जीरकपुर में ‘माटी की खुशबू, संस्कृति की पहचान’ विषय पर कवि सम्मेलन आयोजित, हरियाणा, पंजाब सहित विभिन्न राज्यों के साहित्यकारों ने अपनी कविताओं और गजलों से बिखेरे साहित्य के रंग
बाबूगिरी न्यूज़
जीरकपुर। हरियाणा दिवस के अवसर पर साहित्यिक संस्था ‘काव्य कदम’ (हरियाणा) की ओर से जीरकपुर स्थित हर्मिटेज प्लाजा (के-एरिया) में भव्य काव्य महफिल का आयोजन किया गया। ‘माटी की खुशबू, संस्कृति की पहचान’ विषय को समर्पित इस साहित्यिक आयोजन में हरियाणा, पंजाब और अन्य राज्यों से पहुंचे साहित्यकारों ने अपनी कविताओं, गजलों और ओजस्वी रचनाओं के माध्यम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति, देशभक्ति, प्रेम, सामाजिक सरोकारों और जीवन के विभिन्न पहलुओं को शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत किया गया। देर रात तक चली इस काव्य महफिल में श्रोताओं ने तालियों के साथ कवियों का उत्साहवर्धन किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध कवयित्री श्रीमती कुसुम धीमान ‘कलिका’ ने दीप प्रज्वलित करके किया। मंच का संचालन सर्वेश शायर ने अपनी प्रभावशाली, ऊर्जावान और चुटीली शैली में किया। उनकी प्रस्तुति ने शुरुआत से ही कार्यक्रम में साहित्यिक उत्साह और रोचकता बनाए रखी।

गजलों और कविताओं से सजी काव्य महफिल
कवि सम्मेलन की शुरुआत संस्था के प्रदेशाध्यक्ष बलवान सिंह ‘मानव’ ने अपनी गजल से की। उन्होंने सुनाया, ‘साथ उसने भी निभाया देर तक, पास हमको भी बुलाया देर तक।’ उनकी इस प्रस्तुति ने महफिल में गजल का खूबसूरत रंग भर दिया।
इसके बाद मंच संचालक सर्वेश शायर ने अपनी भावुक गजल ‘जब से उसने किया है मेरा फैसला, दिल ये दिल ना रहा हो गया खोखला’ प्रस्तुत की। उनकी गजल ने श्रोताओं को भावनाओं के गहरे संसार से जोड़ा और सभागार तालियों से गूंज उठा।
कवयित्री सीमा चहल ‘पुष्प’ ने जीवन के संघर्ष और सकारात्मक सोच को अपनी पंक्तियों में अभिव्यक्त करते हुए सुनाया, ‘पुष्प! तू ये जीवन जी ले, चाहे गम का जहर पी ले।’ वहीं डॉ. दर्शना सुभाष पाहवा ने प्रेम और भावनाओं की संवेदनशीलता को अपनी रचना में पिरोते हुए कहा, ‘यह प्रेम के आंसू कितने चतुर, छलक कर मेरा सारा भेद खोल दिया।’ उनकी प्रस्तुति को भी श्रोताओं की खूब सराहना मिली।
देशभक्ति और सामाजिक सरोकारों पर गूंजे स्वर
काव्य महफिल में देशभक्ति और हरियाणा की माटी के गौरव को विशेष स्थान मिला। गर्ग निशा ‘दीपक्षम’ ने अपनी ओजस्वी कविता के माध्यम से हरियाणा की वीर परंपरा को नमन किया। उन्होंने सुनाया, ‘गढ़ी सांपला के ओ वीर तुझे लाखों प्रणाम हैं, हृदय तल से सलाम है।’ उनकी कविता ने उपस्थित श्रोताओं में देशभक्ति और गौरव का भाव पैदा कर दिया।
वरिष्ठ कवि राजीव गुप्ता ने मानवीय रिश्तों और सच्चाई के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, ‘जो सच कहने से घबराए वो अपना नहीं होता, जो सच सुन के बिफर जाए वो अपना नहीं होता।’ उनकी रचना ने रिश्तों की वास्तविकता पर सोचने के लिए प्रेरित किया।
युवा कवयित्री करिश्मा वर्मा ‘किट्टू’ ने कलम की ताकत और उसकी सामाजिक भूमिका को अपनी कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा, ‘ना तीरों से ना तलवारों से, ना धारदार हथियारों से, इतिहास बदलने की कोशिश हमारी कलम की धारों से।’ उनकी रचना को श्रोताओं ने खूब सराहा।
वहीं रवि कटारिया ने गांव से शहर की ओर पलायन और इससे जुड़े भावनात्मक दर्द को अपनी कविता में उतारते हुए सुनाया, ‘सुकून भरी जिंदगी छोड़ कर, मैं कहां आ गया, अपना गांव छोड़कर मैं शहर आ गया।’ उनकी पंक्तियों में ग्रामीण जीवन की यादों और बदलते सामाजिक परिवेश की झलक देखने को मिली।
गजलों में प्रेम, विरह और जिंदगी के अनुभव
