April 11, 2026 6:47 pm

April 11, 2026 6:47 pm

समानुभूति की संवेदना: डॉ. विजय गर्ग

समकालीन समाज तेजी से बदल रहा है। हर दिन अख़बारों और डिजिटल माध्यमों में पीड़ा, असमानता और संघर्ष की खबरें आम होती जा रही हैं। आदिवासी अंचलों में विस्थापन, शहरों की ओर बढ़ता पलायन, शिक्षा से बाहर होते बच्चे और महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा—ये अब केवल घटनाएं नहीं रहीं, बल्कि आंकड़ों में दर्ज सच्चाइयाँ बन चुकी हैं। हम इन पर दुख व्यक्त करते हैं, सहानुभूति जताते हैं, लेकिन हमारा सामाजिक आचरण अक्सर यहीं आकर ठहर जाता है।
किसी के दुख को देखकर करुणा का भाव जागना समाज को असंवेदनशील होने से बचाता है, लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब यह भावना केवल शब्दों, बयानों और औपचारिक प्रतिक्रियाओं तक सीमित रह जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित सामाजिक और आर्थिक रिपोर्टें बताती हैं कि असमानता और वंचना आज भी व्यापक है, फिर भी अधिकांश मामलों में हमारी भूमिका केवल चिंता व्यक्त करने तक सिमट जाती है। वास्तव में, सहानुभूति हमें भावनात्मक संतोष तो देती है, लेकिन व्यावहारिक जिम्मेदारी का बोध नहीं कराती।
आदिवासी समाज इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 8.6 प्रतिशत हिस्सा अनुसूचित जनजातियों का है, लेकिन विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वाले लोगों में उनकी हिस्सेदारी अनुपात से कहीं अधिक रही है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार बड़े बांधों, खनन और औद्योगिक परियोजनाओं से प्रभावित लोगों में लगभग 40 प्रतिशत तक आदिवासी समुदायों से आते हैं। यह तथ्य केवल भौतिक विस्थापन का नहीं, बल्कि संस्कृति, आजीविका और सामाजिक पहचान के टूटने का भी संकेत देता है। सहानुभूति के नाम पर मुआवजे और पुनर्वास की योजनाएँ बनाई जाती हैं, लेकिन समानुभूति तभी होगी जब नीति-निर्माण की प्रक्रिया में प्रभावित समुदायों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित की जाए और विकास को उनके जीवन-संदर्भ से जोड़कर देखा जाए।
शिक्षा के क्षेत्र में भी सहानुभूति और समानुभूति का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। यूनिसेफ और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण जैसी संस्थाओं की रिपोर्टें बताती हैं कि आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों में स्कूल छोड़ने की दर आज भी चिंता का विषय है, विशेषकर आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में। सहानुभूति के तौर पर छात्रवृत्तियाँ, मध्याह्न भोजन और विभिन्न योजनाएँ मौजूद हैं, पर समानुभूति तब सामने आती है जब शिक्षा व्यवस्था यह स्वीकार करती है कि भाषा, गरीबी और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ सीखने की प्रक्रिया को गहराई से प्रभावित करती हैं। जब शिक्षक और व्यवस्था बच्चे की पृष्ठभूमि को समझकर अपनी शिक्षण पद्धति में बदलाव करते हैं, तभी शिक्षा वास्तव में समावेशी बन पाती है।
ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर बढ़ता पलायन भी हमारे सामाजिक आचरण की गंभीर परीक्षा लेता है। करोड़ों लोग रोजगार की तलाश में अपने गाँव छोड़कर शहरों में अस्थायी और असुरक्षित परिस्थितियों में काम कर रहे हैं। शहरी अर्थव्यवस्था इन श्रमिकों पर निर्भर है, फिर भी सामाजिक व्यवहार में वे अक्सर अदृश्य बने रहते हैं। हम उनके श्रम का लाभ तो उठाते हैं, लेकिन उनके आवास, स्वास्थ्य और बच्चों की शिक्षा को लेकर उदासीन बने रहते हैं। यह उदासीनता सहानुभूति की सीमा को दर्शाती है, जहाँ समस्या को देखा तो जाता है, पर उसे अपना नहीं माना जाता।
डिजिटल युग ने संवेदनाओं को भी एक नया रूप दे दिया है। सोशल मीडिया पर किसी मुद्दे से जुड़े आंकड़े, तस्वीरें और वीडियो लाखों लोगों तक पहुँचते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में उनका प्रभाव अक्सर सीमित रह जाता है। यह तथाकथित डिजिटल सहानुभूति हमें प्रतिक्रिया तो देती है, पर सहभागिता नहीं सिखाती।
असल में केवल आर्थिक या तकनीकी प्रगति ही पर्याप्त नहीं है, जब तक उसके साथ सामाजिक और मानवीय दृष्टि न चले। सामाजिक आचरण तब बदलता है, जब संवेदना औपचारिकता से निकलकर व्यवहार में उतरती है। जब नीति-निर्माण में आंकड़ों के साथ मानवीय अनुभवों को महत्व दिया जाता है, जब योजनाएँ बनाते समय जमीनी सच्चाइयों को समझा जाता है, तभी सहानुभूति वास्तव में समानुभूति में बदलती है।
— डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्रिंसिपल, मलोट (पंजाब)

 

 

BabuGiri Hindi
Author: BabuGiri Hindi

बाबूगिरी हिंदी

virender chahal

Our Visitor

2 9 5 2 4 8
Total Users : 295248
Total views : 499309

शहर चुनें