— आरके गर्ग, आरटीआई एक्टिविस्ट, चंडीगढ़
चंडीगढ़ केवल ईंट-पत्थर से बना हुआ शहर नहीं है। यह एक विचार है, एक दृष्टि है और आधुनिक भारत का वह सपना है जिसे योजनाबद्ध तरीके से साकार किया गया। यह शहर अनुशासन, संतुलन और सौंदर्य का प्रतीक रहा है। लेकिन आज वही चंडीगढ़ एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ सबसे बड़ा खतरा बाहर से नहीं, बल्कि भीतर की चुप्पी से पैदा हो रहा है।
आज चंडीगढ़ के भविष्य से जुड़े अहम मुद्दों पर खुलकर बोलने, सुझाव देने और दिशा तय करने का दावा वे लोग कर रहे हैं, जिनका इस शहर से न तो ऐतिहासिक जुड़ाव है, न भावनात्मक रिश्ता और न ही इसके दीर्घकालिक भविष्य की कोई जिम्मेदारी। उन्हें न चंडीगढ़ के मास्टर प्लान की गहराई का ज्ञान है, न इसके संस्थापक दर्शन की समझ और न ही “सिटी ब्यूटीफुल” की मूल आत्मा से उनका कोई सरोकार। इसके बावजूद, विडंबना यह है कि इन्हीं आवाज़ों को मंच, मान्यता और महत्व मिल रहा है, जबकि चंडीगढ़ के अपने नागरिकों की चिंताओं को अक्सर अनसुना किया जा रहा है।

चंडीगढ़ भारत का पहला पूर्णतः योजनाबद्ध आधुनिक शहर है। इसकी सेक्टर प्रणाली, सीमित और नियंत्रित घनत्व, चौड़ी सड़कों के साथ पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित पथ, पर्याप्त हरित क्षेत्र, शांत आवासीय वातावरण और सुव्यवस्थित बाज़ार—ये सब किसी संयोग का परिणाम नहीं हैं। यह सब वर्षों की सोच, अंतरराष्ट्रीय स्तर की शहरी योजना और अनुशासन का नतीजा है। चंडीगढ़ को इसलिए बनाया गया था ताकि यह अव्यवस्थित विस्तार, अतिक्रमण और भीड़भाड़ से दूर रह सके।
लेकिन आज विकास के नाम पर उसी संतुलन से खिलवाड़ करने की कोशिशें हो रही हैं, जिसने चंडीगढ़ को विशिष्ट बनाया था।
सबसे चिंताजनक पहलू यह नहीं है कि बाहरी लोग चंडीगढ़ पर अपनी राय दे रहे हैं—लोकतंत्र में हर राय का स्वागत होना चाहिए। असली चिंता इस बात की है कि चंडीगढ़ के अपने निवासी पर्याप्त मजबूती, एकजुटता और निरंतरता के साथ अपनी आवाज़ नहीं उठा रहे। जब स्थानीय समाज चुप रहता है, तो उसकी जगह दूसरे लोग बोलने लगते हैं। और जब बोलने वाले बदल जाते हैं, तो धीरे-धीरे निर्णय लेने वाले भी बदल जाते हैं। यही चुप्पी आगे चलकर अधिकारों की हानि और पहचान के क्षरण का कारण बनती है।
आज आवश्यकता है कि चंडीगढ़ के निवासी—चाहे वे वरिष्ठ नागरिक हों, युवा हों, शहरी योजनाकार हों, आर्किटेक्ट हों, पूर्व प्रशासक हों, आरडब्ल्यूए हों या आम नागरिक—एक साझा मंच पर, एक स्वर में अपनी चिंता और सुझाव सामने रखें। यह सवाल ज़रूर उठाया जाना चाहिए कि क्या विकास के नाम पर शहर की आत्मा से समझौता किया जा सकता है? क्या स्थानीय सहभागिता के बिना चंडीगढ़ के भविष्य से जुड़े फैसले लेना उचित और न्यायसंगत है?
यह संघर्ष किसी व्यक्ति, संस्था या वर्ग के खिलाफ नहीं है। यह चंडीगढ़ के पक्ष में खड़ा होने की लड़ाई है। यह आग्रह है कि निर्णय प्रक्रिया में उन लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए जो इस शहर में रहते हैं, जिन्होंने इसे जिया है और जो इसे अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित, संतुलित और सुंदर रखना चाहते हैं।
अगर आज चंडीगढ़ के लोग सक्रिय नहीं हुए, तो कल चंडीगढ़ उनका नहीं रहेगा। तब यह शहर भी देश के अन्य अनियोजित और भीड़भाड़ वाले शहरों की तरह बन जाएगा—जिसकी पहचान केवल नक्शों और फाइलों में होगी, लेकिन जिसकी आत्मा कहीं खो चुकी होगी।
अब भी समय है।
चंडीगढ़ को बचाने के लिए सबसे पहले चंडीगढ़ वालों को बोलना होगा।
क्योंकि अगर चंडीगढ़ चुप रहा, तो चंडीगढ़ सचमुच खो जाएगा।











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