रमेश गोयत
चंडीगढ़,14 जून। हाईटेक सिटी के रूप में पहचान रखने वाले चंडीगढ़ में सहकारी हाउस बिल्डिंग सोसायटियों के हजारों फ्लैटों का स्वामित्व रिकॉर्ड आज भी कागजी फाइलों में सिमटा हुआ है। सेक्टर-48, 49, 50 और 51 की 114 कोऑपरेटिव हाउस बिल्डिंग सोसायटियों के लगभग 7,800 फ्लैटों से जुड़ा पूरा रिकॉर्ड अभी तक डिजिटल नहीं हो पाया है। ऐसे में मूल आवंटी से लेकर वर्तमान मालिक तक की स्वामित्व श्रृंखला (Chain of Records) को 90 दिनों के भीतर कंप्यूटरीकृत करने की मांग जोर पकड़ रही है।
जानकारी के अनुसार चंडीगढ़ प्रशासन ने वर्ष 1996 से 2000 के बीच 114 सहकारी हाउस बिल्डिंग सोसायटियों को भूमि आवंटित की थी। इन सोसायटियों में करीब 7,800 फ्लैट बनाए गए और वर्ष 2001 से 2005 के दौरान मूल सदस्यों को आवंटित कर दिए गए। इसके बाद पिछले दो दशकों में इन फ्लैटों में बिक्री, उपहार, उत्तराधिकार, कोर्ट आदेश, GPA और अन्य माध्यमों से हजारों स्वामित्व परिवर्तन हुए, लेकिन इनका रिकॉर्ड आज भी रजिस्ट्रार कोऑपरेटिव सोसायटी (RCS) कार्यालय में मैनुअल फाइलों के रूप में रखा गया है।
फाइलें नहीं मिलने से वर्षों तक अटके रहते हैं मामले
फ्लैट मालिकों और सोसायटी सदस्यों का आरोप है कि रिकॉर्ड मैनुअल होने के कारण नामांतरण (Mutation), सदस्यता हस्तांतरण और अन्य प्रक्रियाओं में भारी देरी होती है। कई मामलों में आवेदकों को यह कहकर लौटा दिया जाता है कि “मूल फाइल ट्रेस नहीं हो रही” या “रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है”।
बताया जा रहा है कि लगभग 40 प्रतिशत मामलों में मूल रिकॉर्ड नहीं मिलने के कारण म्यूटेशन के मामले तीन से पांच वर्षों तक लंबित रहते हैं। कई बार कानूनी वारिसों को मूल आवंटी से वर्तमान स्वामित्व तक की श्रृंखला साबित करने के लिए सिविल कोर्ट का सहारा लेना पड़ता है।
एक ट्रांसफर में लग जाते हैं 18 से 36 महीने
चंडीगढ़ निवासी नवजोत लेहल बताया कि फाइल आधारित व्यवस्था के कारण प्रत्येक ट्रांसफर प्रक्रिया में 18 से 36 महीने तक का समय लग जाता है। फाइलें विभिन्न शाखाओं और अधिकारियों के बीच घूमती रहती हैं तथा हर स्तर पर नई आपत्तियां लगने से आम नागरिक परेशान होते हैं।
इसका सबसे अधिक असर वरिष्ठ नागरिकों पर पड़ रहा है। अनुमान के अनुसार मूल आवंटियों में से लगभग 70 प्रतिशत लोग अब 70 वर्ष से अधिक आयु के हो चुके हैं। उन्हें रिकॉर्ड प्राप्त करने और मामलों के निस्तारण के लिए बार-बार RCS कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
कन्वेयंस डीड प्रक्रिया भी प्रभावित
सूत्रों के अनुसार एस्टेट ऑफिस ने हजारों फ्लैटों के लिए पूर्ण स्वामित्व श्रृंखला का प्रमाणपत्र (Complete Chain Certificate) मांगा है, लेकिन रिकॉर्ड डिजिटल न होने के कारण यह कार्य तेजी से नहीं हो पा रहा। इससे कन्वेयंस डीड की प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है।
पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में पहले से ऑनलाइन व्यवस्था
मांग करने वालों का कहना है कि केंद्र सरकार के डिजिटल इंडिया अभियान के तहत सभी नागरिक सेवाओं के डिजिटाइजेशन पर जोर दिया जा रहा है। दिल्ली, पंजाब और हरियाणा के सहकारिता विभागों ने अपने रिकॉर्ड को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराया हुआ है तथा सार्वजनिक सर्च पोर्टल भी संचालित किए जा रहे हैं।
वहीं चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड (CHB) भी लगभग 64 हजार फ्लैटों का रिकॉर्ड ऑनलाइन कर चुका है और ट्रांसफर मॉड्यूल के माध्यम से नागरिकों को डिजिटल सेवाएं प्रदान कर रहा है। इसके बावजूद सहकारी हाउसिंग सोसायटियों के रिकॉर्ड का डिजिटाइजेशन अब तक अधूरा है।
90 दिन में पूरा हो डिजिटाइजेशन
प्रस्ताव के अनुसार पहले 30 दिनों में मूल आवंटियों का डेटा एंट्री कार्य पूरा किया जाए। अगले 60 दिनों में वर्ष 2001 से 2026 तक की सभी ट्रांसफर एवं म्यूटेशन फाइलों को स्कैन किया जाए। इसके बाद 90 दिनों के भीतर मूल आवंटी से वर्तमान मालिक तक की पूरी डिजिटल श्रृंखला तैयार कर ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया जाए।
इसके साथ ही एस्टेट ऑफिस और सब-रजिस्ट्रार कार्यालय के साथ डेटा इंटीग्रेशन कर ऑनलाइन एनओसी और कन्वेयंस डीड प्रणाली विकसित करने की भी मांग की गई है।
प्रत्येक फ्लैट का पूरा डिजिटल प्रोफाइल बने
मांग के अनुसार प्रत्येक फ्लैट के लिए सोसायटी का नाम, पंजीकरण संख्या, फ्लैट नंबर, मूल आवंटी का विवरण, सभी ट्रांसफर का रिकॉर्ड, वर्तमान मालिक की जानकारी, म्यूटेशन की स्थिति, कन्वेयंस डीड की स्थिति तथा सभी दस्तावेजों की स्कैन कॉपी डिजिटल रिकॉर्ड में शामिल की जाए।
RTI एक्ट का हवाला
मांगकर्ताओं ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा-4 का हवाला देते हुए कहा है कि प्रत्येक सार्वजनिक प्राधिकरण को रिकॉर्ड का कंप्यूटरीकरण कर नागरिकों के लिए सुलभ बनाना चाहिए। उनका कहना है कि दो दशक से अधिक समय बीतने के बावजूद रिकॉर्ड का पूर्ण डिजिटाइजेशन नहीं होना पारदर्शिता और सुशासन की भावना के विपरीत है।
मुख्य सचिव से निगरानी की मांग
नवजोत लेहल व नागरिकों ने मांग की है कि इस परियोजना की निगरानी यूटी चंडीगढ़ के प्रशासक एवं मुख्य सचिव स्तर पर की जाए। साथ ही सूचना प्रौद्योगिकी विभाग और NIC को तकनीकी सहयोग तथा नगर निगम को संपत्ति कर संबंधी डेटा इंटीग्रेशन के लिए जिम्मेदारी सौंपी जाए।
लोगों का कहना है कि यदि 7,800 फ्लैटों का पूरा रिकॉर्ड डिजिटल हो जाता है तो वर्षों से लंबित हजारों मामलों का समाधान होगा, भ्रष्टाचार और देरी पर अंकुश लगेगा तथा नागरिकों को पारदर्शी और समयबद्ध सेवाएं मिल सकेंगी।













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