May 23, 2026 10:33 pm

May 23, 2026 10:33 pm

बिना मांझे, बिना हवा… फिर भी उड़ती है पतंग

सूरत के युवाओं का अनोखा इनोवेशन, पर्यावरण और सुरक्षा का शानदार उदाहरण
सूरत: उत्तरायण का पर्व रंग-बिरंगी पतंगों और खुशियों का प्रतीक माना जाता है, लेकिन चाइनीज मांझे के कारण हर साल कई दर्दनाक हादसे भी सामने आते हैं. इंसानों के साथ-साथ बड़ी संख्या में पक्षी भी इसकी चपेट में आकर जान गंवा देते हैं. इसी गंभीर समस्या का समाधान सूरत के एक युवा इंजीनियर विक्की वखारिया और उनकी टीम ने अपने अनोखे इनोवेशन से निकाला है, जिसकी देश-विदेश में जमकर सराहना हो रही है.

बिना डोर और बिना हवा उड़ने वाली पतंग
सूरत के युवा इंजीनियर विक्की वखारिया ने अपनी टीम के साथ मिलकर ऐसी पतंग तैयार की है, जिसे उड़ाने के लिए न तो किसी डोर की जरूरत है और न ही तेज हवा की. यह पतंग रिमोट कंट्रोल से संचालित होती है और पूरी तरह सुरक्षित है. इस इनोवेशन में विक्की के साथ भावेश गोसाई, प्रथम मावपुरी और पार्थ लेकड़िया भी शामिल हैं.
क्या है इस खास पतंग की खूबियां
पतंग उड़ाने के लिए किसी भी तरह की डोर की जरूरत नहीं
चाइनीज मांझे से होने वाले हादसों का पूरी तरह समाधान
हवा न चलने पर भी रिमोट कंट्रोल से उड़ान
आसमान में लूप, रोल और डाइव जैसे हैरतअंगेज स्टंट
रात के समय एलईडी लाइटों से सजी पतंग, जो आसमान को रंगीन रोशनी से भर देती है

पीएम मोदी के साथ पतंग उड़ाने का मिला मौका
विक्की और उनकी टीम का यह इनोवेशन सिर्फ सूरत तक सीमित नहीं रहा. टीम ने इंडोनेशिया, सिंगापुर और चीन जैसे देशों में आयोजित इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल में भारत का प्रतिनिधित्व किया है. इंडोनेशिया में एक कार्यक्रम के दौरान इस टीम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ इस तकनीक पर चर्चा करने और पतंग उड़ाने का अवसर भी मिला. वहीं, चीन में आयोजित प्रतियोगिता में टीम ने सिल्वर प्राइज जीतकर भारत का नाम रोशन किया.

पक्षियों की सुरक्षा से जुड़ी सोच
विक्की वखारिया का कहना है कि हर साल उत्तरायण के दौरान पक्षियों के गले कटने और मरने की खबरें पढ़कर उन्हें बेहद दुख होता था. इसी पीड़ा से प्रेरित होकर उन्होंने बिना डोर वाली पतंग बनाने का फैसला किया. अब तक वह चार अलग-अलग डिजाइन में 15 से ज्यादा पतंगें तैयार कर चुके हैं. एक पतंग बनाने में करीब 40 से 45 हजार रुपये का खर्च आता है.

पर्यावरण और तकनीक का बेहतरीन मेल
यह इनोवेशन साबित करता है कि अगर तकनीक को संवेदनशील सोच के साथ जोड़ा जाए, तो पर्यावरण और जीव-जंतुओं की सुरक्षा संभव है. सूरत के इन युवाओं ने यह दिखा दिया है कि “सूरत के लाल” चाहें तो अपने टैलेंट का डंका न सिर्फ जमीन पर, बल्कि आसमान में भी बजा सकते हैं.

बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो
Author: बाबूगिरी हिंदी ब्यूरो

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