी व्यवस्थाएं लागू होने से अधिकांश समस्याओं का समाधान संभव है।
लोगों ने चंडीगढ़ प्रशासन से मांग की है कि पंजाब और हरियाणा की तर्ज पर सहकारी समितियों का रिकॉर्ड ऑनलाइन किया जाए, शिकायतों के निस्तारण के लिए समयसीमा तय की जाए तथा विभागीय कार्यप्रणाली में अधिक पारदर्शिता लाई जाए, ताकि नागरिकों का विश्वास मजबूत हो सके।

RAMESH GOYAT
Author: RAMESH GOYAT

With over 20 years of experience in Hindi journalism, Ramesh Goyat has served as District Bureau Chief in Kaithal and worked with the Haryana , Punjab , HP and UT Bureau in Chandigarh. Coming from a freedom fighter family, he is known for his fast, accurate, and credible reporting. Through Babugiri Hindi, he aims to deliver impartial and fact-based news to readers.

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