कार्यक्रम में गजलकारों ने प्रेम, स्वाभिमान, विछोह और बदलते सामाजिक परिवेश पर अपनी रचनाओं से श्रोताओं को प्रभावित किया।
मीना जागलान ने स्वाभिमान और बिछड़ने के दर्द को अपनी गजल में अभिव्यक्त करते हुए कहा, ‘पलट कर तेरी चौखट अब आयेंगे नहीं, जख्म कितने हो बतायेंगे नहीं।’
संदीप कुमार भगवाड़िया ‘संवेदी’ ने बदलते समय और इंसानी चेहरों के पीछे छिपे किरदारों पर टिप्पणी करते हुए सुनाया, ‘इस बदले जमाने में अदाकार बहुत हैं, एक चेहरे के पीछे भी तो किरदार बहुत हैं।’
अनीता नरवाल ने अपनी मधुर आवाज में गजल प्रस्तुत करते हुए कहा, ‘इश्क का नगमा सुनाया देर तक, दर्द में भी मुस्कुराया देर तक।’ वहीं वरिष्ठ कवि वीरेन्द्र राय ने प्रेम की वर्तमान परिस्थितियों और उसकी संवेदनशीलता को अपनी रचना में पिरोते हुए सुनाया, ‘जी तो बहुत करता है कि मुहब्बत में जान दे दूं मैं, पर बामुरव्वत इस जहान में, मुहब्बत कौन करता है।’
प्रवीण सुधाकर ने आम आदमी की आर्थिक परेशानियों और मेहनतकश जीवन की कठिनाइयों को अपनी कविता में स्थान दिया। उन्होंने सुनाया, ‘लाख मेहनत करो जुटती नहीं रोटी बाबू, कैसी आई है घड़ी आज ये खोटी बाबू।’ उनकी रचना ने रोजमर्रा के संघर्षों को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा।
राजन तेजी ‘सुदामा’ ने मुफलिसी के बावजूद हौसला बनाए रखने का संदेश देते हुए अपनी गजल सुनाई, ‘खाली है जेब फिर भी, मैं मुस्कुरा रहा हूं, इस मुफलिसी को अपनी जीभें चिढ़ा रहा हूं।’ वहीं आशा रानी ने मेहनत, जिम्मेदारी और संघर्षशील व्यक्तित्व को समर्पित अपनी सुंदर रचना प्रस्तुत की। उन्होंने कहा, ‘गर्मी की धूप हो या कड़कती ठंड, आंधी, तूफान के आगे वो चट्टान सा खड़ा रहता है।’
मुख्य अतिथि कुसुम धीमान ‘कलिका’ की प्रस्तुति रही आकर्षण का केंद्र
कार्यक्रम के चरमोत्कर्ष पर मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध कवयित्री कुसुम धीमान ‘कलिका’ ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और भरत के प्रेम, त्याग तथा पारिवारिक मर्यादा के प्रसंग को अपनी विशेष काव्य शैली में प्रस्तुत किया।
उन्होंने सुनाया,
‘अतिशय प्रिय हैं चारों बेटे, मुझको कब इनकार है। राजपाट बस मिले भरत को, उसका भी अधिकार है। दशरथ नंदन राम। दशरथ नंदन राम।’
उनकी इस भावपूर्ण प्रस्तुति ने श्रोताओं को रामायण के प्रसंगों से जोड़ दिया। उपस्थित लोगों ने तालियों के साथ उनकी रचना का स्वागत किया।
साहित्यकारों को स्मृति चिह्न देकर किया सम्मानित
काव्य महफिल के दौरान मुख्य अतिथि और आयोजकों की ओर से सभी सहभागी कवियों एवं साहित्यकारों को उनकी उत्कृष्ट रचनाओं और साहित्यिक योगदान के लिए स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर साहित्यकारों ने हरियाणा दिवस के आयोजन को साहित्य और संस्कृति के माध्यम से मनाने की पहल की सराहना की।
संस्था के प्रदेश मीडिया प्रभारी राम कुमार वर्मा ‘राम’ और विश्वजीत सिंह ‘शब्द’ ने दूरभाष के माध्यम से आयोजकों को सफल कार्यक्रम की बधाई दी।
कार्यक्रम के समापन पर आयोजकों ने काव्य महफिल में पहुंचे सभी प्रबुद्ध श्रोताओं, गणमान्य अतिथियों और पत्रकार बंधुओं का आभार व्यक्त किया। आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देने के लिए कृष्णा भारती, दिव्या कमलजीत और उनकी पूरी टीम का विशेष रूप से धन्यवाद किया गया।
हरियाणा दिवस पर आयोजित इस साहित्यिक महफिल ने एक बार फिर साबित किया कि कविता और साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति, परंपराओं और मानवीय संवेदनाओं को जोड़ने का सशक्त माध्यम भी हैं। ‘काव्य कदम’ की इस पहल ने साहित्य प्रेमियों को एक साझा मंच प्रदान करने के साथ हरियाणा की सांस्कृतिक पहचान और माटी की खुशबू को शब्दों के माध्यम से जीवंत किया।










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